सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

यह देखकर अशफाक का उत्साह बढ़ गया और भीतर हलचलें तेज हो गई
थी। अंग्रेजी स्कूल के कारण अशफाक का मन पढ़ाई में नहीं लगता था।
वे नौवीं कक्षा से आगे नही पढ़ सके। उनका मन तो कहीं और लग
गया था। अध्ययन से अरुचि होने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन
इसमें उनके एक मित्र का विशेष हाथ रहा है। अशफाक ने मित्र का नाम
लिए बगैर लिखा भी है। अशफाक के स्कूल के दिनों में उनके बहुत सारे
साथी हो गये थे। वे मनोहर लाल ज्योतिषी के बेंत से डरते थे और बचते
रहते थे। इसके लिए वे फूँक-फूँक कर कदम रखते थे। फाँसी घर से लिखे
गये वक्तव्य में वे एक दोस्त का जिक्र करते है कि, 'मुझे एक दोस्त से
शिकवा है, जिसे मैं दिलोजान से चाहता हूँ।'¹ अशफाक दोस्त की दोस्ती
के इतने कायल थे कि दुनिया की खबर ही नही रही, उसे वह अपना
दीनोईमान मानते थे। अपना सब कुछ समझते थे। वे बाद में इतने दुखी
हुए कि तालीम हासिल करने में रुकावट का सबसे बड़ा कारण अशफाक
ने दोस्त को मान लिया।
अशफाक उल्ला खाँ को बचपन में कसरत का बड़ा शौक था। यही
कारण था कि वे अच्छी खासी देह के मालिक थे। उन्हें तैरने का भी बड़ा
शौक था। लेकिन जब वे बड़े हुए तो अच्छे खिलाड़ी होते हुए भी उनका
शौक धीरे-धीरे छूटता गया। सदैव देश के विषय में या मैनपुरी काण्ड के
विषय में सोचा करते थे।² मैनपुरी षडयंत्र के मुकदमें ने तो उनकी
मानसिक स्थिति ही बदल दी। अब अशफाक मन-मस्तिष्क से परिपक्व हो
चुके थे।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-22
  2. शहीद अशफाक उल्ला, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ-8
    36

आठ पास कर आये तो उन्होंने अपने पाठ्यक्रम की किताबों में सर वाल्टर
स्कॉट की लिखी हुई नज्म 'लव ऑफ कन्ट्री' पढ़ी। होरेशस का किस्सा
भी पढ़ा। जिसमें उसने कहा था कि देश पर शत्रु के आक्रमण के समय
यदि पुल तोड़ दिया जाय तो टाईबर नदी को पार कर फौज नही आ
सकती... मैं जाता हूँ और इस तंग रास्ते में मैं तीन साथियों सहित खड़े
होकर लड़ूँगा और इधर पुल तोड़कर नदी में डाल दिया जायेगा। वैसा ही
हुआ और रोम बच गया। आज भी बच्चे वीर होरेशस की कहानियाँ
पढ़कर देशभक्ति हेतु प्रेरणा पाते हैं। देश भक्ति की यह कहानी और
वाल्टर स्कॉट की नज्म अशफाक के अध्यापक ने कुछ इस तरह सुनायी
कि अशफाक अपने को रोक न सके और खूब रोये।¹
यह सत्य है कि किसी भी व्यकित के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर उसकी
शिक्षा, उसका अध्ययन और उसका परिवेश, सामाजिक वातावरण खासा
प्रभाव डालता है। निर्माण जब व्यक्तित्व का होता है तो ये उक्त चीजे
अपना असर जरूर दिखाती हैं और अपने इर्द-गिर्द तमाम आरोहों-अवरोहो
के बीच मनुष्य का निर्माण होता रहता है। अशफाक की भूमि भी इसी
परिवेश और समाज से निर्मित हुई है। उनके सामने बहुमत, अल्पमत,
जय, पराजय, अमीरी गरीबी के ऐसे चिह्न बन गये कि उनकी दशा ही
बदल गयी और वे आगे की शिक्षा ग्रहण नही कर सके। अशफाक शिक्षा
को खूब महत्व देते थे। इसके बावजूद वे तामील (अच्छी तामील) की वह
ऊँचाई नहीं छू सके जिसका स्वप्न वे कभी देखते थे। निश्चित ही एक
सुलझा और कुशाग्र बुद्धि का नागरिक देश से बहुत पहले विदा हो गया।
हो सकता था कि यदि वे

  1. शहीद अशफाक उल्ला, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 9
    37

