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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 297 में से

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पृष्ठ 184

<u>जिला जेल फैजाबाद से लिखा गया पत्र</u>
डिस्ट्रिक्ट जेल, फैजाबाद
21 जुलाई 1927
बनाम रियासत उल्ला खाँ,
जनाब भाई साहब क़िबला बसद अदब गुजारिश है कि मैं बखैरियत
हूँ और व आफियत आप लोगों की बदरगाहे रब्बे बेनियाज
नेक-मतलूब-कार्ड मुरसिला पहुँचा- हालात से आगाही हुई। ऐनुद्दीन साहब
के बारे में जो लिखा है उनके लिए मुझे किसी का एक शेर याद आ
गया। लिखे देता हूँ -
‘‘की मेरे कत्ल के बाद उसने जफा से तौबा
हाय उस ज़ूद यशेमाँ का यशेमाँ होना।’’
जिस-जिस ने मुझे फँसाने की कोशिश की उन सबका शुक्रिया।
अगर मेरी जान की कुर्बानी उन लोगों के मुफीदकार हो तो जहे किस्मत।
मैं भला कहाँ तक काबिल था कि मैं दुनिया में किसी तरक्की व नामवरी
का बाइस होता। जिन्दगी और मौत यह तो दुनिया में चला ही जाता है।
अगर मौत और जिन्दगी का साथ न होता तो न तो जिन्दगी का ही
मजा रहता और न कोई मौत का ख्याल करता और न खुदा की खुदाई
मानता। जो पैदा हुआ और कुरये आलम की हवा में साँस ली, उसके
लिए मौत जरूरी हो गयी। अज़आदम ताईदम। बड़े-बड़े अंबिया औलिया
व अतकिया पहलवानानेतुहमतन हसीनानेदहर गर्ज की सभी किस्म के
आदमी आए और अपना-अपना पार्ट दुनिया के स्टेज पर खेल खेलकर
चले गये। अब न मूसा हैं, न फिरऔन, न यूसुफ है न अजीजे मिस्त्र, न
कृष्ण हैं न कंस, न राम हैं न रावण, न कारून हैं न उनका खजाना
और न इमामहुसैन है न यजीद।
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