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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

३०२ ] [ अक्षमालिकोपनिषत्
कृत्याऽदिनाशकर दुर्धर्ष चतुर्विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं झंकार
भूतनाशकर पञ्चविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं ञंकार मृत्युप्रमथन
षड्विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं टंकार सर्वव्याधिहर सुभग सप्तविं-
शेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं ठंकार चन्द्ररूपाष्टाविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
ओं डंकार गरुडात्मक विषघ्न शोभनैकोनत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
ओं ढंकार सर्वसंपत्प्रद सुभग त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं णंकार
सर्वसिद्धिप्रद मोहकरैकत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं तंकार धन-
धान्यादिसंपत्प्रद प्रसन्न द्वात्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं थंकार
धर्मप्राप्तिकर निर्मल त्रयस्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं दंकार
पुष्टिवृद्धिकर प्रियदर्शन चतुस्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं धंकार
विषज्वरनिघ्न विपुल पञ्चत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं नंकार भुक्ति-
मुक्तिप्रद शान्त षट्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं पंकार विषविघ्न-
नाशन भव्य सप्तत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं फंकाराणिमादिसिद्धि-
प्रद ज्योतीरूपाष्टात्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं बंकार सर्वदोषहर
शोभनैकोनचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं भंकार भूत प्रशान्तिकर
भयानक चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं मंकार विद्वेषिमोहनकरै-
कचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं यंकार सर्वव्यापक पावन
द्विचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं रंकार दाहकर विकृत
त्रिचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं लंकार विश्वम्भर भासुर
चतुश्चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं वंकार सर्वाप्यायकर निर्मल
पञ्चचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं शंकार सर्वफलप्रद पवित्र
षट्चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं षंकार धर्मार्थकामद धवल

अक्षमालिकोपनिषत् [ ३०३

सप्तचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ। ओं संकार सर्वकारण सावंत्र्यणि-
काष्टचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ। ओं हंकार सर्ववाङ्मय निर्मलै-
कोनपञ्चाशदक्षे प्रतितिष्ठ। ओं लंकार सर्वशक्तिप्रद प्रधान
पञ्चाशदक्षे प्रतितिष्ठ। ओं क्षकार परापरतत्त्वज्ञापक
परंज्योतीरूप शिखामणौ प्रतितिष्ठ ॥५॥

इसके बाद उसे नन्दा आदि पांच गायों के दूध से तथा गौ के
शरीर से उत्पन्न गोमूत्र, गोमय, दूध, दधि, घृत, इन पंचगव्यों से
शोधित करके, पुनः पंचगव्य ( नन्दादि पांच गायों के दही मात्र से )
तथा गन्ध मिश्रित जल से स्नान कराकर ओंकार का उच्चारण
करते हुए पत्र कूर्च द्वारा स्नान करवा कर, मन्त्र शास्त्र में प्रसिद्ध
तक्कोल, उशीर कपूर आदि आठ गन्धों से लीपकर "मणशिला"
नामक धातु पर स्थापित कर अक्षत तथा पुष्पों से उसकी पूजा करके
प्रत्येक अक्ष (मणके) को अ से लेकर क्ष तक के अक्षरों
द्वारा क्रमशः भावित करें (उनकी उसमें स्थापना करें) ॥४॥
ॐ हे ओंकार ! तुम मृत्यु को जीतने वाले हो। सर्व व्यापक इस प्रथम
अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे ओंकार ! तुम आकर्षण शक्ति वाले
हो, सर्वव्यापी हो, इस दूसरे अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ओं हे इंकार ! तुम पुष्टि (पोषण) करने वाले तथा क्षुभिततारहित
हो तीसरे अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ईकार ! तुम
वाणी की स्वच्छता को करने वाले तथा निर्मल हो इस चौथे अक्ष में
प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे उंकार ! तुम सभी को सभी प्रकार
के बल देने वाले तथा सारयुक्तों में श्रेष्ठ हो, पांचवें अक्ष में प्रतिष्ठित
हो जाओ। ओं हे ऊंकार ! तुम उच्चारण करने वाले तथा
दुःसह (न सहे जा सकने वाले) हो इस छठे अक्ष में प्रतिष्ठित
हो जाओ। ओं हे ऋंकार ! तुम संक्षोभ (चलचित्तता) को करने