उच्च शिक्षा प्राप्त करते तो देश को अपने गहरे वैचारिक सरोकारों से भी
परिचित कराते जो नव भारत के निर्माण में कारगर सिद्ध होता। उच्च
शिक्षा से वंचित रहने का मलाल अशफाक को था और वे स्वयं को दोषी
मानते हैं। वे अपने अभिभावक को इसका दोष नही देते क्योंकि वे उच्च
तालीम के गुणों से वंचित थे, उन्हें शिक्षा की अहमियत का पता नहीं
था। अंग्रेजी से वंचित रहने और संसार को दूर तक न देखने का भी
उन्हें मलाल था। उन्होंने लिखा है-‘... यों मैं बड़ा और हट्टा-कट्टा
पहलवान हो गया था, जब अंग्रेजी पढ़ने का शौक हुआ था। खैर, खुदा
का शुक्र है कि उर्दू-फारसी ही पढ़ा दी थी। जो मैं आज उर्दू में अपनी
जिन्दगी पर नोट लिख रहा हूँ और सच पूछिये तो वही पुराना रवैया
तालीम का अब तक हमारे यहाँ चला आ रहा है, कि मौलवी साहब
20-30 लड़को को लिए हुए उर्दू की तालीम दे रहे हैं और डंडा बरसा रहे
हैं।¹
अशफाक उल्ला खाँ समाज में हो रहे परिवर्तन पर दृष्टि जमाये थे।
समय बदल रहा था और शिक्षा थी कि अपनी परम्परा से आगे नही जा
रही थी। बावजूद इसके कुछ ऐसे भी शिक्षाविद् थे जो अंग्रेजी तालीम की
जरूरत महसूस करते थे। अशफाक के सामने देश भक्ति बड़ी चीज थी।
कई बार वे स्वयं को देश भक्तों के बीच खड़ा पाते और मन ही मन
संकल्प करते कि मैं ऐसा क्रांतिकारी बनूँगा जो देश की शान पर आजादी
के लिए मर मिटने को हमेशा तैयार रहे। अशफाक को एक बार उनके
अन्य अध्यापक ने एक ऐसी पुस्तक पढ़ने को दी जिसमें संसार भर के देश
भक्तों, वीर सपूतों की कहानियाँ भरी पड़ी थी। पुस्तक देते समय
अध्यापक महोदय ने अशफाक से कहा था कि, ‘मैं यह किताब तुमको बिल्कुल
देता हूँ, क्योंकि तुम

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-23
    38

इसके योग्य हो।¹ देशभक्ति की उन कथा-कहानियों को अशफाक ने पढ़ा।
परिणाम यह हुआ कि अशफाक की मानसिकता और प्रौढ़ हो गयी। उनके
इरादों में मजबूती आ गयी। वे एक सच्चे वीर सपूत बनना चाहते थे।
यही नही उन्हें पुस्तके पढ़ने का शौक भी लग गया।
अशफाक उल्ला खाँ का बचपन सिर्फ जंग, युद्ध की कथाएँ, लड़ाई
लड़ने और अस्त्र शस्त्र का शौक, देश भक्ति का सपना, अंग्रेजी से
नफरत, पुस्तक पढ़ने के शौक में बीता। यही उनके व्यक्तित्व के निर्माण
में सहायक हो सके हैं। यह भी सत्य है कि उनकी माँ और मौलवी साहब
ने भी प्रारम्भिक चरित्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।
अशफाक के कृतित्व और व्यक्तित्व से आज हम गौरवान्वित होते हैं।

  1. शहीद अशफाक उल्ला, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ-10
    39

अध्याय-तीन

अध्याय-तीन
मैनपुरी षड्यंत्र और अशफाक उल्ला खाँ
बचपन के सामाजिक वातावरण ने अशफाक उल्ला का मानसिक वातावरण
तो तैयार कर ही दिया था। पुस्तक पढ़ने के शौक के क्रम में अशफाक ने
अपने एक साथी से 'आनन्द मठ' नामक उपन्यास मंगा कर पढ़वाया
और एकाग्र होकर आनंदमठ की कथा सुनने लगे थे।¹ वे हिन्दी कम
जानते थे। इस साथी ने भी अशफाक के क्रांतिकारी बनने में विशेष
योगदान दिया। एक बार तो उनके मन में आया कि वे देश से बाहर
जाकर देश का कार्य करें। परन्तु इसी मित्र ने देश में रहकर देश सेवा हेतु
क्रांतिकारी दल में सम्मिलित होने की सलाह दी। अशफाक उल्ला को यह
सलाह अच्छी लगी और वे इस प्रयास में लग गये कि कब क्रांतिकारी दल
के सदस्यों से मुलाकात हो और वे दल में शामिल होकर अपनी प्रतिभा
दर्ज करा सकें।
अंग्रेजों के अत्याचार से और उनकी घोर दमन नीति के कारण देश में
भीषण असंतोष फैल गया था। भारतीय युवा विदेशी सत्ता के विरुद्ध
आक्रोशित हो उठे थे। युवाओं में अंग्रेजी शासन के पूर्णतया सफाया करने
का उमंग और जोश उमड़ रहा था। ऐसे में उ0प्र0 भी अपवाद भला कैसे
रहता। 1915-16 के वाराणसी षड्यंत्र काण्ड के रूप में अक्रोश फूट चुका
था। मैनपुरी में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध एक गुप्त संस्था की स्थापना हो
चुकी थी। मैनपुरी प्रमुख केन्द्र था।² वैसे तो उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारी
आन्दोलन का नेतृत्व बनारस के निवासी बंगाली क्रांतिकारियों ने किया
लेकिन मैनपुरी काण्ड की प्रमुख विशेषता थी कि इसे उ0प्र0 के निवासियों
ने किया। इस काण्ड पर बंगाली क्रांतिकारियों का प्रभाव नहीं था।³

  1. शहीद अशफाक उल्ला, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 10
  2. मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-61
  3. भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्यथनाथ गुप्त पृष्ठ 94
    40

