अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
रोटी, आवास, कपड़े के लिए प्रयास करना चाहिए।¹
कुछ अन्य दस्तावेज भी अशफाक के बक्से से प्राप्त हुए। उनमें से
एक पत्र भी था, जो अशफाक ने अपने माता-पिता को लिखा था।
अशफाक पत्र द्वारा सूचित करते हैं कि वे अभी भारत में ही हैं। अभी न
तो उपयुक्त समय आया है और न ही अवसर ही प्राप्त हुआ है। योजना
बनायी जा रही है। स्पष्ट है कि अशफाक भारत छोड़ना चाहते हैं।² एक
अन्य पत्र जो मौलाना मजिद को है। अशफाक इस पत्र में अपनी फरारी
का जिक्र करते हैं और भारत छोड़ने की मदद मांगते हैं। अशफाक ने दो
रास्ते भी सुझाये हैं। एक रास्ता पासपोर्ट और दूसरा आर्थिक सहायता हेतु
है। वे यह भी लिखते हैं कि यदि पर्याप्त धन वे पा जायें तो बचकर भाग
भी सकते हैं। एक सुझाव वे यह भी देते हैं कि - हो सके तो जहाज में
क्लर्क की नौकरी की व्यवस्था कर दें और मैं जहाज से बम्बई से जर्मनी
चला जाऊं।³ एक अन्य पत्र मौलाना अब्दुल कादिर को लिखा गया है, जो
अवकाश प्राप्त डिप्टी कलेक्टर हैं। अशफाक उल्ला से वे संबंधित है।
अब्दुल कादिर की बन्दूक अशफाक के पास मिली। इस पत्र में भी अपने
जीवन को खतरे में बताते हैं और आर्थिक सहायता की गुहार करते हैं।
वे इस पत्र में हैदराबाद प्रवेश करना चाहते हैं।
पत्रों की श्रृंखला में एक पत्र बहन को लिखा गया है। इस पत्र में
अपने संबोधनों का जिक्र करते हैं और बेदार का नाम लेते हैं। भगवती
सहाय बेदार शाहजहांपुर के षड्यंत्रकारियों में से एक थे।
- सी0आई0डी0, बायल्यूम-2, काकोरी षड्यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ-41
- सी0आई0डी0, बायल्यूम-2, काकोरी षड्यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ-44
- सी0आई0डी0, बायल्यूम-2, काकोरी षड्यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ-45
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अशफाक द्वारा कोर्ट में दिये गये बयानों से 'रिपब्लिक' का अर्थ
कम्यूनिज़्म लगाया गया था। निश्चित ही अशफाक कम्युनिष्ट सिद्धांतों के
पक्षधर थे और उनके पास एक 'कम्युनिष्ट मैनीफेस्टो' पुस्तक भी प्राप्त
हुई थी।
अशफाक दिल्ली में गिरफ्तार होने के 15 दिनों के बाद लखनऊ
ला ये गये। सुख दर्शन सिंह, मैनेजर, होटल रायल के सबूत से ज्ञात होता
है कि अशफाक 25 अगस्त को मुरारी मोहन के नाम से आए जो कि
होटल बुक में भी लिखा हुआ है। उनके बाक्स से एक पत्र भी प्राप्त हुआ,
जो दर्शाता है कि अशफाक नाम बदलते रहते थे।¹
अशफाक के तीन-चार मास बाद शचीन्द्र नाथ भी बन्दी बना लिये
गये। काकोरी काण्ड के तहत कुल 43 लोग गिरफ्तार किये गये, जिनके
नाम व कोड निम्नवत हैं :-
केन्द्र गिरफ्तार व्यक्तियों के नाम
1.शाहजहांपुर- राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, रोशन सिंह,
बनारसी लाल, हरगोविन्द, प्रेम किशन खन्ना, इन्द्र भूषण मित्र
2.बनारस - दामोदर स्वरूप सेठ, मन्मथनाथ गुप्त, राम नाथ
पाण्डेय, डी०डी० भट्टाचार्य, इन्द्र विक्रम सिंह, मुकुन्दी
लाल, राजेन्द्र लाहिड़ी, शचीन्द्रनाथ बख्शी
3.कानपुर - वीरभद्र तिवारी, रामदुलारे त्रिवेदी, गोपी मोहन,
राजकुमार सिन्हा, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य।
4.इलाहाबाद - शीतला सहाय, भूपेन्द्र नाथ सन्याल, शचीन्द्र नाथ
सन्याल
- सी०आई०डी०, काकोरी षड़यंत्र केस-1, उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ-46
126
केन्द्र गिरफ्तार व्यक्तियों के नाम
5. आगरा- चन्द्रधर जौहरी, चन्द्रभाल जौहरी, शिव चरन लाल शर्मा
6. लखनऊ- हरनाम सुन्दर लाल, शचीन्द्र विश्वास, गोविन्द चरमकर
7. रायबरेली- बनवारी लाल, कुंवर बहादुर
8. मेरठ - विष्णु दुब्लिश
9. एटा - बाबू राम वर्मा
10. कलकत्ता- शरच्चन्द्र गुप्त, योगेश चन्द्र चटर्जी
11. बहरामपुर- कालिदास बोस
12. लाहौर- मोहन लाल गौतम
13. पूना - राम कृष्ण खत्री
14. जबलपुर- प्रमवेश चन्द्र चटर्जी
15. अन्य व्यक्ति - रामदास शुक्ल, मदन लाल, भैरो सिंह, राम रत्न
शुक्ल¹।
गिरफ्तारी के बाद वास्तविक मामला शुरू होने के पहले ही पन्द्रह
व्यक्तियों को छोड़ दिया गया। इन व्यक्तियों के विरुद्ध सरकार को कोई
