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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

काकोरी काण्ड के मूल में युवाओं की विचारधारा में क्रांतिकारी
परिवर्तन आया। देश में एक भावना आई कि अंग्रेजों की सत्ता को
चुनौती दी जा सकती है, जो पहले असम्भव प्रतीत होती थी। समय-समय
पर पूरे देश में अनेक गतिविधियों का घटित होना अंग्रेजों के लिए एक
गम्भीर समस्या ही नहीं चुनौती भी बन गयी थी। युवाओं के आदर्श के
रूप में काकोरी काण्ड के शहीद राम प्रसाद, रोशन सिंह, राजेन्द्र लाहिड़ी,
अशफाक उल्ला खां हो गये थे। फांसी से बचे और सजाएं काटने वाले या
फरार क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद, शचीन्द्र नाथ सन्याल, राम कृष्ण खत्री
इत्यादि ने भी आगे चलकर अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों को गति प्रदान
की। युवा क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार की क्रूर नीतियों के बावजूद
आगामी युवा पीढ़ी को भारत माता की सौगन्ध देकर एवं भावनात्मक रूप
से समझाकर अनेक घटनाओं की पूर्णाहुति की। परन्तु दमनात्मक नीतियों
से फरवरी 1931 में इलाहाबाद के एक पार्क में चन्द्रशेखर आजाद के मारे
जाने के बाद पंजाब, उ०प्र० और बिहार में क्रांतिकारी आन्दोलन खत्म हो
गया। अनेक क्रांतिकारी एच०एस०आर०ए० के प्रभाव के कारण मार्क्सवादी
हो गये और जनता सामाजिक क्रांति में विश्वास करने लगी। इनमें से
कुछ कम्युनिस्ट पार्टी में हो गये, कुछ सोशलिस्ट पार्टी और कुछ वामपंथी
दलों में और बहुत से उदारवादी पार्टी में शामिल हो गये।
यह सच था कि हिंसात्मक आन्दोलन की एक सीमा होती है क्योंकि
शहादत एक सीमित समय का युवाओं का उद्गार था। गांधी जी के
आन्दोलन में जनसहभागिता थी, क्योंकि वे अहिंसा को आधार मानकर
अपना आन्दोलन चला रहे
थे। अहिंसा को गांधी जी ने इतना मजबूत अस्त्र माना कि चौरी-चौरा
काण्ड में हिंसा हो जाने से असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया। ये
घटनाएं आम जनता में सहज रूप से इतना विश्वास पैदा करने में सफल
हुई कि आम सहभागिता उदारवादी आन्दोलन में अधिसंख्य हो गयी।
147

इस घटना के दो वर्ष बाद काकोरी ट्रेन डकैती की घटना हुयी, यह
अपने में एक साहसिक कदम था। परन्तु जिस भावना से यह कार्य किया
गया, उसे लम्बे समय तक बरकरार नहीं रखा जा सकता था। क्योंकि वे
जनता को राजनीतिक रूप से उद्वेलित करने या राजनीतिक संघर्ष में
शरीक करने में विफल रहे।
बावजूद इसके काकोरी काण्ड का राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष में अमूल्य
योगदान है। इन क्रांतिकारियों का अनन्य राष्ट्र प्रेम, अटूट प्रतिबद्धता,
अदम्य साहस और गौरवमय बलिदान भारतीय जनता के लिए प्रेरणा स्रोत
बने। उन्होंने अपनी गतिविधियों से राष्ट्रीय चेतना का संचार किया।
युवाओं के प्रेरणास्रोत बने क्रांतिकारियों में मुख्यतः अशफाक उल्ला खाँ ने
सामाजिक एकता की वह मिसाल कायम की जो अद्वितीय है। अभी तक
मुस्लिम समुदाय का योगदान समाज में आलोचना का विषय था, लेकिन
अशफाक के शहीद होने के पश्चात् गौरवमयी अध्याय के रूप में लोगों
द्वारा याद किया जाने लगा। निश्चित ही अशफाक का बलिदान
अतुलनीय है।

148

अध्याय-नौ

अध्याय-नौ
अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ : पत्र कविताएँ, रचना....
(एक रचनात्मक अध्ययन)
किसी के कृतित्व और व्यक्तित्व को समझने के लिए उसके द्वारा
लिखे गये शब्द-अभिव्यक्ति किसी गवाह की तरह आवश्यक हो जाते हैं,
यदि वह व्यक्ति रचनाकार है। अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ एक सतर्क और
संघर्षशील क्रांतिकारी सदस्य थे। अशफ़ाक एक कवि थे, जिनकी कविताएँ
(गीत, गजल, नज़्म) निश्चित ही एक मानवीय संवेदना की यात्रा हैं।
अशफ़ाक उल्ला के वैचारिक पहलू का ज्ञान हमें उनकी कविताओं और
पत्रों से ही मिलता है।
अशफ़ाक के पत्र : - पत्रों के माध्यम से अशफ़ाक ने स्वयं को व्यक्त किया
है। ये पत्र एक बंदी व्यक्ति के हैं। एक क्रांतिकारी के पत्र हैं, एक देशभक्त
युवा के पत्र है, जिसके अपने स्वप्न हैं, अपना सम्मान है, अपनी
मानसिकता है, जहाँ किसी प्रकार की बुनावट या बनावट नहीं है। बिना
किसी छिपाव या दुराव के, आडम्बर के बगैर और ऐसा भी नहीं कि कोई
चीज बेवजह बढ़ा चढ़ाकर कही गयी हो, पत्र पूरी गवाही देते हैं। अशफ़ाक
के पत्र देश के प्रति उनकी कर्तव्य भावना की हार्दिकता को भली प्रकार
समझने में सहायक हैं। सुधीर विद्यार्थी ने कहा है कि, "अशफ़ाक के पत्र
उनके विचारों पर बखूबी रोशनी डालते हैं। यह पत्र स्वतंत्रता संग्राम के
इतिहास का जीवन्त दस्तावेज और राष्ट्र की बहुमूल्य निधि हैं।¹ अशफ़ाक
के पत्रों के आइने में हम अपने अतीत की ओर झाँक कर देख सकते हैं
और नई पीढ़ी इनसे अवश्य ही दिशा लेकर आगे का रास्ता भी साफ कर
सकती है।