३०४ ] [ अक्षमालिकोपनिषत्.
वाले तथा चंचल हो इस सातवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ओं हे ॠंकार ! तुम सम्मोहन करने वाले तथा उज्ज्वल हो इस
आठवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे लृंकार ! तुम विद्वेष को
उत्पन्न कर देने वाले तथा सब कुछ जानने वाले अत्यन्त गुप्त
हो इस नवे अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे लॄंकार ! तुम
मोहकारी हो इस दसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे एंकार !
तुम सब को वश में करने वाले तथा शुद्ध सत्य हो इस
ग्यारहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ऐंकार ! तुम शुद्ध तथा
सात्विक हो और पुरुषों को वश में करने वाले हो इस
बारहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे ओंकार ! तुम अखिल
वाङ्मय (सारे ही अक्षरों के समूह) हो एवं नित्य शुद्ध हो इस
तेरहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे औंकार ! तुम भी अक्षर
समूह स्वरूप वश में करने वाले तथा शान्त हो इस चौदहवें
अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे अंकार ! हाथी आदमियों को वश
में करने वाले एवं मोहित करने वाले हो इस पन्द्रहवें अक्ष में
प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे अःकार ! तुम मृत्यु नाशक तथा रौद्र
(अत्यन्त भयानक) हो इस सोलहवें अक्ष में प्रतिष्ठा पाओ।
हे कंकार ! तुम सभी विषों को हरने वाले तथा कल्याण देने वाले हो
इस सत्रहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे खंकार ! तुम सबको
क्षुभित करने वाले एवं व्यापक हो इस अठ्ठारहवें अक्ष में प्रति-
ष्ठित हो जाओ। ओं हे गंकार ! तुम सभी विघ्नों को शान्त करने
वाले तथा बड़ों में भी बड़े (विशाल) हो इस उन्नीसवें अक्ष में
प्रतिष्ठा पाओ। ओं हे घंकार ! तुम सौभाग्य देने वाले तथा स्तम्भन
(गति को रोकने वाले) कर्त्ता हो बीसवें अक्ष में प्रतिष्ठा पाओ)
ओं हे ङंकार ! तुम सभी विषों के नाशक तथा उग्र भयानक
हो इस इक्कीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे चंकार ! तुम
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अक्षमालिकोपनिषत् ] [ ३०५

अभिचार नाशक तथा क्रूर हो बाईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ ।
ओं हे छंकार ! तुम भूत नाशक तथा भयानक हो तेईसवें अक्ष
में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे जंकार ! तुम कृत्या आदि
( डाकिनी आदि ) नाशक तथा दुर्धर्ष हो इस चौबीसवें अक्ष में
प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे झंकार ! तुम भूतनाशक हो इस पच्चीसवें
अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे ञंकार ! तुम मृत्यु को
मथित कर देने वाले हो इस छब्बीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ ।
ओं हे टंकार ! तुम सभी रोगों के नाशक तथा सौम्य हो इस
सत्ताईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे ठंकार ! तुम चन्द्रस्वरूप
हो इस अठ्ठाईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे डंकार !
तुम गरुड़ स्वरूप विषनाशक तथा सुन्दर हो उनतीसवें में प्रति-
ष्ठित हो जाओ । ओं हे ढंकार ! तुम सभी तरह की सम्पत्ति-
दायक तथा सौम्य हो इस तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ ।
दायक तथा सौम्य हो इस तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ ।
ओं हे णंकार ! तुम सभी सिद्धि देने वाले तथा मोह कर देने वाले
हो इस इकत्तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे तंकार ! तुम
धनधान्य आदि सम्पत्तिदाता तथा सदा प्रसन्न हो इस बत्तीसवें अक्ष में
प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे थंकार ! तुम धर्म की प्राप्ति कराने
वाले तथा निर्मल हो इस तेतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ ।
ओं हे दंकार ! तुम पुष्टि तथा वृद्धिकर्ता हो तथा सुन्दर दीखने
वाले हो इस चौंतीसवें अक्ष प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे धंकार !
तुम विष तथा ज्वर के नाशक हो तथा विशाल ( बहुत ) हो
इस पैंतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे नंकार तुम भोग
तथा मोक्षदाता तथा शान्त हो इस छत्तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो
जाओ । ओं हे पंकार ! तुम विष एवं विघ्नों के नाशक तथा
कल्याणमय हो इन सैंतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ ।
ओं हे फंकार ! तुम अणिमा महिमा गरिमा आदि आठ सिद्धि के

३०६ ] [ अक्षमालिकोपनिषत्
तथा प्रकाश स्वरूप हो, इस अड़तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ॐ हे बंकार ! तुम सब दोषों को हरण करने वाले तथा सुन्दर हो, इस
उनतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे भंकार ! तुम भूत
बाधा शान्त करने वाले तथा भयानक हो, इस चालीसवें अक्ष में
प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे मंकार ! तुम विद्वेष (बैर) करने
वाले को मोहित करने वाले अथवा विद्वेषी तथा मोह करने वाले
हो, इस इकतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे यंकार !
तुम सब जगह व्यापी तथा पवित्र हो, इस बयालीसवें अक्ष में
प्रतिष्ठित हो जाओ। हे रंकार ! तुम दाह (जलन) (तपन)
उत्पन्न करने वाले तथा विकृत हों, इस तेतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित
हो जाओ। ॐ हे लकार ! तुम विश्व का पोषण करने वाले तथा
तेजस्वी (चमकने वाले) हो, इस चौवालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो
जाओ। ओं हे वंकार ! तुम सब को तृप्त (पुष्ट) करने वाले
तथा निर्मल हो इस पैंतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ॐ हे शंकार ! तुम सभी प्रकार के फलों के दाता एवं पवित्र हो
इस छयालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे षंकार ! तुम
धर्म अर्थ तथा काम को देने वाले तथा श्वेत (सात्त्विक) हो, इस
सैंतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे संकार ! तुम सब
वस्तुओं के कारण सभी वर्गों से सम्बन्धित इस अड़तालीसवें अक्ष में
प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे हंकार ! तुम सभी सर्व वाङ्मय
(सब अक्षरों के या साहित्य के स्वरूप) तथा निर्मल हो, इस
उनचासवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ळंकार ! तुम सभी
शक्तियों के दाता तथा प्रधान (प्रमुख) हो, इस पचासवें अक्ष में
प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे क्षंकार ! तुम परात्पर तत्व के बताने
वाले तथा परंज्योती स्वरूप हो, इस शिखा मणि में मेरुमाला का
प्रधान मणका, प्रतिनिधि रूप से स्थित हो जाओ ॥५॥

