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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

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अन्य क्रांतिकारी सदस्य जिनके उपनाम नहीं थे वे इस प्रकार है -
लाल सिंह, भैरो सिंह, टोड़ी सिंह, रामदीन, उल्फत सिंह, किढोरी लाल,
कालीचरन, शिव चरन लाल।¹ पं० गेंदालाल दीक्षित का विचार था कि देश
का शिक्षित समाज इस समयदेश प्रेम की भावना से बिल्कुल शून्य है।
अतः दीक्षित जी को इस शिक्षित समाज से निराशा होने लगी। वे
डाकुओं से सम्पर्क स्थापित करने लगे। दीक्षित जी का मत था कि डाकू
किसी विवशतावश ही डाकू जीवन अपना लेता है। डाकू के पास अदम्य
साहस होता है। यदि उनका उचित मार्ग दर्शन किया जाय तो वे अच्छे
व्यक्ति बन सकते हैं। अपने उद्देश्य में सफल सिद्ध होने को ध्यान में
रखकर गेंदालाल दीक्षित ने साधनों की पवित्रता को गौण समझा। उन्होंने
डाकुओं को अपने संगठन का सदस्य बनाया, वे इनके भीतर अंग्रेजी
सत्ता के प्रति विद्रोह की भावना जगाना चाहते थे और इनकी सहायता
से जेलों पर धावा बोलकर बंदियों को मुक्त कराना चाहते थे। इस प्रकार
वे जेल के कैदियों को भी संगठन का सदस्य बनाना चाहते थे। दीक्षित
जी सशस्त्र क्रांति द्वारा देश को स्वाधीन कराने का सपना देखते थे।² बाद
में पता चला कि दीक्षित जी ने ऐसी उम्मीद कर बड़ी भूल की। जो डाकू
थे भला उनका क्या उपयोग हो सकता था। वे तो आन्दोलन को कलुषित
ही करते। शचीन्द्र नाथ सान्याल ने लिखा है - 'पहले वे भी समझते थे
कि जिस समय आम विद्रोह हो उस समय जेल में बन्द कैदी रिहा कर
दिये जायँ तो उस समय उसमें मदद देंगे, किन्तु बाद को जब साधारण
कैदियों में बहुत दिन रहे तो उनका यह ख्याल बदला।³

  1. मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल पृष्ठ-63
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-29
  3. भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथगुप्त, पृष्ठ-95
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