अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाकोरी काण्ड के क्रांतिकारी शिक्षित और सभ्य परिवारों के युवक
थे, लेकिन उनके साथ जेल में उचित व्यवहार नहीं किया जाता था।
संयुक्त प्रांत की कौंसिल के कुछ सदस्यों ने इस मामले को उठाया किन्तु
सरकार द्वारा कोई संतोषजनक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। गोविन्द बल्लभ पंत
ने तारांकित प्रश्न नं0 75 दिनांक 29 अक्टूबर, 1927 के माध्यम से जानना
चाहा कि - काकोरी षड़यंत्र केस में दोष सिद्ध व्यक्तियों की सामाजिक
और शैक्षिक स्थिति क्या है? उनमें से कौन लोग भूख हड़ताल पर गये
और कितने दिन रहे हैं? वे कितने कारागारों में हैं।¹
संयुक्त प्रान्त की ओर से इसकी जानकारी प्रस्तुत की गयी थी।
तमाम विरोधों, असंतोषों के बावजूद अन्ततः अशफाक को 19 दिसम्बर,
1927 को फांसी पर (फैजाबाद जेल) लटका दिया गया।² 18 दिसम्बर को
अशफाक को पुराने कपड़े मिले, जिसे अशफाक ने धोया और सुखाया।
19 दिसम्बर की सुबह (प्रातः चार बजे) उठे गये, नहाया और नमाज अदा
की। सज-धजकर तैयार हो गये। इसके बाद वे एक नज़्म गाने लगे : -
बुजदिलों को सदा मौत से डरते देखा,
गो कि सौ बार उन्हें रोज ही मरते देखा।
मौत से वीर को हमने नहीं डरते देखा,
तख्त ए मौत पे भी खेल ही करते देखा।
तंग आकर हम भी अपने जुल्म से बेदाद से,
चल दिये सूये अमन जिन्दाने फैजाबाद से।
- शब्द (गोविन्द बल्लभ पंत के भाषणों का संकलन) 1924-1929, पृष्ठ 27
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त
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