  1. अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ, उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -117
    149

अशफाक ने बनारसी लाल को एक पत्र लिखा था जो काकोरी के
मुकदमें में सबूत के तौर पर प्रयोग किया गया - "मैं इस बार कुछ
महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श करना चाहता हूँ। मैंने उर्दू में पत्र
लिखना ठीक समझा। मुझे लेनिन का पता आपके पत्र से मालूम हुआ।
मैं आज ही उन्हें पत्र लिखने का विचार कर रहा हूँ। राम का क्या हाल
है? उनसे मुलाकात होती है या नही? तुम्हें आशिक का जो पत्र मिला है
उसे तुरन्त राम तक पहुँचा दो। राम जितनी जल्दी हो सके मुझे उत्तर दें।
तुम्हें ज्ञात है कि मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है। जिससे मैं काम चला
सकूँ। नौकरी का अर्थ है कि मैं अपनी भावनाओं का खून करूँ। तुम्हें
अच्छी तरह याद है कि मैं स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना चाहता हूँ। मैं तो
स्वतंत्रता का पुजारी हूँ और उसकी एक झलक देखने के लिए प्राण तक
निछावर कर सकता हूँ। दासता की माला चाहे वह किसी प्रकार की हो मैं
उसे अपने गले में पहिनना नहीं चाहता। मैं उसके विचार से ही घंटों
रोता रहता हूँ। लेकिन संबंधियों की इच्छा है कि मैं कोई नौकरी कर लूँ
और अपनी वृद्धा माँ की सेवा करूँ। बात एक हद तक ठीक भी है और
हमारा धर्म भी यही आदेश देता है, परन्तु मुझे मातृभूमि की सेवा का
अवसर न मिलेगा।
यदि आज मैं भोपाल में नौकरी करना चाहूँ तो सर असरार हसन
खाँ साहब मुझे कोई-न-कोई नौकरी दिला देंगे। मेरे भाई ने मुझे उनसे
मिलने के लिए कहा है और उनकी सिफारिश से मुझे फौज में सुबेदारी
तुरन्त मिल सकती है। लेकिन इससे मेरी तमाम योजनाओं पर पानी फिर
जायेगा। मैं केवल इसीलिए तो अपने जीवन से प्यार नहीं करता कि खूब
रूपया कमाऊँ और मौज करूँ, बल्कि मैं तो इसलिए जीवित रहना चाहता
हूँ कि मातृभूमि के लिए स्वतंत्रता प्राप्त करूँ। मैं बड़े से बड़े खतरे की भी
कोई चिन्ता नहीं करता और न मुझे इस बात की फिकर है कि दुनिया
मुझे दीवाना या पागल कहती है।
150

यह मेरा विश्वास है कि मैं इसी के लिए जीऊँगा और इसी के लिए
मरूँगा। यही मैं अनुभव करता हूँ। शाहजहाँपुर की गलियों में घूमते-घूमते
थक गया हूँ।
तुम जानते हो कि मैं गाँव का मालिक हूँ, मेरी माँ जमींदार है
इसलिए मैं जितनी जमीन चाहूँ मुझे मिल सकती है। मैं खेती-बाड़ी करना
चाहता हूँ। लेकिन उसके लिए मेरे पास आवश्यक धन नहीं है। यदि तुम
भी खेती-बाड़ी पसन्द करो तो इस कार्य में कुछ पैसा लगाओ और आओ
हम तुम दोनों वहाँ चलकर रहें। इस तरह हम अपने किसान भाइयों के
बीच रहेंगे और अपनी योजनाओं को कार्य रूप में परिणत करेंगे और
इस तरह कुछ ही वर्षों में हमारे पास धन भी एकत्र हो जायेगा। तब हम
बड़े पैमाने पर प्रचार कर सकेंगे और दूसरे मित्रों से कहेंगे कि वे भी हमारे
साथ आकर रहे और काम करें। तात्पर्य यह है कि यदि संसार में कोई
पवित्र और लाभदायक काम हो सकता है तो वह खेती ही है लेकिन यदि
तुम न करना चाहो और अगर अस्वीकार कर दिया तो उससे मेरा दिल
टूट जायेगा। तुम्हें हर हालत में अपने बाल-बच्चों के लिए कुछ न कुछ
करना ही पड़ेगा। तब फिर क्यों न खेती ही शुरू कर दी जाय। पूँजी
तुम्हारी, भूमि मेरी और श्रम हम दोनों का। हम दोनों सांसारिक बाधाओं
का सामना करने के लिए गाँव में सगे भाइयों की तरह रहेंगे और संसार
को दिखा देंगे कि संसार में नवयुवकों के लिए कौन सा काम सम्भव
नहीं। परन्तु यह आवश्यक है कि उसका दिल एक हो, इरादा एक हो और रास्ता
एक हो। नंदिया और सालपुर की जमीनें हमारे लिए गोद पसारे हुए है और
फिर प्रेम से हमारी बाट जोह रही हैं। वहाँ के किसान हमारे स्वागत के
लिए तैयार है। इसलिए प्यारे भाई, उन जमीनों को निराश न करो,
किसानों के दिल न तोड़ो और मुझे अपने निर्णय से सूचित करो। क्या
तुम इसके लिए तैयार हो। यदि मेरे पास पूँजी होती तो मैं फौरन काम
शुरू कर देता और तुम्हें अपना भागीदार बना लेता। परन्तु खेद है कि
मेरे पास पाई भी नहीं।
151