'अक्षमालिकोपनिषत् ] [ ३०७
अथोवाच ये देवाः पृथिवीषदस्तेभ्यो नमो भगवन्तोऽनु-
'मदन्तु शोभायै पितरोऽनुमदन्तु शोभायै ज्ञानमयीमक्षमालिकाम् ॥६
अथोवाच ये देवा अन्तरिक्षसदस्तेभ्य ॐ नमो भगवन्तो-
'ऽनुमदन्तु शोभायै पितरोऽनुमदन्तु शोभायै ज्ञानमयीमक्षमालिकाम्
।७।
अथोवाच ये देवा दिविषहस्तेभ्यो नमो भगवन्तोऽनुमदन्तु
शोभायै पितरोऽनमदन्तु शोभायै ज्ञानमयीमक्षमालिकाम् ।८।
अथोवाच ये मन्त्रा या विद्यास्तेभ्यो नमस्ताभ्यश्चोन-
मस्तच्छक्तिरस्याः प्रतिष्ठापयति ।६।
अथोवाच ये ब्रह्मविष्णुरुद्रास्तेम्य सगुणेभ्यः ओं नमस्त-
'द्दीर्यमस्याः प्रतिष्ठापयति ॥१०
वे इस प्रकार बोले — 'जो देवता पृथिवी में विचरने वाले हैं
उन्हें नमस्कार है। हे भगवन् ! आप लोग इस माला में स्थित हो,
इस माला का अनुमोदन (मेरे द्वारा ग्रहण का समर्थन करें) तथा
इसकी शोभा के लिए पितृगण ही अनुमोदन करें। इस ज्ञानमयी
अक्षमालिका को प्राप्त कर अग्निष्वात्त आदि पितर अनुमोदन करें
॥ ६ ॥ पुनः बोले — 'जो देवता आकाश में रहने वाले हैं, उन्हें
नमस्कार है, वे भगवान् पितरों के सहित इसे ज्ञानमयी माला में
स्थित हो, इसकी शोभा के लिए अनमोदन करे ॥ ७ ॥ जो देवता
स्वर्ग में (आकाश में) निवास करने वाले हैं, वे ज्ञान स्वरूपिणी
अक्षमालिका में स्थित हो, वरदान दायक बनकर पितरों सहित इसकी
शोभा के लिए अनुमोदन करें ॥ ८ ॥ पुनः इस प्रकार कहे —
'इस लोक में जो सात करोड़ संख्यक मन्त्र हैं, जो चौंसठ कला स्वरूप
'विद्यायें हैं, उन्हें नमस्कार है। उनकी शक्तियां इसमें विराजमान होवें

३०८ अक्षमालिकोपनिषत्
॥६॥ पुनः ऐसा कहे—'जो ब्रह्मा विष्णु तथा रुद्र हैं उन्हें नमस्कार
है उनके वीर्य को (पराक्रम को) नमस्कार है उनका वीर्य इसमें
प्रतिष्ठित हो ॥१०॥
अथोवाच ये सांख्यादितत्त्वभेदास्तेभ्यो नमो वर्तध्वं
वरोधेनुवर्तध्वम् ॥११॥
अथोवाच ये शैवा वैष्णवाः शाक्ताः शतसहस्रशस्तेभ्यो
नमो नमो भगवन्तोऽनुमदन्तवनुगृह्णन्तु ॥१२
अथोवाच याश्च मृत्योः प्राणक्त्यस्ताभ्यो नमो नमस्तेनैतां
मृडयत मृडयत ॥१३
पुनरेतस्यां सर्वात्मकत्वं भावयित्वा भावेन पूर्वमालिका-
मुत्पाद्यारभ्य तन्मयीं महोपहारंरुपहृत्यादिक्षान्तैरक्षै रक्षमाला-
मष्टोत्तरशतं स्पृशेत् ॥१४
अथ पुनरुत्थाप्य प्रदक्षिणीकृत्योंनमस्ते भगवति मन्त्र-
मातृकेऽक्षमाले सर्ववशंकर्योनमस्ते भगवति मन्त्रमातृकेऽक्षमालि-
केऽशेषस्तम्भिन्योंनमस्ते भगवति मन्त्रमातृकेऽक्षमाले उच्चाटन्यों-
नमस्ते भगवति मात्रमग्तृकेऽक्षमाले विश्वामृत्यो मृत्युंजयस्व-
रूपिणि सकलोद्दीपिनि सकललोकदरक्षादिके सकललोको-
ज्जीविके सकलोत्पादिके दिवाप्रवर्तिके रात्रिप्रवर्तिके नद्यन्तरयासि
देशान्तरयासि द्वीपान्तरयासि लोकान्तरयासि सर्वदा स्फुरसि
सर्वहृदि वासयसि । नमस्ते परारूपे नमस्ते पश्यन्तीरूपे नमस्ते
मध्यमारूपे नमस्ते वैखरीरूपे सर्वतत्त्वात्मिके सर्वविद्याऽऽत्मिके
सर्वशक्त्यात्मिके सर्वदेवात्मिके वसिष्ठेन मुनिनाऽऽराधिते विश्वा-
मित्रेण मुनिनोपसेव्यमाने नमस्ते नमस्ते ॥१५॥
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधियानो
दिवसकृतं पापं नाशयति । तत् सायं प्रयुपानः पापोऽपापो

