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सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 80 में से

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५० / सम्राट अशोक के अभिलेख
स्तंभ देहली-टोपरा : तृतीय अभिलेख
१. देवानंपिये पियदसि लाज हेव अहा
२. कयानमेव देखति इयं मे कयाने कटे ति
३. नो मिन पापं देखति इयं मे पापे कटे ति इयं वा आसिनवे नामा ति
४. दुपवेखे चु खो एसा
हेवं चु खो एस देखिये
५. इमानि आसिनवगामीनि नाम अथ चंडिये निठूलिये कोधे माने इस्या
कालनेन व हकं मा पलिसचयिसं
६. एस बाढ देखिये
७. इयं मे हिदिकाये इयमेव मे पालतिकाये

स्तंभ देहली-टोपरा : चतुर्थ अभिलेख
१. देवानंपिय पियदसि लाज हेव आहा
२. सडुवीसतिवसअभिसितेन मे इयं धंमलिपि लिखापिता
३. लजूका मे बहुसु पानसतसहसेसु जनसि आयता
४. तेसं ये अभिहाले वा दंडे वा अतपतिये मे कटे किंति लजूका असथ
अभीता कंमानि पवतवेवू जनस जानपदसा हितसुखं उपदहेवू अनुगहिनेवु चा
५. सुखीयदुखीयनं जानिसंति धंमयुतेन च वियोवदिसंति जनं जानपदं
किंति हिदतं च पालातं च आलाधयेवू ति
६. लजूका पि इच्छंति पटिचलितवे मं
७. पुलिसानि पि मे छंदनानि पटिचलिंसंति


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स्तंभ देहली-टोपरा : तृतीय अभिलेख / ५१
स्तंभ देहली-टोपरा : तृतीय अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं-
२. (मनुष्य) (अपना) भला काम ही देखता है (और अपने मन में सोचता
है) 'मैंने यह भला काम किया है।'
३. (वह अपना) बुरा काम जरा भी नहीं देखता (और अपने मन में नहीं
सोचता है;) 'मैंने यह पाप-कर्म किया है', अथवा 'यह आसिनव (बांधने
वाला कर्म) है।'
४. इसकी पहचान करना बड़ा कठिन कार्य है।
५. परंतु इसे, निःसंदेह, इस प्रकार देखना चाहिए-
६. प्रचंडता, निष्ठुरता, क्रोध, अभिमान (और) ईर्ष्या - ये क्लेश को प्राप्त
कराने वाले हैं। इस कारण से मैं कहीं पतित न हो जाऊं।
७. इसे अच्छी तरह जान लेना चाहिए-
८. यह मेरे ऐहिक (लाभ) के लिए है और वह दूसरा मेरे पारलौकिक
(लाभ) के लिए।

स्तंभ देहली-टोपरा : चतुर्थ अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं-
२. अभिषेक के २६ वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा यह धर्मलिपि लिखवायी
गयी है।
३. मेरे 'रज्जुक' (नाम के अधिकारी) कई लाख प्राणियों और मनुष्यों के
बीच नियुक्त हैं।
४. उनको अभियोग चलाने अथवा दंड देने के मामलों में मैंने उन्हीं के
विवेक पर छोड़ दिया है। क्यों? (जिससे कि) रज्जुक आश्वस्त और निर्भय
होकर कर्मों में प्रवृत्त हों, देशवासियों को हित-सुख प्रदान करें और (उनका)
उपकार करें।
५. वे सुख-दुःख (के कारणों) को जानेंगे और धर्म का पालन करने वाले
(व्यक्तियों की सहायता से) देशवासियों को प्रेरित करेंगे जिससे कि वे इस
लोक और परलोक (का सुख) प्राप्त कर सकें।
६. रज्जुक भी मेरी आज्ञा का पालन करने के लिए उत्सुक रहते हैं।
७. (सामान्य) (राज-) पुरुष भी मेरी इच्छाओं के अनुसार चलेंगे।