मैनपुरी काण्ड का प्रभाव अशफाक उल्ला पर इतना पड़ा कि वे देश
के क्रांतिकारी बनने के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं सकते। निश्चित ही
वे मैनपुरी काण्ड की घटना से खासे प्रभावित थे और यह भी तय था कि
मैनपुरी काण्ड की घटना की एक-एक जानकारी हासिल करने का अशफाक
ने प्रयास किया होगा। संयुक्त प्रान्त
(उत्तर प्रदेश) में बनारस षड़यन्त्र (1915-16) के बाद दूसरे प्रमुख
षड्यंत्र की सफल रचना मैनपुरी में हुई। जिसका प्रभाव अशफाक पर पड़ा
था। शाहजहाँपुर के अनेक क्रांतिकारी इस घटना में सम्मिलित थे।
अशफाक की मानसिक संरचना उन्हें क्रांतिकारी कृतित्व की ओर खींचती
है।
मैनपुरी काण्ड के प्रमुख नेता गेंदा लाल दीक्षित थे। गेंदा लाल का
आगरा जिले के बाह तहसील में 20 नवम्बर 1888 को जन्म हुआ।
धनाभाव गेंदा लाल को भी हाई स्कूल से आगे शिक्षा पाने में रुकावट
बना। राम प्रसाद बिस्मिल की तरह ही गेंदा लाल भी आर्य समाज से
खूब प्रभावित थे। आजादी की लड़ाई में गेंदा लाल ने अथक प्रयास
किया। यह भी कहा जाता है कि आजादी हेतु क्रांति का प्रथम पाठ राम
प्रसाद बिस्मिल ने भी पढ़ा उन्हीं से था। दीक्षित जी एक बार हुए शिवाजी
उत्सव से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने शिवाजी नाम से एक संस्था ही
बना डाली। वे लोकमान्य तिलक के भक्त थे और राम प्रसाद बिस्मिल से
प्रभावित थे। यही राम प्रसाद बिस्मिल अशफाक के मित्र ही नहीं
प्रेरणास्तम्भ भी थे। 'शिवाजी समिति' के कई सदस्य बने। निः सन्देह
मैनपुरी काण्ड जिसके अगुआ गेंदालाल दीक्षित थे और जिसका प्रभाव
अशफाक पर सबसे ज्यादा पड़ा, वह काण्ड अंग्रेजी शासन के विरुद्ध
देशभक्त युवकों के आक्रोश का प्रतीक था।
41

गेंदा लाल जी ने 1916 में मैनपुरी में 'मातृवेदी' नामक क्रांतिकारी संस्था
बनाई।¹ यह संस्था गुप्त रूप से बनायी गयी थी। इस संस्था का उद्देश्य
ही था कि देश को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराना। थोड़े ही समय के
बाद इस संस्था की गतिविधियाँ लखनऊ, शाहजहाँपुर, आगरा, मथुरा,
इटावा, फरूर्खाबाद, कानपुर, फतेहपुर और मुरादाबाद में भी फैल गयीं।
मैनपुरी जनपद का नेतृत्व शिव कृष्ण ने किया और शाहजहाँपुर में राम
प्रसाद बिस्मिल, लखनऊ में गंगा सिंह ने नेतृत्व का भार सम्भाला।
गेंदालाल जी पूरे उ०प्र० का नेतृत्व कर रहे थे।² यह संयोग ही था कि
गेंदा लाल ने डाकुओं के सरदार पंचम सिंह को अपनी तरफ मिला लिया।
पंचम सिंह के सम्मिलित होने के कारण पाँच सौ घुड़सवार और दो सौ
पैदल एवं लाखों की सम्पत्ति क्रांतिकारियों के काम आयी। यह भी
उल्लेखनीय है कि - संस्था में श्री कृष्ण पालीवाल, श्री चन्द्रधर जौहरी
आदि अनेक नामी गिरामी क्रांतिकारियों ने कार्य किया। मातृवेदी संस्था
की गतिविधियों की प्रमुख चार शाखाएं थीं, जो निम्नवत् हैं -