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अक्षमालिकोपनिषत् [ ३०६
भवति एवमक्षमालिकया जप्तो मन्त्रः सद्यः सिद्धिकरो भवती-
त्याह भगवान गुह प्रजापतिमित्युपनिषत् ।।१६।।
पुनः बोले—जो सांख्यादिक दर्शनों में छयानवे तत्व हैं तुम्हें
नमस्कार है ( हो ) आप लोग इस माला में स्थित हो जपने वाले
को वर देने वाले कामधेनु स्वरूप तथा ( जपकर्त्ता के विरोधों के
नाशक होकर ) शोभित होवे ॥ ११ ॥ पुनः इस प्रकार बोले—इस
ब्रह्माण्ड में जो शैव, वैष्णव, तथा शाक्त सैकड़ों तथा हजारों की
संख्या में निवास करते हैं उन्हें नमस्कार हो वे सभी भगवान्
( शक्तिशाली ) कृपा करें तथा अनुमोदन करें ( समर्थन, आज्ञा )
करें ॥ १२ ॥ अन्त में ऐसा कहे—जो मृत्यु की जो उपजीव्य
शक्तियाँ हैं उन्हें नमस्कार हो आप लोग इस नमस्कार से स्तुति से
प्रसन्न हो इस अक्षमालिका को अपने उपासकों को सुख देने वाली
करदें ॥१३॥ फिर इस मालिका में सर्वात्मकता (सर्वविधि पूर्णता)
की भावना करके इसी भावना से पूर्ण मालिका (आधी माला) को
पिरोकर पुनः शेष आधी पचास मणकों में उसी प्रकार आवृत्ति
करके ( १०० पूरे हुये ) और पुनः शेष आठ मणकों में
'अ' क, च, ट, त, प, य, तथा श इस अष्टवर्ग को ( पूर्वोक्तक्रम से )
योजित करे । तब एक सौ आठ हो जाते हैं ( मेरु में तो वही
पूर्वोक्त क्ष रहेगा ) इस प्रकार मालिका की योजना एक २ का
उपहार ( पास में पिरो २ ) करके करे ॥ १४ ॥ अक्ष मालिका की
स्तुति—करके बाद उठकर प्रदक्षिणा करके ओं भगवती मन्त्र मातृके !
अक्षमाले तुम सबको वश में करने वाली हो तुम्हें नमस्कार है ।
हे मन्त्र मातृके ! अक्षमाले ! तुम सब की गति स्तम्भ करने
वाली, उच्चाटन ( विक्षिप्तता, विनाशता ) करने वाली हो तुम्हें
नमस्कार है । हे मन्त्रमातृके ! अक्षमाले ! तुम सबकी मृत्यु स्वरूप
तथा मृत्युञ्जय स्वरूपिणी हो और तुम सब की उद्दीप्त करने वाली

३१० ] [ अक्षमालिकोपनिषत्
हो । साथ ही तुम सारे लोक की रक्षा करने वाली सकल संसार की
प्राणदात्री, सब कुछ उत्पन्न करने वाली दिन तथा रात्रि की प्रवर्तक
एवं नदियों, से दूसरी नदियों, सभी देशों, द्वीपों लोक में संचार करने
की शक्ति रखने वाली हो । इन सभी जगह तुम विद्यमान हो तथा
सदैव स्फुरण करने वाली ( हृदयों में प्रकाशित होने वाली) तथा
सभी के हृदयों में वास करती हो । परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी
आदि जो वाणी हैं तुम उनकी स्वरूप हो तथा सभी तत्त्वरूपिणी,
सर्वं विद्यामय, सभी शक्तियों की अधिष्ठात्री, सर्व देवों की
आराध्या हो । तुम वशिष्ठ मुनि द्वारा आराधित एवं विश्वामित्र
मुनि द्वारा उपसेव्यमान ( सेवा शुश्रूषा किये जाने वाली ) हो, तुम्हें
बार-बार नमस्कार है ॥१५॥ इसे प्रातः अध्ययन करने वाला रात में
किये गये पापों से मुक्त हो जाता है । सांयकाल इसे पढ़ने वाला
दिन में किये पापों से छूट जाता है । जो सायं प्रातः दोनों समय
सदैव इसका पाठ करता है, वह बड़ा पापी भी तो पाप मुक्त हो
'जाता है। भगवान् गुह ने प्रजापति को अन्त में यही कहा कि इस प्रकार
अभिमन्त्रित पूजित अक्षमाला से जपा हुआ मन्त्र शीघ्र हीं सिद्धिदायक
होता है । ॥१६॥
॥ अक्षमालिकोपनिषत् समाप्त ॥
─:०:─