प्रमाण न मिला। पुलिस का एक उद्देश्य यह भी था कि मुकदमें में
जनता की सहानुभूति बनी रहे। इसी कारण पुलिस ने प्रतिष्ठित लोगों को
छोड़ दिया। रिहा कर दिये गये व्यक्तियों के नाम निम्नवत् हैं - शीतला
सहाय, चन्द्रधर जौहरी, चन्द्रभाल जौहरी, मदन लाल, रामरत्न शुक्ल,
मोहन लाल गौतम, हरनाम सुन्दर लाल, डी०डी० भट्टाचार्य, बाबूराम
वर्मा, गोपी मोहन, शरच्चन्द्र, भैरो सिंह, कालिदास बोस, इन्द्र विक्रम
सिंह, रामदास शुक्ला।²
- राम प्रसाद बिस्मिल, रचनावली, सम्पादक दिनेश शर्मा, पृष्ठ -4
- राम प्रसाद बिस्मिल, रचनावली, सम्पादक दिनेश शर्मा, पृष्ठ -5
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शेष 28 व्यक्तियों पर निम्नलिखित अभियोग लगाये गये।
1- धारा 121 - ब्रिटिश सम्राट के विरुद्ध युद्ध की घोषणा
2- धारा 120 - राजनीतिक षड़यंत्र करना
3- धारा 369 - हत्या तथा डकैती
4- धारा 302 - हत्या¹
न्यायिक प्रक्रिया-
काकोरी काण्ड के सभी बन्दी लखनऊ में रखे गये। गुप्तचर विभाग
ने ऐसा प्रबन्ध किया था कि ये बन्दी आपस में न मिल सकें। पहली बार
बन्दी बनाये गये अभियुक्तों को सरकारी गवाह बनाने का खूब प्रयास
हुआ। वैसे तो काकोरी काण्ड में दस व्यक्तियों ने भाग लिया था। लेकिन
28 अभियुक्तों पर चार्जशीट लगायी जानी थी। शाहजहाँपुर के बनारसी
लाल और इन्द्र भूषण मित्र मुखबिर बन गये। डकैती में भाग लेने वाला
बनवारी लाल इकबाली गवाह बन गया। कानपुर का गोपी मोहन भी
गवाह बन गया। कुंवर बहादुर ने भी सरकारी गवाह बनना स्वीकार कर लिया।
सेठ दामोदर स्वरूप गम्भीर रूप से बीमार हो गये, इसी कारण से वे अदालत से
मुक्त हो गये।
काकोरी काण्ड में पहले बन्दी बनाये गये अभियुक्तों पर 4 जनवरी,
1926 को मुकदमा आरम्भ हुआ। अशफाक और शचीन्द्र नाथ बख्शी बाद
में बन्दी बनाये गये। अतः उन पर मुकदमा भी अलग से चला। योगेश
चटर्जी के कथनानुसार - 'उस समय ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारियों से
निपटने के लिए मुसलमान अधिकारियों पर विश्वास करती थी। क्योंकि
वह सोचती थी कि क्रांतिकारी आन्दोलन मुख्यतः एक हिन्दू आन्दोलन
था।'² ब्रिटिश सरकार की मानसिकता इससे भी जाहिर हो जाती है।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -105
- पूर्वो, योगेश चन्द्र चटर्जी, पृष्ठ -317
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कि क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए अधिकतर अधिकारी मुसलमान
ही थे। सुनवाई के लिए ऐनुद्दीन की अदालत भी मानसिकता को
प्रभावित करती है। ऐनुद्दीन अभियुक्तों के सामने मधुर व्यवहार करता
था, लगता था कि यह व्यक्ति क्रांतिकारियों का शुभचिन्तक है, किन्तु वह
विष भरा सोने का कलश था। योगेश चन्द्र चटर्जी ने लिखा है - ''स्पेशल
मजिस्ट्रेट ऐनुद्दीन किसी भी व्यक्ति के पीछे से छूरा भोंकने में निपुण थे।
.......यदि कोई व्यक्ति उनकी शिनाख्त संबंधी रिपोर्ट पढ़ ले तो तत्काल
समझ जायेगा कि वे क्रांतिकारियों के शत्रु थे।¹
ऐनुद्दीन के विषय में राम प्रसाद बिस्मिल ने भी लिखा है -
''दिखाने के लिए कागजी कार्यवाही खूब साफ रखी गयी। जबान के बड़े
मीठे थे। प्रत्येक अभियुक्त से बड़े तपाक से मिलते थे। बड़ी मीठी-मीठी
बातें करते थे। सब समझते थे कि हमसे सहानुभूति रखते हैं। कोई न
समझ सका कि अन्दर ही अन्दर घाव कर रहे हैं। इतना चालाक अफसर
शायद ही कोई दूसरा हो। जब तक मुकदमा उनकी अदालत में रहा,
किसी को भी कोई शिकायत का मौका ही नहीं दिया। यदि कभी कोई
बात हो जाती, तो वह ऐसे ढंग से उसे टालने की कोशिश करते कि किसी
को भी बुरा नहीं लगता। बहुधा ऐसा भी हुआ कि खुली अदालत में
अभियुक्तों से क्षमा मांगने में भी उन्हें संकोच नहीं होता। किन्तु कागजी
कार्यवाही में वे इतने होशियार थे कि जो कुछ लिखा, सदैव अभियुक्तों के
विरुद्ध। जब मामला सेशन सुपुर्द किया और आज्ञा पत्र में युक्तियां दीं,
तब आंखे खुली कि कितना गहरा घाव मार दिया था।² पुलिस की मदद
ऐनुद्दीन ने खूब किया। क्रांतिकारी खुली गाड़ी में पुलिस स्टेशन लाये
जाते थे।
- पूर्वो, योगेश चन्द्र चटर्जी, पृष्ठ -318