  1. विदेशी सरकार के खिलाफ पुस्तकों, कविताओं और इस्तहार का
    प्रयोग।
  2. सैनिक विभाग का कार्य धन इकट्ठा करने के लिए डकैती डालने
    हेतु अस्त्र शस्त्रों का संग्रह करना था। साथ ही इसका कार्य सैनिक
    तैयार करना था।
  3. ब्रिटिश और देशी राज्यों की विभिन्न सैनिक छावनियों के सदस्यों
    की जानकारी एकत्र करने और सरकारी खजाने के धन और अस्त्र
    शस्त्र के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए 'गुप्ताचार्य' या
    जासूसी विभाग था। इस विभाग का कार्य डकैती डालने वाले
    स्थानों की सूचना भी एकत्र करना था।
  4. मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-61
  5. मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-62
    42
  1. इस क्रांतिकारी संस्था की 'शिल्पकारी' शाखा भी थी। इसका कार्य
    भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहित करना, विदेशी वस्तुओं को रोकना
    और बम आदि युद्ध सामग्री बनाने का प्रशिक्षण देना था।¹
    क्रांतिकारियों को उक्त शाखाओं को सम्पादित करना था। इस हेतु
    उन्हें एक शपथ पत्र पर नाम, दिनांक, पूरा पता सहित हस्ताक्षर करना
    आवश्यक था।
    शपथ पत्र इस प्रकार था : -
    <u>शपथ-पत्र</u>
    वन्देमातरम्
    श्रीमान जी,
    मैं अपने प्रति नतमस्तक होता हूँ।
    ‘‘आज मैं अपने को गुप्त संस्था के सदस्य के रूप में भरती करता हूँ।
    सर्वान्तर्यामी एवं सर्वव्यापी ईश्वर के नाम पर मैं यहाँ प्रतिज्ञा करता हूँ कि
    मैं कभी संस्था के हित के विरुद्ध विश्वासघात नहीं करूंगा। भारत माता
    के नाम पर मैं घोषित करता हूँ कि मैं उसे विदेशियों की दासता से मुक्त
    करूँगा और उसका सच्चा कर्तव्यपरायण पुत्र बना रहूँगा। मृत्यु पर्यन्त देश
    की सेवा से परांगमुख नहीं बनूँगा। मैं मातृभूमि के लिए अपना तन मन
    धन अर्पण करने को तैयार रहूँगा। मैं माता का सच्चा पुत्र हूँ और कभी
    संस्था के कार्य में बाधक नहीं बनूँगा। सूर्य अपनी ऊष्मा और चन्द्रमा
    अपनी शीतलता भले ही छोड़ दे लेकिन मैं अपने कर्तव्यों के प्रति कभी
    पीठ नहीं दिखाऊँगा। आवश्यकता पड़ने पर मैं पारिवारिक बन्धनों की भी
    चिन्ता नहीं करूँगा।
  2. मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-62
    43

“मैं माता की शपथ खाकर कहता हूँ कि मैं संस्था के आदेशों का
पालन करने में असफल नही बनूँगा। असफलता की दशा में संस्था को
मुझे मृत्यु दण्ड देने का अधिकार होगा।''¹
गेंदा लाल की गुप्त संस्था के सदस्यों के नाम एवं उपनाम इस प्रकार है
: -

  1. माधोराम उर्फ मास्टर या बृज किशोर
  2. प्रताप सिंह उर्फ प्रीतम या गणेश
  3. देवनारायण उर्फ हरी या भगवानदीन या चक्कन
  4. गोविन्द सिंह उर्फ लक्ष्मण
  5. राम प्रसाद बिस्मिल उर्फ गया
  6. राम नारायण उर्फ जगदीश
  7. गेंदालाल दीक्षित उर्फ फूल
  8. गंगा सिंह उर्फ राम नाथ
  9. शिवकृष्ण उर्फ सेठ या महेन्द्र या शिव
  10. गोपीनाथ उर्फ महेश
  11. दम्भीलाल पाण्डे उर्फ राम लाल
  12. सिद्धगोपाल उर्फ थालपाल
  13. प्रभाकर पाण्डे उर्फ आदित्य
  14. चन्द्रधर जौहरी उर्फ गनपत
  15. राजाराम उर्फ गुट्टन या गुट्टा
  16. फतेहसिंह उर्फ भूदेव
  17. मुकुन्दी लाल उर्फ भंगड़ी या भारतवीर
  18. मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल पृष्ठ-63
    44

अन्य क्रांतिकारी सदस्य जिनके उपनाम नहीं थे वे इस प्रकार है -
लाल सिंह, भैरो सिंह, टोड़ी सिंह, रामदीन, उल्फत सिंह, किढोरी लाल,
कालीचरन, शिव चरन लाल।¹ पं० गेंदालाल दीक्षित का विचार था कि देश
का शिक्षित समाज इस समयदेश प्रेम की भावना से बिल्कुल शून्य है।
अतः दीक्षित जी को इस शिक्षित समाज से निराशा होने लगी। वे
डाकुओं से सम्पर्क स्थापित करने लगे। दीक्षित जी का मत था कि डाकू
किसी विवशतावश ही डाकू जीवन अपना लेता है। डाकू के पास अदम्य
साहस होता है। यदि उनका उचित मार्ग दर्शन किया जाय तो वे अच्छे
व्यक्ति बन सकते हैं। अपने उद्देश्य में सफल सिद्ध होने को ध्यान में
रखकर गेंदालाल दीक्षित ने साधनों की पवित्रता को गौण समझा। उन्होंने
डाकुओं को अपने संगठन का सदस्य बनाया, वे इनके भीतर अंग्रेजी
सत्ता के प्रति विद्रोह की भावना जगाना चाहते थे और इनकी सहायता
से जेलों पर धावा बोलकर बंदियों को मुक्त कराना चाहते थे। इस प्रकार
वे जेल के कैदियों को भी संगठन का सदस्य बनाना चाहते थे। दीक्षित
जी सशस्त्र क्रांति द्वारा देश को स्वाधीन कराने का सपना देखते थे।² बाद
में पता चला कि दीक्षित जी ने ऐसी उम्मीद कर बड़ी भूल की। जो डाकू
थे भला उनका क्या उपयोग हो सकता था। वे तो आन्दोलन को कलुषित
ही करते। शचीन्द्र नाथ सान्याल ने लिखा है - 'पहले वे भी समझते थे
कि जिस समय आम विद्रोह हो उस समय जेल में बन्द कैदी रिहा कर
दिये जायँ तो उस समय उसमें मदद देंगे, किन्तु बाद को जब साधारण
कैदियों में बहुत दिन रहे तो उनका यह ख्याल बदला।³