मेरे सम्बन्धी किसी भी प्रकार की सहायता करने के बजाय मुझे
दासता के गड्ढे में ही ढकेलना चाहते हैं। वे खेती के महत्व को समझते
ही नहीं कि भारत की स्वतंत्रता किसानों पर निर्भर है। अतः आओ हम
तुम खेती-बाड़ी शुरू कर दें। देखो, देवनारायण और गंगा सिंह खेती-बाड़ी
से कितना लाभ उठा रहे हैं। दो साल बाद बहुत से लोग हमारे साथ आकर
मिलने को तैयार हो जायेंगे। तब हम अपनी योजनाओं को कार्य रूप में
परिपक्व करने योग्य हो जायेंगे।''¹ - वारसी
वारसी कोई और नहीं अशफाक उल्ला खाँ ही हैं जो उपनाम
'वारसी' से रचनाएँ लिखते थे। अशफाक का व्यक्तित्व उक्त पत्र के
माध्यम से स्पष्ट होता है। वे कर्म प्रधान व्यक्ति थे। क्रांति को कर्म से
जोड़ने में उनका विश्वास था। कृषि कार्य को महान कर्म समझना भी
अशफाक को जमीनी सच्चाइयों से जोड़ता है। अशफाक चाहते थे कि वे
अपनी बात आम जनता तक ले जायें। खेती-बाड़ी से एक लाभ तो यह
होगा कि वे किसानों के बीच रहेंगे, अपनी बात कहेंगे, देश प्रेम की
भावनाएं भरेंगे और किसान की सच्चाई जानेंगे। वे आम आदमी की
गहरी पीड़ाओं से परिचित होंगे, समस्याओं पर बहस करेंगे और इसे वे
क्रांतिकारी नेताओं के माध्यम से सत्ता तक अपनी आवाज बुलंद करेंगे।
शायद यही कारण है कि वे किसान के करीब जाना चाहते हैं। पत्र यह
भी कहता है कि हिन्दू-मुसलमान की एकता के लिए अशफाक संकल्पित
थे। बनारसी को अपना सगा भाई समझते थे।
काकोरी काण्ड में अशफाक पर मुकदमा चला। उन्हें लखनऊ से
फाँसी की सजा सुना दी गयी। अशफाक को फैजाबाद जेल में डाल दिया
गया।

  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 117से119 तक
    152

जिला जेल लखनऊ या फैजाबाद जेल (फाँसी घर) से लिखे गये पत्र से
अशफाक के महान क्रांतिकारी जीवन और मातृभूमि के लिए त्याग की
भावना का परिचय मिलता है।
<u>बड़े भाइयों को पत्र</u>
डिस्ट्रिक्ट जेल, लखनऊ
26 फरवरी, 1927
बनाम रियासत उल्ला खाँ साहब!
बसद अदब गुजारिश है कि कल 25 माह हाल को स्पेशल मजिस्ट्रेट
साहब ने तलब किया था कि गवाहों के सफाई की फेहरिस्त वजाहत के
साथ पेश करो ताकि यह मालूम हो सके कि हर एक चार्ज के मुतल्लिक
गवाह पेश करना है? और गवाहान की फेहरिस्त में इख्तसार की जरूरत
है। मैंने इनकार कर दिया कि बगैर भाई से मशविरा किये हुए मैं कोई
राय कायम नहीं कर सकता। लिहाजा 11 मार्च, फिर पेशी की मुकर्रर है।
इस दरम्यान में आप मुझसे जरूर मिल लीजिए मय उन गवाहान की
मुकम्मिल फेहरिस्त, मय बलदियत व सकूनत, जिनका आप ने जिक्र
किया था और जब आप जेल पर आयें, हजेला साहब को हमराह
लाइएगा। उस रोज के वास्ते वक्त आध घंटे से ज्यादा दिया जायेगा और
भी सबको साथ लाइएगा।
खादिम
अशफाक.....1

