अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 190, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंअगर अंग्रेज आज मेरे खिलाफ हों और मुझ पर ज्यादती करें, हक
बजानिब है क्योंकि अपने मुल्क को फायदा वह इसी हाल में पहुँचा सकते
हैं कि हम पर हुकूमत करें, मगर तआज्जुब तो इन हिंदुस्तानियों पर है
जो इस तरह ख्वाह्म ख्वाह बगैर वह यह नही जानते कि हकीकतन
उनकी क्या इज्जत अंग्रेज कौम के दिल में है। अंग्रेज किसी भी ऐसे
इंसानों को पसन्द नहीं करते जो काम निकालने की खातिर उनकी पीठ
ठोंक दिया करते है। खैर, मुझे इस मसले पर बहस नहीं करना है। मुझे
तो आपको समझाना है। आपसे इस बात के लिए कहना है कि जो आप
जैसी जईफ के लिए न सिर्फ बेजा बल्कि जुर्म होगा। यानि सबरोसुकून के
बारे में। बजाहिर सब तल्ख मालूम होता है मगर बाद को मीठा फल
लाता है। मैं बचपन से आपकी सब आज़मा तबीयत देखता चला आ रहा
हूँ और आपको एक साबिर और राजीबर जाए मौला पाया...।¹
अशफाक उल्ला खाँ अपने मुकदमें के सम्बन्ध में पुनः अपील करने
की बात अपने पत्रों में करते हैं। वे माँ को लिखे पत्र में अफसोस जताते
हैं कि माँ को उम्र के आखिरी दिनों में तकलीफ होगी। दुख का जिक्र
करते हुए वे संघर्ष का बखान भी करते हैं और कर्बला की याद दिलाते
हैं। अशफाक आगे लिखते हैं-... सब कुछ हुआ और क्यों? महज इसलिए
कि आइन्दा जब किसी पर दुख और तकलीफ आए, वह मिसाल को
सामने रखे और सब्र करे। आपको इस किस्म की मिसालें देना, मेरी
हिमाकत होगी, क्योंकि बफजले तआला आप मुझसे ज्यादा लायक और
वाकिफ हैं। मैं इसे अब मजाक समझता हूँ कि लिखूँ कि मैं बेकसूर हूँ
क्योंकि मेरा सबसे बड़ा कसूर यह था कि मैं मोटा-ताजा हूँ और मिस्टर
खैरात नबी की बहस के मुताबिक मुझको बड़ा मुजरिम होना चाहिए।
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ - 126-127
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