  1. मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल पृष्ठ-63
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-29
  3. भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथगुप्त, पृष्ठ-95
    45

यह डाकू संगठन ग्वालियर राज्य में डाका डालने से संबंधित कार्य
में ही उलझ गया और एक दिन ऐसी ही योजना में पुलिस से मुठभेड़ हो
गयी और दल के पैंतीस सदस्य मारे गये। गेंदालाल दीक्षित बन्दी बनाकर
पकड़ लिए गये। दीक्षित जी को ग्वालियर किलें में भेज दिया। अब पं०
गेंदालाल दीक्षित को मुक्त कराने के लिए 'मातृवेदी' के सदस्य राम प्रसाद
बिस्मिल, मुकुन्दी लाल, शिवकृष्ण आदि सदस्यों ने योजना बनायी।
लेकिन अपने ही साथियों की अल्पज्ञता के कारण भेद खुल गया और
क्रांतिकारियों की धर-पकड़ शुरू हो गयी। राम प्रसाद बिस्मिल तो फरार
हो गये थे। मैनपुरी षडयंत्र के नाम से पकड़े गये सदस्यों पर मुकदमा
चला।¹
यह वही समय था जब अशफाक उल्ला खाँ शाहजहाँपुर के मिशन
स्कूल में सातवीं कक्षा के छात्र थे। षड्यंत्र के सिलसिले में गिरफ्तारियाँ
करने पुलिस मिशन स्कूल में भी जा पहुँची। सरकारी गवाह की पहचान
पर उनके स्कूल का एक छात्र राजाराम भारती भी बन्दी बनाया गया।
राजाराम उस समय दसवीं कक्षा का छात्र था। संदेह के आधार पर
दो-तीन विद्यार्थी और हिरासत में लिये गये। जिस दिन मिशन स्कूल में
षड्यंत्र के विषय में पुलिस पहुँची, वहाँ भय का वातावरण व्याप्त हो गया।
अशफाक ने इसका उल्लेख किया है-'मैं मिशन स्कूल का एक छोटे दर्जे
का तालिबे इल्म था, जबकि मैनपुरी साजिश का मुकदमा चला, हमारे
स्कूल में भी इस केस का अप्रूवर शिनाख्त की गरज से लाया गया था
और उसने दसवें दर्जे से राजाराम भारती को गिरफ्तार कराया और उस
समय वह भी हिरासत में ले लिए गये। गरज यह कि वह दिन भी अजीब
दिन था, पुलिस की लाल पगड़ियाँ स्कूल के चारों ओर दिखाई पड़ती
थीं।

  1. राम प्रसाद 'बिस्मिल' रचनावली, दिनेश शर्मा, पृष्ठ-160
    46

HRA में सक्रियता, काकोरी एक्शन एवं गिरफ्तारी का रोमांचक इतिहास

यह एक नयी बात थी कि स्कूल का तालिबेइल्म इस सूरत में
गिरफ्तार हुआ है। क्योंकि बंगाल में यह मामूली बात और आये दिन का
मामला है। मगर यू०पी० में यह बात कहाँ थी? गरज की अजीब दहशत
व खौफ स्कूल पर छाया हुआ था और हर एक लड़का अपनी जान की
खैर मनाता था। मैं उस रोज स्कूल जरा देर से गया था। कोई लड़का
अन्दर से बाहर नहीं निकल सकता था और हर दर्जे में शिनाख्त हो रही
थी। मैं भी अपने दर्जे में खामोशी से जा बैठा, मगर नफ्से मामला
मालूम करने के लिए बेचैन था, जो मेरे नेचर में था। चूंकि मैं स्कूल का
एक हाकी खेलने वाला आजाद खयाल तालिबेइल्म था, मास्टर साहब से
पूछने को झुका, मगर मास्टर साहब बताने से डरे कि एक लड़के ने कहा
राजाराम ने कहीं डाका मारा है और वह गिरफ्तार किये गये है। साथ ही
और भी लड़के गिरफ्तार हुए हैं।¹ सबसे अलग-थलग रहने वाले विद्यार्थी थे
राजाराम। अशफाक उल्ला को सहसा विश्वास ही नही हुआ था कि
राजाराम जैसे एकान्त प्रिय शान्त प्रकृति के व्यक्ति जो छात्र हैं क्रांतिकारी
भी हो सकते हैं। अशफाक ने तो पहले यही सोचा कि राजाराम ने कहीं
डाका डाला होगा। जब उनके एक साथी ने बताया कि राजाराम किसी
खुफिया सोसायटी का मेम्बर है न तो राजाराम कातिल है न डाकू। यह
सुनकर अशफाक को आश्चर्य हुआ। अशफाक ने उस मित्र में भी
क्रांतिकारी होने के गुण देखे। जब उस मित्र ने निर्भीकता से कहा कि मैं
भी देश के लिए मरने को तैयार हूँ अशफाक बहुत प्रभावित हुए। अशफाक
पर हुए प्रभाव का इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि वे इसी
समय राम प्रसाद बिस्मिल से मिलने को बेताब हो गये। बिस्मिल
शाहजहाँपुर के ही थे और वे इस समय फरार थे।


