अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाकोरी काण्ड के मूल में युवाओं की विचारधारा में क्रांतिकारी
परिवर्तन आया। देश में एक भावना आई कि अंग्रेजों की सत्ता को
चुनौती दी जा सकती है, जो पहले असम्भव प्रतीत होती थी। समय-समय
पर पूरे देश में अनेक गतिविधियों का घटित होना अंग्रेजों के लिए एक
गम्भीर समस्या ही नहीं चुनौती भी बन गयी थी। युवाओं के आदर्श के
रूप में काकोरी काण्ड के शहीद राम प्रसाद, रोशन सिंह, राजेन्द्र लाहिड़ी,
अशफाक उल्ला खां हो गये थे। फांसी से बचे और सजाएं काटने वाले या
फरार क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद, शचीन्द्र नाथ सन्याल, राम कृष्ण खत्री
इत्यादि ने भी आगे चलकर अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों को गति प्रदान
की। युवा क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार की क्रूर नीतियों के बावजूद
आगामी युवा पीढ़ी को भारत माता की सौगन्ध देकर एवं भावनात्मक रूप
से समझाकर अनेक घटनाओं की पूर्णाहुति की। परन्तु दमनात्मक नीतियों
से फरवरी 1931 में इलाहाबाद के एक पार्क में चन्द्रशेखर आजाद के मारे
जाने के बाद पंजाब, उ०प्र० और बिहार में क्रांतिकारी आन्दोलन खत्म हो
गया। अनेक क्रांतिकारी एच०एस०आर०ए० के प्रभाव के कारण मार्क्सवादी
हो गये और जनता सामाजिक क्रांति में विश्वास करने लगी। इनमें से
कुछ कम्युनिस्ट पार्टी में हो गये, कुछ सोशलिस्ट पार्टी और कुछ वामपंथी
दलों में और बहुत से उदारवादी पार्टी में शामिल हो गये।
यह सच था कि हिंसात्मक आन्दोलन की एक सीमा होती है क्योंकि
शहादत एक सीमित समय का युवाओं का उद्गार था। गांधी जी के
आन्दोलन में जनसहभागिता थी, क्योंकि वे अहिंसा को आधार मानकर
अपना आन्दोलन चला रहे
थे। अहिंसा को गांधी जी ने इतना मजबूत अस्त्र माना कि चौरी-चौरा
काण्ड में हिंसा हो जाने से असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया। ये
घटनाएं आम जनता में सहज रूप से इतना विश्वास पैदा करने में सफल
हुई कि आम सहभागिता उदारवादी आन्दोलन में अधिसंख्य हो गयी।
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