अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 187, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ें''हसरत बहुत है मरतबाए-आशकी बुलंद,
मुझको तो मुफ्त लोगों ने मशहूर कर दिया।''
खुदा का शुक्र है, यह दिन भी गुजर जायेंगे। राम प्रसाद का कौन
वकील है या खुद वह चीफ कोर्ट में लाए जायेंगे। और कौन-कौन
किस-किसकी तरफ से है। और जाहिर क्या असबाब है? भाई साहब जब
यहाँ आएँ तो लखनऊ में हज़ेला साहब और गुप्ता जी से मिलकर आएँ
और फल वगैरह भी लेकर आएँ। मुन्नू भैय्या को मेरी खैरियत लिख
दीजिएगा। और वहाँ के अहबाब को सलाम कहिए। जिनको लिखा था,
उनसे सलाम कह दीजिएगा। अगर वह दोनों आ सके तो आ सकते है,
वरना उनकी मर्जी। मुसीबत और दुख में कोई किसी का दोस्त नहीं
होता। बनी के सब साथी और दोस्त हैं, यही हाल उनका भी है, नई
बात नहीं है। मेरा सबको सलाम। उम्मीद है आप मुफस्सिल जवाब देंगे।
सैयद को भी खत लिख देना कि मैं अच्छा हूँ और तुम्हारी सबकी मुहब्बत
का ख्वाह हूँ और लिख दीजिएगा कि बूढ़े को भी सलाम कह दें और मि०
जान को भी सलाम कह दें। अब देखना है कि आखिर क्या रहे। दुआ
करो उससे जिसको तुम नहीं मानते। खैर खुदा मदद फरमाए! आमीन!
यह इबारत बजिनसही लिख दीजिएगा।¹
अशफाक वारसी 'हसरत'
अज़ जिन्दाने, फैजाबाद
29 नवम्बर, 1927
खत बनाम रियासत उल्ला खाँ,
प्यारे भाई साहब, कार्ड मुरसिला आँ जनाब मिला। हालात से अगाही
हुई। कज़ा व कदर में चारा ही क्या है? रंजो-मुसीबत में इला-विल्लाह
पढ़कर सब्र करना चाहिए।
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 120-123
158