  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवानी सिंह राणा, पृष्ठ-33

47

उनके साथ ही कई क्रांतिकारी फरार हो गये थे।¹ शाहजहाँपुर के जो
क्रांतिकारी मैनपुरी षड्यंत्र केस में सम्मिलित थे, उनका विवरण निम्नवत्
है।
फरार होने वाले व्यक्तियों में पं० कालीचरन भी थे। अशफाक की
हाकी टीम में कालीचरन खिलाड़ी के रूप में भी थे। निश्चित ही उनका
असर अशफाक पर पड़ा होगा। पं० कालीचरन के धोखे में पुलिस ने
अशफाक से भी पूछताछ की थी। पंडित कालीचरन, जानकी प्रसाद के पुत्र
थे, जो बद्रीपुर हदीश, पुवायां के निवासी थे। अशफाक के खिलाड़ी साथी
कालीचरन मिशन हाई स्कूल के छात्र थे। उन्हें पुलिस ने 18 जनवरी 1919
को गिरफ्तार किया।² जिस समय कालीचरन को गिरफ्तार किया गया वे
बरेली कालेज बरेली के छात्र थे। पुलिस ने कालीचरन पर आरोप लगाया
कि उनके कमरे से कुछ कागजात मिले जिन पर उर्दू, हिन्दी व अंग्रेजी में
सरकार विरोधी कविताएं लिखी थीं। कालीचरन के लेख की पुष्टि बरेली
कालेज के इतिहास विभाग के प्राध्यापक एस०सी० दत्त ने की। कविताओं
का मुख्य अर्थ जनता को देश के प्रति बलिदान देने हेतु प्रेरित करना था।
एक कविता उदाहरणार्थ दी जा रही है - 'प्रिय देश वासियों! निद्रात्यागो
समय कम है। प्रियवर! विलम्ब न करो। देशहित हेतु क्रांतिकारियों का
साथ दो।³ मैनपुरी काण्ड के तहत लालारामधीन को गिरफ्तार कर लिया
गया। रामधीन वस्त्र विक्रेता थे और सदर बाजार में रहते थे। लेकिन
लाला रामधीन के विरुद्ध कोई प्रमाण न होने के कारण 23 जनवरी, 1919
को छोड़ दिया गया।⁴ राम प्रसाद बिस्मिल तो फरार थे ही वे कुछ दिन
आगरा में रहे और रूप सिंह नाम रखकर डॉक्टरी भी की।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवानी सिंह राणा, पृष्ठ-34
  2. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-92
  3. स्वतंत्रतां आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-92
  4. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-88
    48

इसके बाद वे मिनहाट में रहने लगे। खेती के साथ-साथ वे साहित्य की
रचना भी करते थे। इसी बीच बिस्मिल ने बंगला भाषा भी सीखी जो
बहुत काम आयी। उन्होंने पुस्तकों का अनुवाद भी किया (निहिलिस्ट
रहस्य, बोल शेविकों की करतूत) जो काकोरी केस में उनके विरुद्ध
दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया गया। शाहजहाँपुर के बिस्मिल के बाद
सबसे सक्रिय व्यक्ति देव नारायण थे जिनका उपनाम भारतीय था, छक्कन
लाल के नाम से भी जाने जाते थे। गेंदालाल के बाद मातृवेदी के नेतृत्व
की दावेदारी भी उन्होंने प्रस्तुत कर दी। देव नारायण आगरा के निवासी
थे। देवनारायण की प्रशंसा में शचीन्द्र नाथ सन्याल ने लिखा है-‘देव
नारायण बहुत गम्भीर प्रकृति के समझदार आदमी थे। लेकिन हमारे देश
का परम दुर्भाग्य है कि गम्भीर प्रकृति के समझदार व्यक्तियों ने निहायत
ही कम संख्या में भारतीय विद्रोह आन्दोलन में भाग लिया है।.... उनसे
बात-चीत करके यह तय हुआ था कि देव नारायण अपने गाँव को छोड़कर
आगरा में जाकर अपना केन्द्र स्थापित करेंगे। यदि देव नारायण ऐसा
करते तो उत्तर भारत का विप्लव आन्दोलन और भी गौरवमय रूप धारण
करता।¹
रंगीसिंह के पुत्र गंगा सिंह चन्देल जो नयागंज, थाना-परौर,
जलालाबाद के निवासी थे, मैनपुरी काण्ड में फरार रहे। गंगा सिंह का
छद्म नाम ‘रामनाथ चिरईया' था। 1 सितम्बर 1918 में मोहल्ला रंग
महला (शाहजहाँपुर) शक्ति सिंह के मकान के कमरे में विस्फोटक
पदार्थयुक्त बोतल गंगा सिंह के हाथ से फट गयी। पुलिस का आरोप था
कि 25 जून 1918 को मिशन हाई स्कूल, मैनपुरी की विज्ञान प्रयोगशाला
से तेजाब व पारा की जो बोतलें चुराई गई थी,