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -132
    153

बड़े भाई रियासत उल्ला खाँ के नाम दूसरा पत्र
डिस्ट्रिक्ट जेल, लखनऊ
19 जून 1927
खत बनाम रियासत उल्ला खाँ,
भाई साहब किबलाबाद, आदाब अर्ज है कि इस इतवार को हस्बे
वायदा आं जनाब का सख्त इन्तजार रहा। आपकी इस इतवार को सख्त
जरूरत थी। खैर अगली इतवार को जरूरत बिल जरूर मय वालिदा
साहिबा वगैरह आइएगा। अब सिर्फ तीन इतवार दरम्यान में हैं। क्योंकि
13 जुलाई को फैसला हो जायेगा। मैंने जो लिफाफा वालिदा साहिबा को
लिखा था, जिसकी बावत आपने कहा था, लेते आइएगा। बख्शी के
वालिदा कानपुर जाने वाले थे। आपका इन्तजार करते रहे, मगर वह
गालिबन आजकल में चले जायेंगे। आप भी ठीक करा लीजिए। मेरी
गजल भी हमराह भेज दीजिएगा, जिसको आपने दरयाफ्त किया था।
बहार आई है शोरिश जनूने सामां की। मगर मुझसे मिलकर जाइएगा।
अलीगढ़ का जाने का इरादा ही रहा, या जाइएगा भी? फैजाबाद भी जरूर
चले जाइएगा। वक्त कम है, लम्बे चौड़े खत लिखने की अब जरूरत नहीं
है। यूँ कार्ड लिख दिया। आप खुद अक्लमन्द हैं। जो मुनासिब समझें
करें। दवा हो चुकी, अब दुआ बाकी है। बब्बन व आशिक वगैरह से
सलाम कह दीजिए। मुलाकात के बारे में भी कह दीजिएगा। फोटो की एक
कापी बख्शी के वालिद को दे दीजिएगा। बख्शी की ख्वाहिश है। मगर
अपने हमराह लाइएगा ताकि हम भी देख लें। ज्यादा क्या लिखूँ।$^1$

  • अशफाक वारसी
  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -133
    154

<u>जिला जेल फैजाबाद से लिखा गया पत्र</u>
डिस्ट्रिक्ट जेल, फैजाबाद
21 जुलाई 1927
बनाम रियासत उल्ला खाँ,
जनाब भाई साहब क़िबला बसद अदब गुजारिश है कि मैं बखैरियत
हूँ और व आफियत आप लोगों की बदरगाहे रब्बे बेनियाज
नेक-मतलूब-कार्ड मुरसिला पहुँचा- हालात से आगाही हुई। ऐनुद्दीन साहब
के बारे में जो लिखा है उनके लिए मुझे किसी का एक शेर याद आ
गया। लिखे देता हूँ -
‘‘की मेरे कत्ल के बाद उसने जफा से तौबा
हाय उस ज़ूद यशेमाँ का यशेमाँ होना।’’
जिस-जिस ने मुझे फँसाने की कोशिश की उन सबका शुक्रिया।
अगर मेरी जान की कुर्बानी उन लोगों के मुफीदकार हो तो जहे किस्मत।
मैं भला कहाँ तक काबिल था कि मैं दुनिया में किसी तरक्की व नामवरी
का बाइस होता। जिन्दगी और मौत यह तो दुनिया में चला ही जाता है।
अगर मौत और जिन्दगी का साथ न होता तो न तो जिन्दगी का ही
मजा रहता और न कोई मौत का ख्याल करता और न खुदा की खुदाई
मानता। जो पैदा हुआ और कुरये आलम की हवा में साँस ली, उसके
लिए मौत जरूरी हो गयी। अज़आदम ताईदम। बड़े-बड़े अंबिया औलिया
व अतकिया पहलवानानेतुहमतन हसीनानेदहर गर्ज की सभी किस्म के
आदमी आए और अपना-अपना पार्ट दुनिया के स्टेज पर खेल खेलकर
चले गये। अब न मूसा हैं, न फिरऔन, न यूसुफ है न अजीजे मिस्त्र, न
कृष्ण हैं न कंस, न राम हैं न रावण, न कारून हैं न उनका खजाना
और न इमामहुसैन है न यजीद।
155