- पूर्वो, राम प्रसाद बिस्मिल, पृष्ठ -96
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पुलिस सादी वर्दी में रहती थी। शिनाख्त के समय भिन्न लोगों के
सामने क्रांतिकारी खड़े किये जाते। शिनाख्त सफल न होती, तब भी
मुकदमा चलाया जाता। कोई भी व्यक्ति जमानत पर नहीं छोड़ा जाता।¹
क्रांतिकारियों की सहायता के लिए एक डिफेन्स कमेटी बनाई गयी,
जिसमें मोती लाल नेहरू, गणेश शंकर विद्यार्थी, शिव प्रसाद गुप्त, गोविन्द
बल्लभ पंत, श्री प्रकाश तथा जवाहर लाल नेहरू किसी न किसी रूप में
सम्बद्ध थे। हरकरन लाल मिश्र, मोहनलाल सक्सेना, चन्द्रभान गुप्त, कृपा
शंकर हजेला, क्रांतिकारियों की ओर से वकील थे। डिफेन्स कमेटी की
ओर से कलकत्ता के बैरिस्टर वी०के० चौधरी को भी मुकदमों की पैरवी के
लिए बुलाया गया था। मोती लाल नेहरू तथा लाला लाजपत राय ने
सार्वजनिक रूप से क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति प्रकट की। श्रीप्रकाश,
आचार्य नरेन्द्र देव सहित अनेक प्रमुख कांग्रेसी नेता क्रांतिकारियों से जेल
में मिलने गये परन्तु सरकार ने आचार्य नरेन्द्र देव को क्रांतिकारियों से
मिलने नहीं दिया।² गणेश शंकर विद्यार्थी का 'प्रताप' समाचार पत्र
क्रांतिकारियों की सबसे अधिक मदद करता था।
स्पेशल मजिस्ट्रेट ऐनुद्दीन ने मुकदमें को सेशन सुपुर्द करने के
आदेश तैयार करने में अधिक समय लगाया। कारण था कि - प्रत्येक
क्रांतिकारी की अत्यधिक खराब तस्वीर पेश करने में उन्होंने कोई कसर
नहीं उठा रखी। उनके न्यायालय में 28 व्यक्तियों पर मुकदमा चलाया
गया। इनमें तीन क्रांतिकारी क्रमशः शचीन्द्र नाथ बख्शी, चन्द्रशेखर
आजाद और अशफाक उल्ला खाँ फरार रहे। दो क्रांतिकारियों से मुकदमा
उठा लिया गया और दो क्रांतिकारी सरकारी गवाह बनाकर छोड़ दिये
गये। शेष 21 व्यक्तियों को सेशन सुपुर्द किया गया।
- पूर्वो, बनारसी दास चतुर्वेदी, पृष्ठ 31-37
- दे लिव्ड डेन्जरसली, मन्मथ नाथ गुप्त, पृष्ठ-166
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अशफाक का मुकदमा - अशफाक का बयान
अशफाक और शचीन्द्र नाथ बख्शी का मुकदमा बाद में चला। यह
मुकदमा पहले ऐनुद्दीन की अदालत में पेश किया गया। अशफाक के बड़े
भाई रियासत उल्ला खां ने चन्द्रभानु गुप्त के कहने पर श्री कृपाशंकर
हजेला को अपना वकील बनाया। 24 मार्च, 1927 को यह मुकदमा सत्र
न्यायालय भेजा गया।¹
अपने बयान में मजिस्ट्रेट के समक्ष अशफाक उल्ला खान ने अपने
विरुद्ध लगाये गये समस्त आरोपों को नकार दिया। उन्होंने कहा कि वे
राम प्रसाद बिस्मिल, हरगोविन्द, प्रेम किशन, बनारसी लाल और
इन्द्रभूषण को ऐसे ही जानते हैं, जैसे शाहजहांपुर के अन्य निवासियों को।
उन्होंने सफेद और पीले पैकेट से संबंधित जानकारी से इंकार किया। यही
नहीं अशफाक ने अपनी गिरफ्तारी के समय पाये गये समस्त कागजात
और पत्रों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने बनारसी लाल से किये गये
पत्राचार को भी इंकार कर दिया। यह भी इंकार किया कि वे 25 और 26
अगस्त, 1926 को रायल होटल दिल्ली में 'मुरारी मोहन' के नाम से टिके
थे।²
अशफाक ने स्वीकार किया कि वे 26 सितम्बर, 1925 को पुलिस के
डर से लुप्त हो गये थे क्योंकि उनके नाम के वारन्ट का पता चला था।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि आबिद रजा खान के नाम से दस्तखत
किया लेकिन यह सब मजाक में ही किया गया था। अशफाक ने बयान
दिया कि उनकी पहचान गवाह के द्वारा उनके फोटोग्राफ जो कि पुलिस
के अधिकार में थे, की वजह से हुई जबकि
1.अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -109
2.सी0आई0डी0, वायल्यूम -2, काकोरी षड़यंत्र केस -उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ-95
131
पहचान के वक्त खैरात नबी पब्लिक प्रासीक्यूटर ने पहचान के विषय में
कोई प्रश्न नहीं किया। यह आरोप झूठे सबूत की वजह से मजिस्ट्रेट खान
बहादुर सैयद ऐनुद्दीन के समक्ष बेकार साबित हुआ, जिससे पहचान को
छिपाये रखे जाने की स्थिति स्पष्ट होती है।¹
इस न्यायालय में अशफाक ने पहचान के विषय में अपने
आब्जेक्शन को विस्तार दिया और कहा कि दिल्ली में उनकी गिरफ्तारी के