  1. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-93
    49

उसका प्रयोग गंगासिंह विस्फोटक सामग्री बनाने में करते थे।¹ शाहजहाँपुर
के राजाराम की चर्चा की जा चुकी है, जो अशफाक के प्रेरणादायक बने
थे। अशफाक ने राजाराम के विषय में लिखा भी है। यहाँ थोड़ी और
चर्चा आवश्यक जान पड़ती है। राजाराम की पुष्टि शक्ति प्रसाद (मकान
मालिक) और उनके नौकर वजीर खाँ ने की। मिशन स्कूल के हेड
मास्टर रूफस चरन के सामने राजाराम की तलाशी ली गई। पुलिस के
अनुसार निम्नलिखित आपत्तिजनक सामग्री मिली।
(क) बास्टक से एक डायरी जिसमें 17 मार्च 1917 से 18 अक्टूबर 1918 तक
की कई प्रविष्टियाँ अंग्रेजी में राजाराम की हस्तलिपि में मिली थीं।
(ख) टोपी से एक कागज
(ग) एक कागज जो उन्होंने फाड़कर फेक दिया तथा पुलिस ने उसे जोड़ा।
इसके अतिरिक्त राजाराम के कमरे से दो नकली मूँछे मिली। इसी प्रकार
की मूंछे जून 1918 में बरेली में डाली गयी डकैती के स्थान से मिली थी।
उनके कमरे में शस्त्रों के अवशेष पाये गये तथा स्वदेशी शपथ की 242
छपी प्रतियाँ मिली।²
मुखबिर सोमदेव के अनुसार राजाराम भारतीय संडा खेड़ा व परेली
की डकैती में शामिल थे। उन्होंने स्वाधीनता की प्रतियाँ शाहजहाँपुर व
दिल्ली में बेची। राजाराम बाजपेई का छद्म नाम गौतम था जबकि
राजाराम का कथन था कि वह आर्य कुमार सभा तथा सेवा समिति का
स्वयं सेवक था तथा उसकी शाखा उसने अपने ग्राम में स्थापित की।
सोमदेव के अनुसार राजाराम एक गुप्त संगठन 'मातृवेदी' के सदस्य थे।
डायरी में 'हरि' 'गणेश' व 'लक्ष्मण' नाम की चर्चा थी।

  1. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-90
  2. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-91
    50

यह छद्म नाम देव नारायण भारतीय, प्रताप सिंह और गोविन्द सिंह
के थे।$^1$ डायरी में 18 अक्टूबर 1917 की एक प्रविष्टि में कहा गया था-
जी०एस० (गंगा सिंह) द्वारा जीवन दान दूँगा।'' पुलिस का कहना था कि
यह गुप्त संगठन के सदस्य बनने की शपथ थी। लेकिन चतुर राजाराम
का कहना था कि उनके पिता उनकी शादी कराना चाहते थे परन्तु उन्होंने
शिक्षा पूरी न होने तक शादी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने गंगा
सिंह द्वारा मुझ पर दबाव डलवाया, अतः इन शब्दों का सम्बन्ध
'जी०एस०' द्वारा विवाह सम्बन्ध जुड़ने से था।'' डायरी के 2 मार्च 1918
की प्रविष्टि में कहा गया कि समस्त क्रांतिकारी पैम्पलेट रात में तैयार कर
लिए गये। पैम्पलेट में लिखा था - 'अंग्रेजों को मारो तथा देश को
आजाद करो। वन्दे मातरम्।''....‘‘देश भक्तों! देश की सुरक्षा हेतु शिवाजी
तथा प्रताप के समान अपनी तलवारों को म्यान से निकालो। फिरंगियों
को मारकर उनकी लाशों को बोरों में भरो। एक स्वर से कहो कि
हिन्दुस्तान आजाद है''$^2$ जो कागज राजाराम ने फाड़कर फेंका था, उनके
टुकड़ों को जब जोड़ा गया तो उससे जो शब्द बने वे इस प्रकार है-
'हमारा शरीर अंग्रेजों को मार डालने के काम आये। यह नश्वर शरीर
मातृभूमि को स्वतंत्र कराने हेतु अर्पित है। अंग्रेजों के सिर काट दो और
बता दो कि यह उनके अन्याय का परिणाम है। ऐसे थे राजाराम जो
अशफाक उल्ला खाँ के छात्र जीवन के खिलाड़ी साथी थे।
मैनपुरी षड्यंत्र का खुलासा हो जाने के बाद मुजरिम गेंदालाल
दीक्षित को ग्वालियर से मैनपुरी जेल लाया गया। पुलिस को मुखबिर
द्वारा यह सूचना मिली की मैनपुरी काण्ड में मुख्य व्यक्ति और सर्वे-सर्वा
गेंदालाल दीक्षित है।


  1. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-91
  2. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-92

