अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइससे कब्ल के खत में साफ लिख दिया कि खुदा हर सूरत से माल
से, औलाद से, जानों से, जानवरों से इम्तिहान लेता है, पस जिसने सब
किया, उसने उसे राजी कर लिया। क्योंकि वह साबिर और शाकिर का
साथी है। खुदा ही देता है और खुदा ही लेता है और वह फिर देगा। हर
हाल में शुक्र कीजिए। भाभी को खुदा के सुपुर्द करता हूँ। खैरियत से
मुत्तला फरमाइएगा और उम्मीद है कि इस मर्तबा भाई साहब मुझसे
मुलाकात करने आयेंगे। क्योंकि इस मर्तबा उनसे मुलाकात करने की मुझे
सख्त जरूरत है। मसनवीशरीफ मिल गई, खूब है। भाभी की तरफ से
फिक्र है, जल्द मुत्तला फरमाइए। वालिदा साहिबा व भाई साहब किबला
की खिदमत में आदाब दस्तबस्ता कबूल हो।'''¹
-कैदिए ज़िंदाने फ़रंग अशफ़ाक वारसी
अशफाक उल्ला खाँ जेल से लिखे अपने भाइयों के पत्रों में जिन्दगी
और मौत की बातें बेफिक्र होकर करते हैं, खुदा को याद करते हैं, मृत्यु से
भय नहीं है उनको, वे दार्शनिक भी नहीं बनना चाहते जबकि दार्शनिकता
की झलक मिलती है। ऐसा नहीं है कि मृत्यु सामने हो तो वे डर जायं
या सिर्फ खुदा को याद करें या आसमानी बातें ही करें। वे निडर होकर
लड़ना चाहते हैं अन्तिम सांस तक। बावजूद इसके वे मृत्यु का सामना
करने हेतु स्वागत के रूप में तैयार बैठे हैं। वे जीवन और मृत्यु के बीच
जूझते हुए अपना मानसिक संतुलन एक सामान्य व्यकित की तरह बनाये
हुए हैं। ऐसा भी नहीं है कि वे अति भावुक हो उठे हों। यही उनके
मानसिक व्यक्तित्व की पहचान है। निश्चित ही उनका मानसिक पोषण
उचित वातावरण में हुआ है। वे एक सफल क्रांतिकारी ही नहीं, एक स्वस्थ
विचार वाले व्यकित थे।
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 123-124
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