पश्चात् उनका चेहरा अनेकों अवसरों पर खुला रखा गया। एक फोटो
उनके बक्से से प्राप्त हुई, जो मजिस्ट्रेट से अनुरोध के बाद भी सील नहीं
किया गया, जिन पांच व्यक्तियों की परेड उनके समक्ष की गयी, उनमें
भी भिन्नता है। बनारसी लाल के संबंधों को भी अशफाक नकारते हैं कि
दो-तीन साल से बनारसी से उनके संबंध नहीं है। अशफाक ने 1924 में
शाहजहांपुर में हुए दंगों के समय राम प्रसाद बिस्मिल से हुए संबंधों को
स्वीकार किया। इसका कारण स्वयं बताते हैं कि यूरोपीयन वस्त्रों की
होली जलाने के कारण बनारसी से संबंध बने। बक्से में रखी
पाण्डुलिपियों की लेखनी (हस्तलिखित) भी वे स्वीकारते हैं। बक्से में
‘मैनीफेस्टो ऑफ कम्युनिस्ट पार्टी’ होने में वे असहजता महसूस करते हैं
और स्वीकारने से कतराते हैं कि किसी ने उनके बक्से में रख दिया होगा
या किसी कारण से बक्से में रख दिया गया होगा।²
अशफाक उल्ला खां ने स्वीकार किया कि 1921 में वे स्कूल छोड़
दिये और असहयोग आन्दोलन में शामिल हो गये। बाद में उन्हें इससे
अरुचि होने लगी और वे पुनः स्कूल में प्रवेश ले लिए, तब तक उन्हें
राजनीति में कोई रुचि नहीं थी।
1.सी0आई0डी0, वाल्यूम -2, काकोरी षड़यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ -95
2.सी0आई0डी0, वाल्यूम -2, काकोरी षड़यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ -96
132
अशफाक की कविताओं का अनुवाद करके यह भी कहा गया कि
अशफाक कवि हैं। अशफाक ने बेदार एम०एल०सी० की जो लाइनें लिखी
हैं, उसका कारण सिर्फ सोचना था कि वे आन्दोलन ज्वाइन नहीं किये हैं,
जिससे उनका नाम पुलिस के पास न जाय। अशफाक ने कहा कि उनके
परिवार ने सरकार को सहयोग ही दिया है। 1857 के आन्दोलन के समय
उनके परिवार ने परिणाम भी भुगते हैं। उनका परिवार सरकार के
खिलाफ षड़यंत्र के विषय में सोच नहीं सकता। उन्होंने अपेक्षानुसार
इसकी गारन्टी देने को कहा।¹
अशफाक ने डिफेंस में चार गवाह सम्मन किये परन्तु 27 गवाहों का
परीक्षण किया गया। अधिकतर गवाहों ने कोर्ट में कहा कि डकैती के दिन
वे किसी अन्य कार्य में व्यस्त थे। शेष गवाहों से सिद्ध हुआ कि राम
प्रसाद और अशफाक के बीच साम्प्रदायिक दंगों के समय कोई संबंध नहीं
था। उनका परिवार हमेशा आदरणीय रहा। अलीबी सबूतों के आधार पर
यह नोट किया जाना चाहिए कि अशफाक ने न्यायालय या मजिस्ट्रेट के
समक्ष यह बयान दिया कि वे किसी घटना, जैसे जहां डकैती हुई थी,
नहीं गये थे, वे वहां थे भी नहीं। यह सच है कि बहुत सारे गवाहों को
सम्मन किया, परन्तु वे गवाह आये नहीं।²
तीन विभिन्न तारीखों में पांच गवाहों का परीक्षण सिर्फ यह सिद्ध
करने के लिए हुआ कि बमरौली की डकैती वाले दिन अशफाक शाहजहांपुर
के एक गांव में, जहां उनकी भूमि भी थी, शिकार पर थे या नहीं थे।
अशफाक के बड़े भाई ने कहा कि क्रिसमस के कुछ दिन पहले वे कपड़ा
खरीदने शाहजहांपुर आये थे।
1.सी०आई०डी०, वाल्यूम -2, काकोरी षड़यंत्र केस-उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ -95
2.सी०आई०डी०, वाल्यूम -2, काकोरी षड़यंत्र केस-उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ -96
133
उन्होंने यह भी बताया कि अशफाक को भोपाल के सिहोर में
1 अगस्त (मोहर्रम) के बाद (8 या 10 दिन बाद) देखा था। अशफाक बस
से भोपाल लौट रहे थे। एक अन्य गवाह भागवत सिंह ने बताया कि वे
सिहोर से अस्ता उसी मोटर में गये थे, जिसमें अशफाक यात्रा कर रहे थे,
उस दिन 8 अगस्त की तारीख थी।¹
उपर्युक्त गवाहों के बयान से सरकार को विश्वास नहीं हुआ कि
विशेषकर तिथि को लेकर। उनके कहने के अनुसार अशफाक को भोपाल
स्टेट में देखा लेकिन गवाहों ने 7, 8 या 9 अगस्त को ही देखा, यह
सत्य नहीं है।²
अशफाक और राम प्रसाद 1924 के शाहजहांपुर दंगे में अलग-अलग
थे। इस हेतु अनेक गवाहों को न्यायालय में बुलाया गया। रजा अली
खान जो पेशे से वकील थे ने कहा कि अशफाक ने अता हुसैन के लिए
पैरवी की और राम प्रसाद ने हिन्दुओं के लिए पैरवी की थी। लेकिन कोई
विश्लेषण उपलब्ध नहीं हो पाया कि किस केस की पैरवी की गयी।
मोहम्मद शफी उल्ला खान ने कहा कि उन्होंने अशफाक से दंगे के वक्त
