अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंअशफाक ने बनारसी लाल को एक पत्र लिखा था जो काकोरी के
मुकदमें में सबूत के तौर पर प्रयोग किया गया - "मैं इस बार कुछ
महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श करना चाहता हूँ। मैंने उर्दू में पत्र
लिखना ठीक समझा। मुझे लेनिन का पता आपके पत्र से मालूम हुआ।
मैं आज ही उन्हें पत्र लिखने का विचार कर रहा हूँ। राम का क्या हाल
है? उनसे मुलाकात होती है या नही? तुम्हें आशिक का जो पत्र मिला है
उसे तुरन्त राम तक पहुँचा दो। राम जितनी जल्दी हो सके मुझे उत्तर दें।
तुम्हें ज्ञात है कि मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है। जिससे मैं काम चला
सकूँ। नौकरी का अर्थ है कि मैं अपनी भावनाओं का खून करूँ। तुम्हें
अच्छी तरह याद है कि मैं स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना चाहता हूँ। मैं तो
स्वतंत्रता का पुजारी हूँ और उसकी एक झलक देखने के लिए प्राण तक
निछावर कर सकता हूँ। दासता की माला चाहे वह किसी प्रकार की हो मैं
उसे अपने गले में पहिनना नहीं चाहता। मैं उसके विचार से ही घंटों
रोता रहता हूँ। लेकिन संबंधियों की इच्छा है कि मैं कोई नौकरी कर लूँ
और अपनी वृद्धा माँ की सेवा करूँ। बात एक हद तक ठीक भी है और
हमारा धर्म भी यही आदेश देता है, परन्तु मुझे मातृभूमि की सेवा का
अवसर न मिलेगा।
यदि आज मैं भोपाल में नौकरी करना चाहूँ तो सर असरार हसन
खाँ साहब मुझे कोई-न-कोई नौकरी दिला देंगे। मेरे भाई ने मुझे उनसे
मिलने के लिए कहा है और उनकी सिफारिश से मुझे फौज में सुबेदारी
तुरन्त मिल सकती है। लेकिन इससे मेरी तमाम योजनाओं पर पानी फिर
जायेगा। मैं केवल इसीलिए तो अपने जीवन से प्यार नहीं करता कि खूब
रूपया कमाऊँ और मौज करूँ, बल्कि मैं तो इसलिए जीवित रहना चाहता
हूँ कि मातृभूमि के लिए स्वतंत्रता प्राप्त करूँ। मैं बड़े से बड़े खतरे की भी
कोई चिन्ता नहीं करता और न मुझे इस बात की फिकर है कि दुनिया
मुझे दीवाना या पागल कहती है।
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