51

मैनपुरी जेल में दीक्षित जी को तपेदिक रोग हो गया। ग्वालियर और
मैनपुरी में उन पर मुकदमा चल रहा था। उन्हें यह ज्ञात हो गया था कि
उन्हें या तो फाँसी दे दी जायेगी या काला पानी की सजा। गेंदालाल जी
बुद्धि के तेज थे वे किसी भी आफत-विपत्ति से उबरने का मार्ग ढूँढ़ लेते
थे। इस हेतु भी उन्होंने एक युक्ति निकाली, उन्होंने कहा कि वह स्वयं
मुखबिर बनना चाहते हैं। उन्होंने पुलिस को यह भी विश्वास दिलाया कि
वह क्रांतिकारियों को पकड़वा देंगे। पुलिस प्रसन्न हो गयी कि क्रांतिकारी
दल का प्रमुख नेता मुखबिर बनना चाहता है। उन्हें जेल से निकालकर
दूसरे सरकारी गवाहों के निकट रखा गया। वहाँ सारा विवरण प्राप्त कर
रात्रि के समय सरकारी गवाह रामनारायण को लेकर वे भाग निकले।¹
रामनारायन के भाग जाने के बाद दीक्षित जी कोटा से आगरा पहुँचे और
फिर दिल्ली। वहाँ प्याऊ पर पानी पिलाने की नौकरी की लेकिन रोग तो
बढ़ता ही गया। अन्त में वे मृत्यु की गोद में समा गये। मरते समय
दीक्षित जी ने पत्नी से कहा-‘मेरा शरीर नष्ट हो जायेगा। मैं मोक्ष नहीं
चाहता, मैं तो चाहता हूँ कि बार-बार इसी भूमि में जन्म लूँ और बार-बार
इसी के लिए मरूँ। ऐसा तब तक करता रहूँ जब तक देश गुलामी की
जंजीर से न छूट जाय।² पं० गेंदालाल दीक्षित का देहावसान 21 दिसम्बर
1920 को हुआ।³ यह अमर शहीद सिर्फ अपनी यादें, अपनी संवेदनाएँ और
अपने ओजस्वी स्वर भारतीय क्रांतिकारियों के लिए छोड़कर सदैव के लिए
विदा हो गया।

  1. मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-94
  2. मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-94
  3. रामप्रसाद बिस्मिल रचनावली, दिनेश शर्मा, पृष्ठ-164
    52

मैनपुरी षड्यंत्र केस का निर्णय :- मैनपुरी षड्यंत्र केस का निर्णय
1 सितम्बर 1919 को अंग्रेज न्यायाधीश मि० किस ने सुनाया। इस निर्णय
में दम्भी लाल पांडे, सिद्ध गोपाल, गोपीनाथ को 7 वर्ष की सजा,
श्रीचन्द्रधर जौहरी को 5 वर्ष की सजा, किढ़ोरी लाल गुप्त, मुकुन्दी लाल,
राजाराम बाजपेई, मिजाजी लाल को 3 वर्ष की सजा सुनाई गयी। शिव
चरन लाल शर्मा, प्रभाकर शर्मा, फतहसिंह को जेल और दण्ड दिया गया।
ठाकुर प्रसाद, रामरतन, रामदीन, कालीचरन, शम्भु दयाल सक्सेना साक्ष्य
के अभाव में छोड़ दिये गये।¹ निश्चित ही मैनपुरी काण्ड का प्रभाव
अशफाक उल्ला खाँ पर इतना पड़ा कि उनका जीवन ही बदल गया। वे
आम नागरिकों से ऊपर उठ गये।
मैनपुरी षड्यंत्र के क्रांतिकारियों के गीत :-
गीतों, कविताओं ने ऊर्जायुक्त होने में काफी सहयोग दिया है, यही
कारण है कि क्रांतिकारी इनसे प्रेरणा पाने एवं समर्पित होने का उत्साह
पाते एवं तैयार होते। निश्चित एक लय ही ऐसी है जो मानसिक खुराक
देती है।

  • पं० गेंदालाल दीक्षित द्वारा संचालित 'शिवाजी समिति में गाया जाने वाला प्रिय
    सैनिक गीत -
    'उठो! उठो!! उठो!!!
    'उठो! उठो!! उठो!!!
    बंधन मुक्त करो मैय्या को, हे भारत के वीरो!
    हे भारत के वीरो!!
    नाम कमाया जो पुरखों ने, क्या हम उसे गँवायेंगे
    दूध पिया है भारत माँ का, क्या हम उसे लजायेंगे
  1. मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ 74,75 एवं
    मैनपुरी षणयंत्र केस, पत्रांक सं0 11/919-राजकीय अभिलेखागार,
    लखनऊ।
    53

कर्मवीर बन जाओ प्यारो! हे भारत के वीरो!
बंधन मुक्त करो!...

  • पं० गेंदालाल दीक्षित द्वारा गाये जाने वाले प्रिय गीत इस प्रकार हैं -
    '...नौजवानों यह मौका है, उठो खुल खेलो।
    और जो सर पै बला आये, खुशी से झेलो।।
    देश के नाम पर, सिदके में जवानी दे दो।
    फिर न मिलेंगी ये माता की दुआयें ले लो।।
  • क्रांतिकारियों की प्रतिज्ञा का गीत -
    'है देश को स्वाधीन करना जन्म इस संसार में,
    तत्पर रहूँगा मैं सदा अंग्रेज दल संहार में,
    अन्याय का बदला चुकाना मुख्य मेरा धर्म है,
    मद-दलन अत्याचारियों का यह प्रथम शुचिकर्म है।
    अंग्रेज-रुधिर-प्रवाह में निज पितृगण तर्पण करूँ,
    अंग्रेज सिर सहित भक्ति में जननि के अर्पण करूँ,
    होते हमारे मात जग में पददलित होगी नहीं,
    रहते करोड़ों पुत्र के जननी दुखित होगी नही,
    हे ईश। भारतवर्ष में शतवार मेरा जन्म हो,
    कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो,'
  • क्रांतिकारी शिव कृष्ण द्वारा गाया जाने वाला गीत -
    'जुबां को बन्द करे या मुझे लासीर करे।
    मेरे ख्याल को बेड़ी पिन्हा नहीं सकते।।
    खुशी से जेल को दे या चढ़ाय शूली पर।
    54