कहा था - 'जो व्यक्ति राष्ट्रवादी है, वे ही झगड़ों में भाग ले रहे हैं।'
करीमुल रजा, वकील ने असहयोग आन्दोलन के समय अपनी प्रैक्टिस
स्थगित कर दी थी। वे अताहुसैन के वकील के रूप में आये थे। उन्होंने
कहा कि अशफाक ने अताहुसैन की पैरवी की थी, क्योंकि वे साथ-साथ
कमरे में रहते थे। यह स्वीकार करते हैं कि अशफाक ने कभी कोई निर्देश
नहीं दिया। उन्होंने यह भी कहा कि राम प्रसाद ने हिन्दुओं की पैरवी
दंगों के लिए की, इस बयान का केवल यह अर्थ है कि मैंने उन्हें हिन्दुओं
के साथ देखा है।³
1.सी0आई0डी0, वायल्यूम-2, काकोरी षड़यंत्र केस- उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ-100
2.सी0आई0डी0, वायल्यूम-2, काकोरी षणयंत्र केस- उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ-101
3.सी0आई0डी0, वायल्यूम-2, काकोरी षणयंत्र केस- उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ-101
135
अताहुसैन खान जो दंगों के लिए दोषी सिद्ध हुए थे, कहा कि - वे
अशफाक और कुछ मुसलमानों के साथ ताजिया जुलूस में थे। यह
अफवाह उड़ाई गई कि करियाटोला मोहल्ले के हिन्दू जुलूस रोक देंगे।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि वहां मुसलमान बहुत अधिक है। उन्होंने
हिन्दुओं का समूह देखा था, जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल भी थे। उस रात
करियाटोले मोहल्ले में एक मुसलमान की हत्या कर दी गयी थी। उन्होंने
अशफाक से कहा कि कांग्रेस के लोग यह समस्या पैदा कर रहे हैं, परन्तु
अशफाक ने यह कहा कि उन लोगों के साथ बहुत बुरा हुआ।¹
गवाहों के बयान से सिद्ध होता है कि कोई कारण ही नहीं था कि
कहा जाय अशफाक और राम प्रसाद में शत्रुता थी। बिना किसी व्यक्तिगत
विवादों के दोनों व्यक्ति धार्मिक कार्यक्रमों का समर्थन करते हैं। बयानों से
कोई ऐसा सबूत नहीं दिखाई दिया कि इनका हाथ दंगे में था। यह तो
पूर्व में भी स्पष्ट हो चुका है कि क्रांतिकारियों ने धार्मिक प्रश्नों को पीछे
छोड़कर अपने उद्देश्यों हेतु कार्य किया। जो दस्तावेज अशफाक के पास
पाये गये, उससे भी प्रतीत होता है कि अशफाक धार्मिक पूर्वाग्रहों से ऊपर
थे।²
मुख्य बहस अशफाक के पहचान पर थी। यह कहा गया कि कुछ
गवाह अशफाक को अशफाक के रूप में और कुछ बख्शी के रूप में
पहचानते हैं। अशफाक ने यह भी शिकायत की कि किसी व्यक्ति को
उनके साथ सहायता हेतु अनुमति नहीं दी गयी, जो व्यक्ति उनके साथ
न्यायालय में उनका पक्ष रखने हेतु लाये गये, वह उपयुक्त नहीं थे।³
- सी०आई०डी०, वाल्यूम-2, काकोरी षड्यंत्र केस-उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ-102
- सी०आई०डी०, वाल्यूम-2, काकोरी षड्यंत्र केस- उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ-103
- सी०आई०डी०, वाल्यूम-2, काकोरी षड्यंत्र केस-उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ-103
136
क्राउन के वकील ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि अशफाक
को बहुत गवाहों ने पहचाना, वे सबसे अलग दिखने वाले थे। उनका
प्रदर्शन असामान्य था, देखने में लगते अच्छे थे और हर डकैती में मुख्य
भूमिका अदा करने वाले व्यक्ति थे।
अशफाक को पहचान के सिलसिले में बहुत से गवाह दिल्ली से भी
लाये गये थे कि वास्तव में उस दिन क्या हुआ? अशफाक की गिरफ्तारी
8 सितम्बर को हुई थी और मिले बाक्स को सीलकर दिया गया था।
अगले दिन अशफाक को गिरफ्तार करने वाले डिप्टी सुपरिन्टेन्डेन्ट खान
बहादुर हकीम इकरामुल हक और मजिस्ट्रेट सैयद मुस्तफासाह ने लिस्ट
बनाई थी, जो समान अशफाक से प्राप्त हुआ था। उस समय अशफाक ने
कहा भी था कि फोटो को नष्ट कर दीजिए लेकिन नष्ट नहीं किया गया।
अपनी बहन को अशफाक द्वारा लिखे गये पत्र से प्रतीत होता था कि वे
अपने फोटो बहन को भेजना चाहते थे।¹
अशफाक जब 13 तारीख को पहली बार आए और फोटो के प्रति
उत्सुकता जाहिर की तो सुपरिन्टेन्डेन्ट ने कहा कि वह पुनः बक्से में रख
दी गयी है और उसकी चाभी उनके पास है। उन्होंने यह आश्वासन दिया
कि बेवजह उसका कोई फायदा नहीं लेने पायेगा। बाक्स पुलिस मालखाने
में बन्द है। इस साक्ष्य से स्पष्ट होता है कि फोटो लखनऊ नहीं भेजा
