सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 80 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 28

पृष्ठ ३८

३८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
८. नो हीयं सक्ये महात्तेनेव पापोतवे कामं तु खो खुदकेन पि पकम-
णेण विपुले सुवगे आराधेत्तवे
९. एतायठाय इयं सावणे सावापिते.... महाप्पा च इमं पकमेयु ति अंता
मे जानेयु चिरठितीके च इयं पक....
१०. इयं च अठे वढिसिति विपुलं पि च वढिसिति अवरधिया दियढि
वढिसिति
११. इयं च सावणे सावापिते व्यूथेन
१२. २०० ५० ६
१३. से हेवं देवाणांपिये आह
१४. मातापितिसु सुस्रुसितविये हेमेव गरुसु प्राणेषु द्रहितव्यं सचं वतव्ये
से इमे धंमगुणा पवतितविया
१५. हेमेव अंतेवासिना अचारिये अपचायितविये ज्ञातिकेषु च कं य.... हे
पवतितविये
१६. एसा पोराणा पकिती दीघावुसे च एस
१७. हेवं एस कटिविये
१८. चपडेन लिखितं लिपिकरेण


पृष्ठ ३९

लघु शिला : ब्रह्मगिरि / ३९
८. निश्चय ही यह केवल बड़े (आदमी) द्वारा ही प्राप्त नहीं किया जा
सकता है बल्कि, चाहना होने पर, छोटे (आदमी) द्वारा भी पराक्रम करते हुए,
निःसंदेह, विपुल स्वर्ग प्राप्त किया जा सकता है।
९. इस प्रयोजन के लिए यह प्रज्ञापन करवाया गया है कि (छोटे) और बड़े
(सभी) यह पराक्रम करें और मेरे सीमावर्ती लोग भी (इसे) जान जायं और यह
पराक्रम चिरस्थायी हो।
१०. और यह उद्देश्य बढ़ेगा और खूब बढ़ेगा - कम से कम डेढ़ गुना (बढ़
जायगा)।
११. और यह प्रज्ञापन (मेरे) प्रवास-काल में किया गया है।
१२. (इस समय तक) २५६ (रात्रि-विश्राम किये जा चुके हैं)।
१३. और भी देवानांप्रिय का यह कहना है -
१४. माता-पिता की सेवा करनी चाहिए (और) ऐसे ही गुरुजनों की,
प्राणियों के प्रति (दयाभाव को) दृढ़ करना चाहिए, सच बोलना चाहिए, - तो
इन धर्मों के गुणों को व्यवहार में उतारना चाहिए।
१५. इसी प्रकार (आचार्य के सान्निध्य में रहने वाले) शिष्य द्वारा आचार्य
का आदर-सत्कार किया जाना चाहिए और ज्ञातिभाइयों के साथ यथायोग्य
बर्ताव किया जाना चाहिए।
१६. यह सनातन रीति है और इससे आयु बढ़ती है।
१७. इसी के अनुसार (कार्य) करना चाहिए।
१८. लिपिकार चपड द्वारा लिखा गया।