अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें19 दिसम्बर को खुशी के साथ कुरान-शरीफ का बस्ता कंधे से टांगे
हाजियों की भांति 'लवेक' कहते और कलाम पढ़ते फांसी के तख्ते के
पास गये। तख्ते को उन्होंने बोसा दिया और फिर उपस्थित जनता से
कहा - ''मेरे हाथ इन्सानी खून से कभी नहीं रंगे, मेरे ऊपर जो इल्जाम
लगाया गया, वह गलत है, खुदा के यहां मेरा इंसाफ होगा।'' इसके बाद
उनके गले में फंदा पड़ा और खुदा का नाम लेते हुए वह इस दुनिया से
कूच कर गये। अशफाक के रिश्तेदार उनकी लाश को शाहजहांपुर ले जाना
चाहते थे। इसके लिए काफी प्रयास हुआ, तब जाकर इजाजत मिली।
शाहजहांपुर ले जाते समय जब उनकी लाश लखनऊ स्टेशन पर उतारी
गई, तब कुछ लोगों को देखने का मौका मिला। चेहरे पर 10 घण्टे बाद
भी बड़ी शांति थी और मधुरता थी। चेहरा ऐसा कि मानो अभी-अभी नींद
आई है, यह नींद अनन्त थी।¹
काकोरी काण्ड में मृत्युदण्ड प्राप्त अन्य क्रांतिकारियों में राजेन्द्र नाथ
लाहिड़ी को 17 दिसम्बर को गोण्डा जेल और पं० राम प्रसाद बिस्मिल को
गोरखपुर जेल में, ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद जेल में 19 दिसम्बर,
1927 को फांसी दे दी गयी ................और इस प्रकार भारत मां के सपूत
सदैव के लिए चिरनिद्रा में सो गये।
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -215
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