हाँ अगर उनकी याद, उनके कारनामे, उनके आमाल व अकवाल दुनिया
के सामने मौजूद हैं और वह उनसे अच्छा या बुरा नतीजा निकालती है।
दुनिया में आज मुझ पर इन डकैतियों के इलजाम में फाँसकर सजा दे दी
जाए, दे लें, हम बेवश हैं। हाँ मगर हाँ, मुंसिफेहकीकी के यहाँ फैसला
जरूर होगा, वहाँ न सी०आई०डी० की चालबाजी और न पब्लिक
प्रासीक्यूटर के ही आरगूमेंट चलेंगे। दूध का दूध और पानी का पानी
होगा, मुझे इत्मीनान है, मुझे सुकून है, मैं खुश हूँ। मेरा फर्ज और क्या
है, राजी बरजाए मौला रहना।
‘’फैज़े मुहब्बत से है, कैदे मेहन
मेरे लिए एक बलाए हुस्न।’’
खुदा का खुद कौल है दुनिया में कुछ होता है मिनजानिब अल्लाह
होता है। यह हमारा ईमान है।...यह भी खुदा की मर्जी है कि मैं फाँसी
की कोठरी में बन्द किया गया और इसमें भी कोई भलाई योशीदा है जो
बादी उन नजर में हम लोगों को नहीं मालूम होती। आप लोगों को
सब्रो-शुक्र से काम लेना चाहिए और जनाबे वालिदा साहिबा को अपनी
नजर खुदा की तरफ करनी चाहिए।
‘’अजब क्या है जो बेड़ा गर्क होकर फिर उभर आये,
कि हमने इनकलाबे चर्खे गरदूँ यूँ भी देखे हैं।’’
खुदा में बड़ी ताकत है, वह सबकुछ कर सकता है। दुआ करना
इनसान का काम है, कबूल करना उनका। अगर जिन्दगी की रस्सी दराज़
है, तो फैजाबाद से एक दिन दूसरी जगह जरूर जायेंगे। वरना यहीं से
जिन्दगी की आखिरी साँस लेकर दुनिया को खैरबाद कहेंगे और फिर
रोजेकयामत ज़मीने फैजाबाद ही से उठकर खुदायेरब्बेजलील से फरयारी
होंगे। बहरहाल अभी तो कुछ महीने उम्मीदे जीस्त है, यह भी बहुत काफी
है। आप सबको मेरा समझाना बेकार है, क्योंकि मैं आप सबका छोटा हूँ।
आप लोग खुद अक्लमन्द है। मेरे मुकदमें की अपील की समायत शुरू
हो गयी होगी। न मालूम कैसा रंग है।
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आप हजेला साहब और गुप्ता साहब को लिख दीजिएगा कि मुझको
बराबर मुत्तिला करते रहेंकि रंग क्या है। और नतीजे से मुफस्सिल तौर
पर इत्तला दें। बख्शी के वालिद का क्या रहा? और उनकी बहन वगैरह
गई या अभी नहीं? सब मुफस्सिल लिखियेगा। बख्शी के वालिद के
मुकदमें का फैसला जो भी हो लिखिएगा। अपील यहाँ भेज दी है। कल
नकले-फैसला भी थी। वह खुद वहाँ वापस हो जायेगी। देखिए वकील कौन
लिया जायेगा।
आप लखनऊ चौधरी साहब से आकर मिलिएगा और मेरा सलाम
कह दीजिएगा कि मेरे केस को आप करें और दीगर कार्यवाहियों से
गाफिल न हों। अपील में चौधरी साहब का नाम, हजेला साहब का नाम
लिख दिया है। अब देखिये कौन मिले। मगर आप कौंसिल के मुतालिक
गाफिल न रहिएगा। अपना आदमी चीफ कोर्ट के अन्दर होना जरूरी है।
हजेला साहब से सलाम कह दीजिएगा, ज्यादा क्या लिखूँ। भाई साहब
अगर आएँ और फल लाएँ तो वह गालिबन मुझको मिल सकते हैं।
लखनऊ जेल में बनिस्बत यहाँ के ज्यादा आराम था। आज तक तो वही
खाना मिलता है जो एक अख़लारी मुजरिम को मिलता है। मगर आज
से शायद सुपरिटेंडेंट साहब कुछ बेहतर दें। मगर कहाँ लखनऊ जेल और
कहाँ फैजाबाद -
‘‘हजार शेख़ ने दाढ़ी बढ़ाई सन की-सी,
वलै वह बात कहाँ मौलवी मदन की-सी’’
खैर फीअमानिउल्ला बुजुर्गों की खिदमत में आदाब दस्तबस्ता कुबूल हो।
बच्चों को प्यार, छोटो को दुआ-
157

''हसरत बहुत है मरतबाए-आशकी बुलंद,
मुझको तो मुफ्त लोगों ने मशहूर कर दिया।''
खुदा का शुक्र है, यह दिन भी गुजर जायेंगे। राम प्रसाद का कौन
वकील है या खुद वह चीफ कोर्ट में लाए जायेंगे। और कौन-कौन
किस-किसकी तरफ से है। और जाहिर क्या असबाब है? भाई साहब जब
यहाँ आएँ तो लखनऊ में हज़ेला साहब और गुप्ता जी से मिलकर आएँ
और फल वगैरह भी लेकर आएँ। मुन्नू भैय्या को मेरी खैरियत लिख
दीजिएगा। और वहाँ के अहबाब को सलाम कहिए। जिनको लिखा था,
उनसे सलाम कह दीजिएगा। अगर वह दोनों आ सके तो आ सकते है,
वरना उनकी मर्जी। मुसीबत और दुख में कोई किसी का दोस्त नहीं
होता। बनी के सब साथी और दोस्त हैं, यही हाल उनका भी है, नई
बात नहीं है। मेरा सबको सलाम। उम्मीद है आप मुफस्सिल जवाब देंगे।
सैयद को भी खत लिख देना कि मैं अच्छा हूँ और तुम्हारी सबकी मुहब्बत
का ख्वाह हूँ और लिख दीजिएगा कि बूढ़े को भी सलाम कह दें और मि०
जान को भी सलाम कह दें। अब देखना है कि आखिर क्या रहे। दुआ
करो उससे जिसको तुम नहीं मानते। खैर खुदा मदद फरमाए! आमीन!
यह इबारत बजिनसही लिख दीजिएगा।¹
अशफाक वारसी 'हसरत'
अज़ जिन्दाने, फैजाबाद
29 नवम्बर, 1927
खत बनाम रियासत उल्ला खाँ,
प्यारे भाई साहब, कार्ड मुरसिला आँ जनाब मिला। हालात से अगाही
हुई। कज़ा व कदर में चारा ही क्या है? रंजो-मुसीबत में इला-विल्लाह
पढ़कर सब्र करना चाहिए।