गया है। 13 सितम्बर को मिस्टर हार्टन दिल्ली आये। वे अशफाक के पास
से प्राप्त वस्तुओं को देखना चाहते थे। खान बहादुर हुसैन डिप्टी
सुपरिटेंडेंट को डायरेक्ट क्रिमिनल इंटेलिजेंस के यहां सम्बद्ध कर दिया
गया। उन्होंने मालखाने आकर अशफाक के बाक्स की चीजों का निरीक्षण
किया और कुछ चीजें लेकर चले गये। लेकिन फोटोग्राफ नहीं ले गये।
- सी0आई0डी0, वाल्यूम-2, काकोरी षड़यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ-104
137
इसी तिथि को फोटोग्राफ एक सील्ड कवर में सब-इंस्पेक्टर सिराजुल
हक द्वारा रख दिया गया। 14 सितम्बर को डिप्टी सुपरिटेंडेंट खान बहादुर
इकरामुल हक ने यह जांच की कि यह अच्छी प्रकार से रखा है कि नहीं
ओर वह मालखाना लौटा दिया गया। उसी हालत में 30 सितम्बर को
लखनऊ लाया गया। उसके साथ फोटो और मिले सामान से जुड़ी तमाम
रिपोर्ट भी लायी गयी।¹
महत्वपूर्ण साक्ष्यों से यह प्रतीत होता है कि अशफाक को लेकर
मजिस्ट्रेट सैयद ऐनुद्दीन दिल्ली पहुंचे। जेल छोड़ने के पहले उन्होंने
अशफाक से कहा कि अपनी पहचान छुपाए रखें, क्योंकि पहचान की
विधिक कार्यवाही हो सकती हैं। अशफाक एक बन्द लारी में लखनऊ
स्टेशन से दिल्ली तथा दिल्ली से लखनऊ एक द्वितीय श्रेणी के डिब्बे में
यात्रा की और मुंह पूरा ढका हुआ था। वे एक काले रंग का चश्मा भी
पहने थे।²
सैयद ऐनुद्दीन ने लखनऊ में पब्लिक प्रासीक्यूटर सी०आई०डी० के
द्वारा एक पत्र पाया। इस पत्र में सूचना थी कि गवाह दूसरे मजिस्ट्रेट के
यहां प्रतीक्षा कर रहे हैं। अशफाक को सेन्ट्रल जेल छोड़ने के बाद वे दूसरे
मजिस्ट्रेट के यहां गये। वे वहां से दोपहर में लौटे। सारे गवाह दो मोटर
गाड़ी में जेल लाए गए। मजिस्ट्रेट के समक्ष पहुंचने पर उन्हें जेल ले
जाया गया। वहां कहा गया कि कोई पठान जो अशफाक की शक्ल का
है, इन्तजार कर रहा है। फिर अशफाक से कहा गया कि कुछ बाहरी लोग
जो जेल के नहीं है, उनके साथ मजिस्ट्रेट के सामने परेड करेंगे लेकिन
मजिस्ट्रेट इस व्यवस्था में सफल नहीं रहे। प्रोसीडिंग प्रारम्भ होने के पहले
ही अशफाक ने अपने फोटो के विषय में शिकायत की।
- सी०आई०डी०, वाल्यूम-2, काकोरी षणयंत्र केस-उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ-105
- सी०आई०डी०, वाल्यूम-2, काकोरी षणयंत्र केस-उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ-105
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अशफाक द्वारा लगाये गये मुख्य आरोप इस प्रकार हैं - अशफाक
के बायें पैर के नाखून काले थे। मैंने उसे छिपाने के लिए लाल रंग के
टेप की अनुमति दी और ऐसा ही उनके साथ शामिल किये गये समस्त
व्यक्तियों का किया गया। उनके व्यक्तिगत अनुरोध पर मैंने उनके कपड़े
उतरवाकर कैदियों के कपड़े पहनने का कहा। उन सभी के पास छोटी
दाढ़ी और मूंछे थी जैसे पठानों की होती हैं। जब प्रोसीडिंग समाप्त हो
गयी तो अशफाक ने हमें बाएं माथे पर एक निशान दिखाया। अशफाक
ने कभी इस सच को हमें नहीं बताया था। गवाहों ने सीधे चेहरे पर
देखा और बिना हिचकिचाहट के एक ही बार में पहचान लिया।¹
अन्य तर्कों के आधार पर कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण केस के
ट्रायल के पश्चात् मजिस्ट्रेट द्वारा जांच के उपरान्त प्राप्त साक्ष्यों के आधार
पर समस्त कार्यवाही निष्पक्षता तथा बिना दबाव के आधार पर की गयी।²
<u>निर्णय एवं प्रतिक्रिया :-</u>
सेशन जज जे०आर० डब्लू वैनट ने काकोरी काण्ड के लिए तथा
बिचपुर डकैती के लिए फांसी की सजा तथा तीन अन्य मुकदमों के लिए
काले पानी की सजा सुनाई। इस निर्णय को सुनने पर वह शान्त और
प्रसन्न भाव से खड़े रहे। काकोरी काण्ड के अन्य अभियुक्तों को निम्न
सजाएं हुईं -
• मृत्यु दण्ड - राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ,
रोशन सिंह, राजेन्द्र लाहिड़ी
• आजन्म कालापानी - शचीन्द्र नाथ सन्याल, शचीन्द्र नाथ
बख्शी
• चौदह वर्ष का कारावास - मन्मथनाथ गुप्त
- सी०आई०डी०, वायल्यूम-2, काकोरी षणयंत्र केस-उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ-106
