सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
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३४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
मूल अभिलेख
लघु शिला : रूपनाथ
१. देवानंपिये हेव आहा
२. सातिरेकानि अढतियानि व य सुमि प्रकास सके
३. नो चु बाढि पकंते
४. सातिरेके चु छवछरे य सुमि हकं सघ उपेते बाढि च पकंते
५. या इमाय कालाय जंबुदिपसि अमिसा देवा हुसु ते दानि मिसा कटा
६. पकसहि हि एस फले
७. नो च एसा महतता पापोतवे खुदकेन पि पकममिनेना सकिये पिपुले पि
स्वगे आरोधेवे
८. एतिय अठाय च सावने कटे खुदका च उडाला च पकमतु ति अता पि
च जानंतु इय पकरा व किति चिरठितिके सिया
९. इय हि अठे वढि वढिसिति विपुलं च वढिसिति अपलधियेना दियढियं
वढिसत
१०. इय च अठे पवतिसु लेखापेत बालत
११. हथ च अथि सिलाथंभे सिलाथंभसि लाखापेतवय त
१२. एतिना च वयजनेना यावतक तुफक अहाले सव विवसेतवाय ति
१३. व्यूठेना सावने कटे
१४. २०० ५० ६ सत विवासा त
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लघु शिला : रूपनाथ / ३५
हिंदी रूपांतर
लघु शिला : रूपनाथ
१. देवानांप्रिय ऐसा कहते हैं।
२. अढाई वर्ष से कुछ अधिक समय हो गया है जब से मैं प्रकट रूप से
उपासक हूँ।
३. परंतु मैंने डट कर पराक्रम नहीं किया।
४. परंतु एक वर्ष से कुछ अधिक समय हो गया है जब से मैं संघ हो गया
हूँ और खूब पराक्रम किया है।
५. जो इस काल में जंबुद्वीप में देवगण (मनुष्यों से) विलग हो गये थे वे
अब (मेरे द्वारा उनसे) मिलवा दिये गये हैं।
६. यह पराक्रम का ही फल है।
७. और यह (केवल) बड़े (आदमी) के ही बस में नहीं है (बल्कि) पराक्रम
करने वाला छोटा (आदमी) भी, अथाह होने पर भी, स्वर्ग प्राप्त कर सकता है।
८. और इस प्रयोजन के लिए यह घोषणा की गयी है कि छोटे वा बड़े
(सभी) पराक्रम करें और (मेरे) सीमावर्ती लोग भी जान जायं कि यही पराक्रम
चिरस्थायी हो।
९. क्योंकि यह उद्देश्य आगे-से-आगे बढ़ेगा और खूब बढ़ेगा – कम-से-कम
ड्योढ़ा बढ़ जायगा।
१०. और इस विषय को सुयोग (उपस्थित) होने पर चट्टानों पर लिखवायें।
११. और यहां (अर्थात, मेरे साम्राज्य में जहां कहीं भी) शिलास्तंभ हों
(वहां-वहां) शिलास्तंभों पर इसे लिखवाया जाना चाहिए।
१२. और इस (घोषणा की) इबारत के अनुसार, जितनी (दूर तक)
आपका अधिकार-क्षेत्र हो, (आप) उन सब स्थानों पर (अपने अधिकारियों
को) भिजवायें।
१३. यह घोषणा प्रवास-काल में की गयी।
१४. (तब तक) २५६ पड़ाव (अर्थात, रात्रि-काल) बीत चुके थे।