  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 120-123
    158

इससे कब्ल के खत में साफ लिख दिया कि खुदा हर सूरत से माल
से, औलाद से, जानों से, जानवरों से इम्तिहान लेता है, पस जिसने सब
किया, उसने उसे राजी कर लिया। क्योंकि वह साबिर और शाकिर का
साथी है। खुदा ही देता है और खुदा ही लेता है और वह फिर देगा। हर
हाल में शुक्र कीजिए। भाभी को खुदा के सुपुर्द करता हूँ। खैरियत से
मुत्तला फरमाइएगा और उम्मीद है कि इस मर्तबा भाई साहब मुझसे
मुलाकात करने आयेंगे। क्योंकि इस मर्तबा उनसे मुलाकात करने की मुझे
सख्त जरूरत है। मसनवीशरीफ मिल गई, खूब है। भाभी की तरफ से
फिक्र है, जल्द मुत्तला फरमाइए। वालिदा साहिबा व भाई साहब किबला
की खिदमत में आदाब दस्तबस्ता कबूल हो।'''¹
-कैदिए ज़िंदाने फ़रंग अशफ़ाक वारसी
अशफाक उल्ला खाँ जेल से लिखे अपने भाइयों के पत्रों में जिन्दगी
और मौत की बातें बेफिक्र होकर करते हैं, खुदा को याद करते हैं, मृत्यु से
भय नहीं है उनको, वे दार्शनिक भी नहीं बनना चाहते जबकि दार्शनिकता
की झलक मिलती है। ऐसा नहीं है कि मृत्यु सामने हो तो वे डर जायं
या सिर्फ खुदा को याद करें या आसमानी बातें ही करें। वे निडर होकर
लड़ना चाहते हैं अन्तिम सांस तक। बावजूद इसके वे मृत्यु का सामना
करने हेतु स्वागत के रूप में तैयार बैठे हैं। वे जीवन और मृत्यु के बीच
जूझते हुए अपना मानसिक संतुलन एक सामान्य व्यकित की तरह बनाये
हुए हैं। ऐसा भी नहीं है कि वे अति भावुक हो उठे हों। यही उनके
मानसिक व्यक्तित्व की पहचान है। निश्चित ही उनका मानसिक पोषण
उचित वातावरण में हुआ है। वे एक सफल क्रांतिकारी ही नहीं, एक स्वस्थ
विचार वाले व्यकित थे।

  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 123-124
    159

अशफाक उल्ला खाँ बेहद भावुक और संवेदनशील व्यक्ति थे। वे
अपने सम्बन्धों का आदर करते थे और यदि सम्बन्ध आदरणीय हों तो वे
आदर और सम्मान के साथ उसकी मर्यादा भी रखते थे। अशफाक ने
अपनी माँ को कई पत्र विस्तार से लिखे हैं। अशफाक उल्ला का पहला
पत्र जिला जेल लखनऊ से लिखा गया है। वे अपनी माँ को तसल्ली देते
हैं और अपने बलिदान को प्रभावित करते है। स्पष्ट है कि वे अपने कार्य
एवं बलिदान की सार्थकता का गुण गाते हैं। यही नहीं वे अपने खानदान
में स्वयं को गौरवान्वित महसूसते हुए माँ को भी गर्व की याद दिलाते हैं।
माँ को पत्र
डिस्ट्रिक्ट जेल, लखनऊ
जनाब वालिदा साहिबा,
बाद अदब ये गुजारिश - खिदमते बाबरकत है कि बंदा खैरियत है
और सेहतबरी मिजाजे ऑजनाबा नेक मतलूब। 4 जून को मुकदमें की
सुनवाई खत्म हो गयी और असेसरान की राय भी ले ली गयी। यह
सुनकर आपको दुख होगा कि मो अज्जज हिन्दुस्तानी अससेरान ने क्या
राय दी। मैं आपको हरगिज न लिखता मगर मैं इसको अपना फर्ज
खयाल करता हूँ कि अपने मुकदमें के हालात से आपको काफी तौर से
आगाहकर दूँ। यह तो आप जानती ही हैं कि चार असेसरों में से एक का
इन्तकाल हो गया था और तीन बाकी रह गये थे। जिनमें एक खुदातरस
बूढ़े ने हम दोनों को बिल्कुल बेकसूर कहा और दो ने न सिर्फ खुफिया
साजिश करने वाला ही कहा, बल्कि डाकू भी कहा। खैर इसका अफसोस
मुझे तो कुछ भी नहीं, आप करें न करें। यह हिन्दुस्तान ही है जो हम
पर जुल्म कर रहे हैं और वह भी हिन्दुस्तानी ही तो थे जिन्होंने मुझको
इस मुकदमें में ख्वाहमुख्वाह घसीटा।
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अगर अंग्रेज आज मेरे खिलाफ हों और मुझ पर ज्यादती करें, हक
बजानिब है क्योंकि अपने मुल्क को फायदा वह इसी हाल में पहुँचा सकते
हैं कि हम पर हुकूमत करें, मगर तआज्जुब तो इन हिंदुस्तानियों पर है
जो इस तरह ख्वाह्म ख्वाह बगैर वह यह नही जानते कि हकीकतन
उनकी क्या इज्जत अंग्रेज कौम के दिल में है। अंग्रेज किसी भी ऐसे
इंसानों को पसन्द नहीं करते जो काम निकालने की खातिर उनकी पीठ
ठोंक दिया करते है। खैर, मुझे इस मसले पर बहस नहीं करना है। मुझे
तो आपको समझाना है। आपसे इस बात के लिए कहना है कि जो आप
जैसी जईफ के लिए न सिर्फ बेजा बल्कि जुर्म होगा। यानि सबरोसुकून के
बारे में। बजाहिर सब तल्ख मालूम होता है मगर बाद को मीठा फल
लाता है। मैं बचपन से आपकी सब आज़मा तबीयत देखता चला आ रहा
हूँ और आपको एक साबिर और राजीबर जाए मौला पाया...।¹
अशफाक उल्ला खाँ अपने मुकदमें के सम्बन्ध में पुनः अपील करने
की बात अपने पत्रों में करते हैं। वे माँ को लिखे पत्र में अफसोस जताते
हैं कि माँ को उम्र के आखिरी दिनों में तकलीफ होगी। दुख का जिक्र
करते हुए वे संघर्ष का बखान भी करते हैं और कर्बला की याद दिलाते
हैं। अशफाक आगे लिखते हैं-... सब कुछ हुआ और क्यों? महज इसलिए
कि आइन्दा जब किसी पर दुख और तकलीफ आए, वह मिसाल को
सामने रखे और सब्र करे। आपको इस किस्म की मिसालें देना, मेरी
हिमाकत होगी, क्योंकि बफजले तआला आप मुझसे ज्यादा लायक और
वाकिफ हैं। मैं इसे अब मजाक समझता हूँ कि लिखूँ कि मैं बेकसूर हूँ
क्योंकि मेरा सबसे बड़ा कसूर यह था कि मैं मोटा-ताजा हूँ और मिस्टर
खैरात नबी की बहस के मुताबिक मुझको बड़ा मुजरिम होना चाहिए।