- सी०आई०डी०, वायल्यूम-2, काकोरी षणयंत्र केस-उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ-106
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• दस वर्ष का कारावास- योगेश चन्द्र चटर्जी, मुकुन्दी लाल, गोविन्द
चरमकर, राम कुमार सिन्हा, रामकृष्ण खत्री
• सात वर्ष का कारवास- विष्णु शरण दुब्लिस, सुरेश भट्टाचार्य
• चार वर्ष का कारवास - प्रणवेश चटर्जी
• पांच वर्ष का कारवास- भूपेन्द्र नाथ सन्याल, प्रेमकृष्ण खन्ना, राम
दुलारे द्विवेदी¹
काकोरी काण्ड के अभियुक्तों की सुनवाई रिंग थियेटर में होती थी।
सरकारी पक्ष के वकील जगत नारायण शुक्ला थे। जिन पर कटाक्ष करते
हुए अशफाक ने एक शेर कहा कि- 'चलो-चलो यारो रिंग थियेटर दिखाएं
तुमको, जो चन्द टुकड़ों पर सीमोजर के, नया तमाशा दिखा रहे हैं।²
निर्णय के विरुद्ध पूरे देश में प्रतिक्रिया हुई। ठा० मनजीत सिंह
(एम०एल०सी०) ने इस मामले को कौंसिल के आगामी अधिवेशन में उठाने
का प्रयत्न किया। वे फांसी की सजा को कम से कम काले पानी में
बदलवाना चाहते थे। इस हेतु उन्होंने गर्वनर को प्रार्थना पत्र भी दिया
और अन्य सदस्यों से सम्पर्क भी किया। लाभ सिर्फ यह हुआ कि सजा
की तिथि 16 सितम्बर से अक्टूबर कर दी गयी। पं० गोविन्द बल्लभ पंत ने
भी इसकी आलोचना की। मदन मोहन मालवीय तथा असेम्बली के अन्य
सदस्यों ने वायसराय से मुलाकात की और मृत्युदण्ड को बदलने की
प्रार्थना की। लेकिन कोई परिणाम न निकला। अशफाक को फैजाबाद
जेल भेज दिया गया। इस निर्णय के विरुद्ध चीफ कोर्ट में अपील की
गयी, लेकिन यहां भी निराशा ही हाथ लगी।³
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-115
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-114
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-116-117
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काकोरी काण्ड के क्रांतिकारी शिक्षित और सभ्य परिवारों के युवक
थे, लेकिन उनके साथ जेल में उचित व्यवहार नहीं किया जाता था।
संयुक्त प्रांत की कौंसिल के कुछ सदस्यों ने इस मामले को उठाया किन्तु
सरकार द्वारा कोई संतोषजनक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। गोविन्द बल्लभ पंत
ने तारांकित प्रश्न नं0 75 दिनांक 29 अक्टूबर, 1927 के माध्यम से जानना
चाहा कि - काकोरी षड़यंत्र केस में दोष सिद्ध व्यक्तियों की सामाजिक
और शैक्षिक स्थिति क्या है? उनमें से कौन लोग भूख हड़ताल पर गये
और कितने दिन रहे हैं? वे कितने कारागारों में हैं।¹
संयुक्त प्रान्त की ओर से इसकी जानकारी प्रस्तुत की गयी थी।
तमाम विरोधों, असंतोषों के बावजूद अन्ततः अशफाक को 19 दिसम्बर,
1927 को फांसी पर (फैजाबाद जेल) लटका दिया गया।² 18 दिसम्बर को
अशफाक को पुराने कपड़े मिले, जिसे अशफाक ने धोया और सुखाया।
19 दिसम्बर की सुबह (प्रातः चार बजे) उठे गये, नहाया और नमाज अदा
की। सज-धजकर तैयार हो गये। इसके बाद वे एक नज़्म गाने लगे : -
बुजदिलों को सदा मौत से डरते देखा,
गो कि सौ बार उन्हें रोज ही मरते देखा।
मौत से वीर को हमने नहीं डरते देखा,
तख्त ए मौत पे भी खेल ही करते देखा।
तंग आकर हम भी अपने जुल्म से बेदाद से,
चल दिये सूये अमन जिन्दाने फैजाबाद से।
- शब्द (गोविन्द बल्लभ पंत के भाषणों का संकलन) 1924-1929, पृष्ठ 27
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त
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19 दिसम्बर को खुशी के साथ कुरान-शरीफ का बस्ता कंधे से टांगे
हाजियों की भांति 'लवेक' कहते और कलाम पढ़ते फांसी के तख्ते के
पास गये। तख्ते को उन्होंने बोसा दिया और फिर उपस्थित जनता से
कहा - ''मेरे हाथ इन्सानी खून से कभी नहीं रंगे, मेरे ऊपर जो इल्जाम
लगाया गया, वह गलत है, खुदा के यहां मेरा इंसाफ होगा।'' इसके बाद
उनके गले में फंदा पड़ा और खुदा का नाम लेते हुए वह इस दुनिया से
कूच कर गये। अशफाक के रिश्तेदार उनकी लाश को शाहजहांपुर ले जाना
चाहते थे। इसके लिए काफी प्रयास हुआ, तब जाकर इजाजत मिली।
शाहजहांपुर ले जाते समय जब उनकी लाश लखनऊ स्टेशन पर उतारी
गई, तब कुछ लोगों को देखने का मौका मिला। चेहरे पर 10 घण्टे बाद