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रुद्राक्षजाबालोपनिषत्
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो
बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म
निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं
मे अस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते
मयि सन्तु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
मेरे अङ्ग वृद्धि को प्राप्त हों; वाणी, घ्राण, चक्षु, श्रोत, बल
और सब इन्द्रियां वृद्धि को प्राप्त हों । सब उपनिषद् ब्रह्मरूप हैं । मुझ से
ब्रह्म का त्याग न हो और ब्रह्म मेरा त्याग न करे । उसमें रत हुये
मुझको उपनिषद् धर्म की प्राप्ति हो । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
अथ हैनं कालाग्निरुद्रं भुसुण्डः पप्रच्छ—कथं रुद्राक्षोत्पत्तिः,
तद्धारणात् किं फलमिति ॥ १
तं होवाचं भगवान् कालाग्निरुद्रः । त्रिपुरवधार्थं महं
निमीलिताक्षोऽभवम् । तेभ्यो जलबिन्दवो भूमौ पतितास्ते रुद्राक्षा
जाताः । सर्वानुग्रहार्थाय तेषां नामोच्चारणमात्रेण दशगोप्रदानफलं
दर्शनस्पर्शनाभ्यां द्विगुणफलमत ऊर्ध्वं वक्तुं न शक्नोमि ॥ २
तत्रैते श्लोका भवन्ति—
कस्मिन् स्थितं तु किं नाम कथं वा धर्यते नरैः ।
कतिभेदमुखान्यत्र कैर्मन्त्रैर्धार्यते कथम् ॥ ३
दिव्यवर्षसहस्राणि चक्षुरुन्मीलितं मया ।
भूमावक्षिपुटाभ्यां तु पतिता जलबिन्दवः ॥ ४
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३१२ ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत्
तत्राश्रुबिन्दवो जाता महारुद्राक्षवृक्षकाः ।
स्थावरत्वतनुप्राप्य भक्तानुग्रहकारणात् ॥ ५
रुद्राक्ष के विषय में भुसुण्ड का प्रश्न—एक समय इन कालाग्नि
रुद्र से भुसुण्ड ने पूछा—कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति कैसे हुई ? और उसको
धारण करने से क्या फल होता है ? ॥१॥ भगवान् कालाग्नि रुद्र ने
उसको कहा कि त्रिपुर नामक राक्षस को मारने के लिए मैंने आँखें बन्द
करलीं अर्थात् समाधिस्थ होगया । तब उन आंखों से जल की बूंदें
पृथ्वी में गिरीं और वह रुद्राक्ष बन गईं । सब के ऊपर कृपा करने के
लिए ( मैं इतना ही कहता हूँ ) कि उसके नाम लेने मात्र से दस गौ
दान करने का फल और देखने तथा स्पर्श करने से दुगुना फल होता है ।
इससे अधिक ( आगे ) मैं नहीं कह सकता ॥२॥ इस विषय में श्लोक
हैं—प्रश्नः—कहां स्थित हैं ? क्या नाम है ? और कैसे मनुष्य इसे
धारण करते हैं ? कितने भेद हैं ? और किन मन्त्रों से किस प्रकार
धारण किये जाते हैं ? ॥३॥ उत्तर—एक हजार दिव्य वर्ष [ देवताओं
के वर्ष ] में मैंने आँखें खोलीं तो पृथ्वी में आंखों से जल की बूंदें गिरीं
॥४॥ वहां आंसू की बूंदें महारुद्राक्ष के पेड़ बन गईं और भक्तों पर
दया की दृष्टि से स्थावर [ अचल ] हो गईं ॥५॥
भक्तानां धारणात् पापं दिवारात्रिकृतं हरेत् ।
लक्षं तु दर्शनात् पुण्यं कोटिस्तद्धारणाद्भवेत् ॥ ६
तस्य कोटिशतं पुण्यं लभते धारणान्नरः ।
लक्षकोटिसहस्राणि लक्षकोटिशतानि च ॥ ७
तज्जपाल्लभते पुण्यं नरो रुद्राक्षधारणात् ।
धात्रीफलप्रमाणं यच्छ्रेष्ठमेतदुदाहृतम् ॥ ८

