अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह बात उस औरत ने कैसे कही, महज इस वजह से कि मरने के बाद
वह ख्वाहिशमंद थी कि याद की जाए। हर शख्स की ख्वाहिश होती है कि
मर जाने के बाद लोग उसको भूले नहीं और याद करें। मैं भी फख्र
करता हूँ कि ख्वाह मैं इस लायक था, या न था, मगर लोग मुझको
समझते हैं और हरगिज फरामोश न करेंगे। मैं सी०आई०डी० का मशकूर हूँ
कि उसने हमेशा की जिन्दगी दे दी, मेरे खानदान को फख्र करना
चाहिए। जो मैं हूँ, वह मैं खुद जानता हूँ और सी०आई०डी० भी खूब
जानती है। खैर, अब खत्म करता हूँ, खुदा आपको सब्र अता फरमाएं
और मुझको इस्तकलाल दे। भाई साहब, अब्दुल कादिर दादा, बूलू-भाभी,
दिल्ली वाली भाभी, शहादत भाई की दुल्हन को सलाम। रज़ी, अनीसा,
खलील, रुक्कय्या, सुल्ताना, माहजबीन सबको दुआ व प्यार।¹
- अशफाक उल्ला खाँ
अशफाक उल्ला खाँ ने परिवार को कई पत्र लिखें हैं। यह पत्र जो
उन्होंने लिखा है, इसमें स्थान अंकित नही है, लेकिन हस्ताक्षर के नीचे
तारीख लिख देने से दिनाँक का पता चलता है। एक बात और खास है
कि उनके पत्र शायराना अन्दाज में लिखे गये हैं और बीच-बीच में शेरो,
नज़्मों से पत्रों की गम्भीरता तो बढ़ती ही है, रोचक भी है। पत्रों की भाषा
का प्रभाव देखते बनता है।
<u>अशफाक उल्ला खाँ का एक और पत्र</u>
मेरी सोगवार माँ - भाइयों बहनों और अजीजो! यह खत जबकि
तुम्हारे हाथ में पहुँचेगे, तब मालूम न तुम्हारा क्या हाल होगा। ना मालूम
उस वक्त मैं जिन्दा रहूँगा या राही-ए-अदम हो चुका हूँगा। मुझे पूरा
इत्मीनान है कि जेल के हुक्काम यह खत जरूर रवाना कर देंगे। जबकि
यह मरने वाले की आखिरी ख्वाहिश है।
- अशफाक उल्ला खाँ, और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -131
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