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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 297 में से

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पृष्ठ 189

अशफाक उल्ला खाँ बेहद भावुक और संवेदनशील व्यक्ति थे। वे
अपने सम्बन्धों का आदर करते थे और यदि सम्बन्ध आदरणीय हों तो वे
आदर और सम्मान के साथ उसकी मर्यादा भी रखते थे। अशफाक ने
अपनी माँ को कई पत्र विस्तार से लिखे हैं। अशफाक उल्ला का पहला
पत्र जिला जेल लखनऊ से लिखा गया है। वे अपनी माँ को तसल्ली देते
हैं और अपने बलिदान को प्रभावित करते है। स्पष्ट है कि वे अपने कार्य
एवं बलिदान की सार्थकता का गुण गाते हैं। यही नहीं वे अपने खानदान
में स्वयं को गौरवान्वित महसूसते हुए माँ को भी गर्व की याद दिलाते हैं।
माँ को पत्र
डिस्ट्रिक्ट जेल, लखनऊ
जनाब वालिदा साहिबा,
बाद अदब ये गुजारिश - खिदमते बाबरकत है कि बंदा खैरियत है
और सेहतबरी मिजाजे ऑजनाबा नेक मतलूब। 4 जून को मुकदमें की
सुनवाई खत्म हो गयी और असेसरान की राय भी ले ली गयी। यह
सुनकर आपको दुख होगा कि मो अज्जज हिन्दुस्तानी अससेरान ने क्या
राय दी। मैं आपको हरगिज न लिखता मगर मैं इसको अपना फर्ज
खयाल करता हूँ कि अपने मुकदमें के हालात से आपको काफी तौर से
आगाहकर दूँ। यह तो आप जानती ही हैं कि चार असेसरों में से एक का
इन्तकाल हो गया था और तीन बाकी रह गये थे। जिनमें एक खुदातरस
बूढ़े ने हम दोनों को बिल्कुल बेकसूर कहा और दो ने न सिर्फ खुफिया
साजिश करने वाला ही कहा, बल्कि डाकू भी कहा। खैर इसका अफसोस
मुझे तो कुछ भी नहीं, आप करें न करें। यह हिन्दुस्तान ही है जो हम
पर जुल्म कर रहे हैं और वह भी हिन्दुस्तानी ही तो थे जिन्होंने मुझको
इस मुकदमें में ख्वाहमुख्वाह घसीटा।
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