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चेति शिवाज्ञया ।

रुद्राक्षजाबालोपनिषत् । [ ३१३
बदरीफलमात्रं तु मध्यमं प्रोच्यते बुधैः ।
अधमं चणमात्रं स्यात् प्रक्रियैषा मयोच्यते ॥ ९.
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चेति शिवाज्ञया ।
वृक्षा जाताः पृथिव्यां तु तज्जातीयाः शुभाक्षकाः ॥ १०
यह रुद्राक्ष, धारण करने से दिन तथा रात के किये हुये भक्तों
के पापों को हर लेता है । दर्शन से तो लाख गुना पुण्य तथा उसको
धारण करने से करोड़ गुना पुण्य होता है ॥६॥ करोड़ ही नहीं अरब
गुना पुण्य उसको धारण करने से मनुष्य प्राप्त करता है तथा रुद्राक्ष
धारण करने से और जप करने से मनुष्य [ जप की अपेक्षा ] लाख
करोड़ हजार गुना लाख करोड़ सौ गुना पुण्य प्राप्त करता है ॥७॥ जो
रुद्राक्ष आंवले के बराबर हो वह श्रेष्ठ कहा गया है ॥८॥ और जो
बेर के समान हो उसे विद्वान मनुष्य मध्यम कहते हैं तथा जो चने के
बराबर हो वह रुद्राक्ष अधम कहा जाता है। अब उसकी प्रक्रिया कहता
हूं ॥९॥ शिवजी की आज्ञा से उस मङ्गलमय रुद्राक्ष के ब्राह्मण क्षत्रिय
वैश्य तथा शूद्र जाति के [ रुद्राक्ष ] वृक्ष उत्पन्न हुए ॥१०॥
श्वेतास्तु ब्राह्मणा ज्ञेयाः क्षत्रिया रक्तवर्णकाः ।
पीता वैश्यास्तु विज्ञेयाः कृष्णाः शूद्रा उदाहृताः ॥ ११
ब्राह्मणो बिभृयाच्छ्वेतान् रक्तान् राजा तु धारयेत् ।
पीतान् वैश्यस्तु बिभृयात् कृष्णाञ्छूद्रस्तु धारयेत् ॥ १२
समाः स्निग्धा दृढाः स्थूलाः कण्टकैः संयुताः शुभाः ।
कृमिदष्टं छिन्नभिन्नं कण्टकैर्हीनमेव च ॥ १३
व्रणयुक्तमयुक्तं च षड् रुद्राक्षाणि वर्जयेत् ।
स्वयमेव कृतद्वारं रुद्राक्ष स्यादिहोत्तमम् ॥ १४
यत्तु पौरुषयत्नेन कृतं तन्मध्यमं भवेत् ।

३१४ ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत्
समान् स्निग्धान् दृढान् स्थूलान् क्षौमसूत्रेण धारयेत्
॥ १५ ॥
सफेद रुद्राक्षों को ब्राह्मण, लाल रुद्राक्षों को क्षत्रिय, पीले रङ्ग
वालों को वैश्य तथा कालों को शूद्र कहा है ॥११॥ ब्राह्मण को सफेद,
क्षत्रिय को लाल, वैश्य को पीले तथा शूद्र को काले रुद्राक्ष धारण करने
चाहिये ॥१२॥ बराबर ( गोल ), चिकने, मजबूत, बड़े ( मोटे ) तथा
कांटे वाले शुभ माने गये हैं। कीड़े के खाये हुए, छिन्न-भिन्न ( जो टूटे
हों, खण्ड २ हों ) कांटों से रहित हों, छेद वाले हों, ठीक न लगते हों—
इन छः प्रकार के रुद्राक्षों को छोड़ देना चाहिये । अपने आप ( स्वतः )
जिसमें छेद हो ऐसा रुद्राक्ष उत्तम माना जाता है ॥१३-१४॥ जिसमें
छेद करना पड़े वह मध्यम होता है । सो एक जैसे चिकने, मजबूत मोटे-
मोटे रुद्राक्षों को रेशमी धागे में पिरोकर धारण करना चाहिए ॥१५॥
सर्वगात्रेण सौम्येन सामान्यानि विचक्षणः ।
निकषे हेमरेखाभा यस्य रेखा प्रदृश्यते ॥ १६
तदक्षमुत्तमं विद्यात् तद्धार्यं शिवपूजकैः ।
शिखायामेकरुद्राक्षं त्रिंशत शिरसा वहेत् ॥ १७
षट्त्रिंशतं गले दध्याद्बाह्वोः षोडशषोडश ।
मणिबन्धे द्वादशैव स्कन्धे पंचशतं वहेत् ॥ १८
अष्टोत्तरशतैर्मालामुपवीतं प्रकल्पयेत् ।
द्विसरं त्रिसरं वाऽपि सराणां पंचकं तथा ॥ १६
सराणां सप्तकं वाऽपि बिभृयात् कण्ठदेशतः ।
मुकुटे कुण्डले चैव कर्णिकाहारकेऽपि वा ॥ २०
ये रुद्राक्ष सभी प्रकार से सौम्य सुन्दर एक जैसे होने चाहिए ।