भी बड़ी शांति थी और मधुरता थी। चेहरा ऐसा कि मानो अभी-अभी नींद
आई है, यह नींद अनन्त थी।¹
काकोरी काण्ड में मृत्युदण्ड प्राप्त अन्य क्रांतिकारियों में राजेन्द्र नाथ
लाहिड़ी को 17 दिसम्बर को गोण्डा जेल और पं० राम प्रसाद बिस्मिल को
गोरखपुर जेल में, ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद जेल में 19 दिसम्बर,
1927 को फांसी दे दी गयी ................और इस प्रकार भारत मां के सपूत
सदैव के लिए चिरनिद्रा में सो गये।
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -215
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अध्याय-आठ
अध्याय-आठ
काकोरी काण्ड का प्रभाव
काकोरी षड़यंत्र, असहयोग आन्दोलन के बाद सब षड़यन्त्रों का
जनक है क्योंकि इसी षड़यंत्र के लोगों ने बिहार, पंजाब, मध्य प्रान्त,
बम्बई तक में अपनी शाखाएं स्थापित की थी।¹
काकोरी काण्ड में सरकारी खजाना रेल डकैती द्वारा लूटा गया था।
सरकार इस घटना से कुपित थी। घटना में शामिल क्रांतिकारी पकड़े गये
और फांसी, काला पानी, कठोर दण्ड की सजाएं हुई थी। चन्द्रशेखर
आजाद फरार ही थे। उत्तर भारत के क्रांतिकारियों के लिए काकोरी काण्ड
एक बड़ा आघात था, पर ऐसा नहीं था कि, जो क्रांतिकारी आन्दोलन के
लिए मौत साबित हों। इस घटना का प्रभाव इतना हुआ कि क्रांति हेतु
अन्य युवा भी तैयार हो गये। युवाओं में समाजवादी विचारधारा जो ऊर्जा
का काम कर रही थी, पूरी तरह प्रभावित थी। काकोरी काण्ड के
क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी के बाद दल छिन्न-भिन्न हो गया, इसे
संभालने का कार्य चन्द्रशेखर ने उठाया। साधन उपयुक्त न होने से कुछ
खास नहीं कर पाये। हां इतना अवश्य था कि 1926 में पंजाब में संगठन
जोर-शोर से बनने लगा।²
उ०प्र०, पंजाब, बिहार में संगठन था, किन्तु इसमें कोई आपसी
घनिष्ठ सहयोग नहीं था। 8 दिसम्बर, 1928 को समस्त भारत के प्रमुख
क्रांतिकारियों की सभा हुई। इस सभा में जय देव, शिव वर्मा, विजय
कुमार सिंह, सुखदेव, ब्रहमदत्त, सुरेन्द्र नाथ पाण्डेय, भगत सिंह, भगवती चरण
वोहरा, चन्द्रशेखर आजाद, फणीन्द्रनाथ घोष प्रमुख थे।
1.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -217
2.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -225
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इन सदस्यों ने चन्द्रशेखर आजाद को अध्यक्ष चुना और उनके नेतृत्व में
केन्द्रीय समिति (एच०आर०ए०) बनाई।¹
क्रांतिकारी युवाओं ने समाजवादी विचारधारा से प्रभावित होकर हिंसा
का मार्ग धीरे-धीरे छोड़ने का मन बनाया। भगत सिंह और उनके
साथियों ने पहली बार क्रांतिकारियों के समक्ष क्रांतिकारी दर्शन रखा।
काकोरी काण्ड के बाद संगठन का उद्देश्य था कि जहां भी एक व्यक्ति
दूसरे का शोषण करता था, उसे व्यवस्था का उन्मूलन करना होगा। जेल
की कोठरी में अशफाक उल्ला खां ने लिखा कि - 'हिंसा के मार्ग को
छोड़कर आन्दोलन मूल धारा में आ जाए और हिन्दू-मुसलमान एकता
बनाये रखने का प्रयास करें। क्योंकि इन्हीं जातियों में अंग्रेज फूट डालने
की भरपूर कोशिश करते थे।' अशफाक को भी लालच देकर सरकार द्वारा
गवाह बनाने का प्रयास किया गया था।
काकोरी काण्ड भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में पहला ऐसा ठोस प्रयास
था कि जिसके प्रतिफल के रूप में हमें क्रांतिकारी गतिविधियों की
बारम्बारता दिखाई पड़ती है। इन क्रांतिकारी गतिविधियों में मुख्यतया
एच०एस०आर०ए० संगठन के माध्यम से अनेक प्रयास किये गये।
काकोरी काण्ड के पश्चात् अंग्रेजी सरकार की खिलाफत करने के
लिए भारी संख्या में युवा वर्ग सामने आया। क्रांतिकारी युवा व्यक्तिगत
आतंकवाद और हत्या की राजनीति छोड़कर संगठित क्रांतिकारी कार्यवाही
में विश्वास करने लगे थे। साइमन कमीशन के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान
लाला लाजपतराय पर लाठीचार्ज और उसके बाद उनकी मौत ने युवा
क्रांतिकारियों को एक बार फिर व्यक्तिगत आतंकवाद और हत्या की राह
पकड़ने पर मजबूर कर दिया।
1.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -226
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