  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ - 126-127
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वह मसखरापन कोर्ट में हुआ कि खुदा की पनाह। मुझे तो न
पहले उम्मीद थी न अब है, मगर भाई साहब और लल्लू भैया के कहने
के मुताबिक सफाई वगैरह पेश कर दी और चाराजोई की खैर! अब सुनिए,
आपको मालूम हो जाना चाहिए कि खैरात नबी ने साफ अलफाज में कह
दिया है कि इंतहाई सजा मिलेगी। मेरे लिए तो यह बड़े मजे की बात है।
मेरे लिए इससे ज्यादा फख्र की बात कौन-सी हो सकती है। मेरी माँ से
बढ़कर मेरे खानदान में कौन सी माँ हो सकती है जिसका बेटा जवाँमर्दी
और बहादुरी से, इस्तकामत व इस्तकलाता से रास्तबाज़ी के सास
मासूमियत का जामा पहने हुए, कुर्बानगाहे वतन पर कुरबान हो जाए।
मेरे सकून व इत्मीनान यू है कि मैं अपने को मासूम समझता हूँ और
आपके भी सब के लिए यह काफी है कि आपका मासूम लड़का एक ऐसे
मकसद की खातिर जान से जायेगा जो बड़ा ऊँचा और नेक व पाक है।
इस इजलामात जो मुझ पर लगाये गये हैं मैं कभी भी इसके लिए
तैयार नहीं हूँ। हाँ एक हिन्दुस्तानी होने की वजह से अगर यह तमाम
बातें है तो खैर-दुनियावी बादशाहतें खत्म हो जायेंगी। किब्रो-गरूर मिट्टी
में मिल जायेगा-शौकत और हशमत का कहीं पता भी न होगा मगर हाँ
खुदावंद कुद्दूस के दरबार में वाकियात असली रोशनी में होंगे और वह
हकीम हकीकी जिसने मूसा और फिरऔन का फैसला किया था मेरा भी
करेगा। चन्दरोज जिन्दगी पर खुश होने वाले इंसान जुल्मो तअद्दी करने
वाले सी०आई०डी० के लोग उस दिन मालूम करेंगे कि वे किसके सामने
जवाब-देह हैं। आप खुद पर शाकिर रहिये। सब कीजिए और मेरे लिए
दुआ फरमाइये और अगर उसको मुझे शहादत की इज्जत देना मकसूद है,
तो अजमो-इस्तकलाल जुरअत व हिम्मत भी अता करे और इम्तिहान के
दिन मुझे बहादुर बनाये। आप कभी अफसोस न करें कि मैंने ऐनुद्दीन
साहब और तसद्दुक
साहब के कहने पर अमल किया था। क्या वह इस बात की गारन्टी
कर सकते थे कि मैं न मरूँगा। नहीं, मौत व जिन्दगी खुदावन्दे करीम के
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हाथ में है और दुनियावी ताकतों से बालातर एक ताकत है जो
निज़ामे-आलम को सम्भाले हुए है।
मौत और जिन्दगी का साथ है - जो दुनिया में आया वह एक रोज
जरूर मरेगा-फिर एक ऐसी चीज से, जिसका आना लाजिमी है, जरूरी है
गम करना या खौफ खाना फिजूल व अबस है। मैं अप्रूवर हो सकता था,
मैं इकबाली बन सकता था, मगर दूसरों की जान फंसाने के लिए, अपनी
जिन्दगी बचाने के लिए। वह इन्सान जो अपनी जिन्दगी की खातिर
कमीनी हरकत करता हैं, क्या वह आने वाली नस्लों के लिए बाइजे-नाज
हो सकता है -नहीं, कभी नहीं।
मुझे इत्मीनान है-मुझे खुशी है कि आने वाली नस्ल मुझको डरपोक
और कमीना न कहेगी, बल्कि सच्चा और बहादुर कहेगी। दुनिया महज
इसी पर मरती है कि मरने के बाद उसको बुरे अल्फाज से न याद किया
जाय। मस्जिदें, तालाब, मदरसा, कुएँ बनाकर छोड़ जाते हैं ताकि बाद को
याद रखें जायं। मेरी मासूमियत भी कभी खामोश नहीं की जा सकती।
बस, मुझे कुछ लिखना नहीं। आपको फख्र करना चाहिए कि आपका
बच्चा बहादुरी की मौत मरेगा। अगर मौत से मुकाबला करना पड़े तो
आपको भी एक बहादुर माँ साबित करना होगा-क्या आपकी रगों में
खालिस अफगानी खून नही है। क्या आप मेरी माँ नहीं है। आप पठान
हैं, आप मेरी माँ है। यह आपके ही दूध का ही असर है, जो मैं इन्तहाई
खौफनाक बातों पर भी हँस देता हूँ। आप मुझसे मिलने को आयेंगी,
बोलो व भाभी आयेंगी, मगर बहादुर बनकर आयें, जैसी पहले बनकर
आयी थी। मुझको बहादुर बनाकर वापस जायेंगी। मैं आपसे एक बार
मिलकर जबानी बातचीत करना चाहता हूँ। क्या मौत से पहले खुदा के
हुक्म बिना मुझको कोई मार सकता है या तकलीफ में डाल सकता है।
नहीं, कभी भी नहीं। फिर जो कुछ है सब मिन जानिब अल्लाह
है। इस पर सब्र करना शाने-बन्दगी है। चंद-बंद किसी के याद आ गये,
लिखे देता हूँ। उनको पढ़ लीजिए। लल्लू भैया जब इतवार को आयें तो
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महबूब से मिलते आयें। अगर वह आएं तो हमराह लेते आएँ और बिस्तर
बंद भी जरूर लाये ताकि सामान व बिस्तर वगैरह बाँध कर दे दूँ। बिस्तर
बंद भूलें नही : -
‘‘है अर्ज आज मादरे नाशाद के हुजूर
मायूस क्यों हैं आप अलम का है क्यों वफूर।’’¹
अशफाक ने अपनी माँ को भावुक ही नहीं, वैचारिक पत्र भी लिखा है,
उनके पत्रों में स्पष्ट दिखता है कि वे जुल्म के खिलाफ लड़ने और अपील
करने की बात करते हैं लेकिन अपनी जमीन और हौसला नहीं छोड़ते।
माँ को लिखे पत्र में ढेर सारे शेर और नज़्में लिखकर अशफाक ने अपनी
संवेदना से साक्षात्कार कराया है। उनका एक-एक शेर साहस और प्रेरणा
देता है : -
‘‘सख्ती सही नहीं ईक उठाई कड़ी नही
दुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं।’’²
अशफाक आगे इसी क्रम में लिखते है- ‘इन अशआर को जो किसी
शायर ने लिखे हैं, पढ़िए और खुदा से मदद माँगिये। आप कभी भी यह
ख्याल न कीजिए कि आप नुकसान में है। यहाँ पर मुझे एक किस्सा याद
आ गया। इंग्लैण्ड के एक बड़े शख्स हिन्दुस्तान आये। वह अपनी बीबी
के हमराह आगरे गये। जब ताजमहल पहुँचे तो उनकी बीबी ने कहा कि
अगर कोई वायदा करे कि मेरे मरने के बाद ऐसी आलीशान इमारत जैसा
यह ताजमहल है, बनवाकर मुझे दफन करेगा तो मैं इसी वक्त अपने
गोली मारने को तैयार हूँ।