रुद्राक्षजाबालोपनिषत् [ ३१५
सांण पर जिसकी रेखा सुनहरी प्रतीत हो उसको उत्तम समझना चाहिये
तथा शिव भक्तों को ( पूजकों को ) वही धारण करना चाहिए । चोटी
में एक रुद्राक्ष तथा शिर पर ( माला में पिरोकर ) तीस रुद्राक्षों को
धारण करना चाहिए ॥१६-१७॥ गले में छत्तीस तथा दोनों भुजाओं
में सोलह-सोलह तथा मणिबन्ध गट्टा ( पंजे के प्रारम्भ के हिस्से ) में
बारह तथा कन्धे में पन्द्रह रुद्राक्ष धारण करने चाहिये ॥१८॥ एक सौ
आठ रुद्राक्षों की माला बनाकर गले में उपवीत रूप में ( जैसे मालायें
पहनी जाती हैं ) धारण करें ( बनावे ) । दो लड़ी, तीन लड़ी, अथवा
पाँच लड़ी किंवा सात लड़ियों को कण्ठ देश में धारण करना चाहिये ।
मुकुट, कुण्डल तथा कान की बाली ( अथवा हार रूप में ) भी धारण
करने चाहिये ॥१९-२०॥
केयूरकटके सूत्रं कुक्षिबन्धे विशेषतः ।
सुप्ते पीते सदाकालं रुद्राक्षं धारयेन्नरः ॥ २१
त्रिशतं त्वधमं पञ्चशतं मध्यममुच्यते ।
सहस्रमुत्तमं प्रोक्तमेवं भेदेन धारयेत् ॥ २२
शिरसीशानमन्त्रेण कण्ठे तत्पुरुषेण तु ।
अघोरेण गले धार्यं तेनैव हृदयेऽपि च ॥ २३
अघोरबीजमन्त्रेण करयोर्धारयेत् सुधीः ।
पञ्चाशदक्षग्रथितान् व्योमव्याप्यभिचोदरे ॥ २४
पंच ब्रह्मभिरंगैश्च त्रिमाला पंच सप्त च ।
ग्रथित्वा मूलमन्त्रेण सर्वाण्यक्षाणि धारयेत् ॥ २५
बाजूबन्द, कुक्षिबन्ध में भी विशेष रूप से सूत्र को ( सूत्र में
बँधी माला को ) सोते जागते हुये हमेशा धारण करना चाहिये ॥२१॥

यहाँ पृष्ठ का प्रतिलेखन (transcription) दिया गया है:

३१६ ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत्
तीन सौ रुद्राक्ष ( धारण, अधम, पांच सौ मध्यम तथा एक हजार उत्तम
कहा गया है, इस प्रकार के भेद से धारण करना चाहिये ॥२२॥ शिर
में 'ईशानः सर्वविद्यानां'•••••••••इस मन्त्र से कण्ठ में 'तत्पुरुषाय विद्महे'
'महादेवाय' इस मन्त्र से गले में 'अघोरेभ्यो' इस मन्त्र से, गले तथा
हृदय में भी रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥२३॥ अघोर बीजमन्त्र के
द्वारा विद्वान को चाहिये कि हाथों में धारण करे तथा रुद्राक्षों के बीच
जो छेद होता है उसमें अ से लेकर क्ष तक जो ये पचास अक्षर हैं इन्हें
लिखकर पञ्चाक्षरी मन्त्र [ नमः शिवाय ] से अभिमन्त्रित करके
[ अक्षमालोपनिषद में कही गई रीतियों के अनुसार ] प्राण प्रतिष्ठादि
करके मूलमन्त्र से गूंथ कर तीन पाँच अथवा सात मालाओं के रूप में
धारण करना चाहिये ॥२४-२५॥

अथ हैन भगवन्तं कालाग्निरुद्रं भुसुण्डः पप्रच्छ रुद्राक्षाणां
भेदेन यदक्षं यत्स्वरूपं यत्फलमिति तत्स्वरूप मुखयुक्तमरिष्टनिर-
सनं कामाभीष्टफल ब्रूहीति होवाच ॥ २६
तत्रे ते श्लोका भवन्ति—
एकवक्त्रं रुद्राक्षं परतत्त्वस्वरूपकम् ।
तद्धारणात् परे तत्वे लीयते विजितेन्द्रियः ॥ २७
द्विवक्त्रं तु मुनिश्रेष्ठ चार्धनारीश्वरात्मकम् ।
धारणादर्धनारीशः प्रीयते तस्य नित्यशः ॥ २८
त्रिमुखं चैव रुद्राक्षमग्नित्रयस्वरूपकम् ।
तद्धारणाच्च हुतभुक्तस्य तुष्यति नित्यदा ॥ २९
चतुर्मुखं तु रुद्राक्षं चतुर्वक्त्रस्वरूपकम् ।
तद्धारणाच्चतुर्वक्त्रः प्रोयते तस्य नित्यदा ॥ ३०

इसके बाद इन भगवान कालाग्नि रुद्र से भुसुण्ड ने पूछा कि
रुद्राक्षों के भेद से जिन रुद्राक्षों का जो स्वरूप तथा जो फल होता है