  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 128-129
  2. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -130
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यह बात उस औरत ने कैसे कही, महज इस वजह से कि मरने के बाद
वह ख्वाहिशमंद थी कि याद की जाए। हर शख्स की ख्वाहिश होती है कि
मर जाने के बाद लोग उसको भूले नहीं और याद करें। मैं भी फख्र
करता हूँ कि ख्वाह मैं इस लायक था, या न था, मगर लोग मुझको
समझते हैं और हरगिज फरामोश न करेंगे। मैं सी०आई०डी० का मशकूर हूँ
कि उसने हमेशा की जिन्दगी दे दी, मेरे खानदान को फख्र करना
चाहिए। जो मैं हूँ, वह मैं खुद जानता हूँ और सी०आई०डी० भी खूब
जानती है। खैर, अब खत्म करता हूँ, खुदा आपको सब्र अता फरमाएं
और मुझको इस्तकलाल दे। भाई साहब, अब्दुल कादिर दादा, बूलू-भाभी,
दिल्ली वाली भाभी, शहादत भाई की दुल्हन को सलाम। रज़ी, अनीसा,
खलील, रुक्कय्या, सुल्ताना, माहजबीन सबको दुआ व प्यार।¹

  • अशफाक उल्ला खाँ
    अशफाक उल्ला खाँ ने परिवार को कई पत्र लिखें हैं। यह पत्र जो
    उन्होंने लिखा है, इसमें स्थान अंकित नही है, लेकिन हस्ताक्षर के नीचे
    तारीख लिख देने से दिनाँक का पता चलता है। एक बात और खास है
    कि उनके पत्र शायराना अन्दाज में लिखे गये हैं और बीच-बीच में शेरो,
    नज़्मों से पत्रों की गम्भीरता तो बढ़ती ही है, रोचक भी है। पत्रों की भाषा
    का प्रभाव देखते बनता है।
    <u>अशफाक उल्ला खाँ का एक और पत्र</u>
    मेरी सोगवार माँ - भाइयों बहनों और अजीजो! यह खत जबकि
    तुम्हारे हाथ में पहुँचेगे, तब मालूम न तुम्हारा क्या हाल होगा। ना मालूम
    उस वक्त मैं जिन्दा रहूँगा या राही-ए-अदम हो चुका हूँगा। मुझे पूरा
    इत्मीनान है कि जेल के हुक्काम यह खत जरूर रवाना कर देंगे। जबकि
    यह मरने वाले की आखिरी ख्वाहिश है।
  1. अशफाक उल्ला खाँ, और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -131
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