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रुद्राक्षजाबालोपनिषत् ] [ ३१७
उसके स्वरूप को मुखों के भेद से अरिष्ट [ अमङ्गल ] दूरीकरण तथा
इच्छित वस्तुओं के फल को कहो अर्थात् किन से क्या इच्छित वस्तुएं
मिलती हैं ? ) ।।२६।। इसके सम्बन्ध में इस प्रकार श्लोक हैं—एक
मुँह वाला रुद्राक्ष परतत्व का स्वरूप समझा जाता है, उसे धारण करने
से इन्द्रियों को वश में करने वाला उस परात्पर ( अन्तिम ) तत्व में
( शिव ) लीन हो जाता है ।।२७।। हे मुनिश्रेष्ठ ! दो मुँह वाला रुद्राक्ष
अर्धनारीश्वर का स्वरूप समझा जाता है, उसको धारण करने वाले पर
हमेशा अर्धनीश्वर भगवान् ( शिव ) प्रसन्न होते हैं ।।२८।। तीन मुँह
वाला रुद्राक्ष तीनों अग्नियों का स्वरूप समझा जाता है । उसे धारण
करने से उस पर हमेशा अग्निदेव प्रसन्न रहते हैं ॥२६॥ चार मुख
वाला रुद्राक्ष चतुर्मुख भगवान का स्वरूप समझा जाता है, उसे धारण
करने से चतुर्मुख भगवान् उस पर प्रसन्न होते हैं ।।३०।।
पंचवक्त्रं तु रुद्राक्षं पंचब्रह्मस्वरूपकम् ।
पंचवक्त्रः स्वयं ब्रह्म पुंहत्यां च व्यपोहति ॥ ३१
षड्वक्त्रमपि रुद्राक्षं कार्तिकेयाधिदैवतम् ।
तद्धारणान्महाश्रीः स्यान्महदारोग्यमुत्तमम् ॥ ३२
मतिविज्ञानसंपत्तिशुद्धये धारयेत् सुधीः ।
विनायकाधिदैवं च प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ३३
सप्तवक्त्रं तु रुद्राक्षं सप्तमात्रधिदैवतम् ।
तद्धारणान्महाश्रोः स्यान्महदारोग्यमुत्तमम् ॥ ३४
महती ज्ञानसंपत्तिः शुचिर्धारयतः सदा ।
अष्टवक्त्र तु रुद्राक्षमष्टमात्रधिदैवतम् ॥ ३५
वस्वष्टकप्रियं चैव गङ्गाप्रीतिकरं तथा ।
तद्धारणादिमे प्रीता भवेयुः सत्यवादिनः ॥ ३६
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

३१८ ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत्
पांच मुँह वाला रुद्राक्ष पञ्चमुखी भगवान् का (शिव) स्वरूप
समझा जाता है, उसे धारण करने से स्वयं ब्रह्म स्वरूप पञ्चमुखी
भगवान् पुरुष हत्या को दूर करते हैं ॥३१॥ छः मुँह वाला रुद्राक्ष
कार्तिकेय (शिव के बड़े पुत्र) का स्वरूप समझा जाता है । उसे
धारण करने से महालक्ष्मी प्रसन्न होती है तथा आरोग्य की सुन्दर
प्राप्ति होती है । इसे विद्वान लोग गणेश का स्वरूप भी मानते हैं तथा
इसे बुद्धि, विद्या, लक्ष्मी की वृद्धि के लिये चतुर मनुष्य को धारण करना
चाहिये ॥३२-३३॥ सात मुँह वाला रुद्राक्ष सप्तलोक माताओं (ब्राह्मी
आदि) का स्वरूप वाला समझा जाता है, इसे धारण करने से अत्यन्त
वैभव की तथा उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है ॥३४॥ पवित्रता से
धारण करने पर महान् ज्ञान उत्पन्न होता है । आठ मुँह वाला रुद्राक्ष
अष्ट माताओं का स्वरूप समझा जाता है तथा यह अष्ट वस्तुओं का भी
प्रिय है तथा इससे गङ्गा भी प्रसन्न होती है । इसे धारण करने से तीनों
स्वरूप प्रसन्न होते हैं ॥३५-३६॥
नववक्त्रं तु रुद्राक्षं नवशक्त्यधिदैवतम् ।
तस्य धारणमात्रेण प्रीयन्ते नव शक्तयः ॥ ३७
दशवक्त्रं रुद्राक्षं यमदैवमुदाहृतम् ।
दर्शनात् प्रशान्तिजनकं धारणात्रात्र संशयः ॥ ३८
एकादशमुखं त्वक्षं रुद्रैकादशदैवतम् ।
तदिदं दवतं प्राहुः सदा सौभाग्यवर्धनम् ॥ ३६
रुद्राक्षं द्वादशमुखं महाविष्णुस्वरूपकम् ।
द्वादशादित्यरूपं च बिभर्त्येव हि तत्परः ॥ ४०
नौ मुँह वाले रुद्राक्ष की नौ शक्तियां देवता समझी जाती हैं

रुद्राक्षजाबालोपनिषत् ] [ ३१६
( अर्थात् उनका बोधक है ) इसे धारण करने से नौ शक्तियां प्रसन्न
होती हैं । ॥३७॥ दस मुख वाले रुद्राक्ष का देवता यम समझा जाता
है । देखने मात्र से शान्ति उत्पन्न करने वाला तथा धारण करने से भी
महाशान्ति देने वाला होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥३८॥ ग्यारह मुँह
वाले रुद्राक्ष के देवता एकादश रुद्र समझे जाते हैं । यह एकादश
रुद्राधिदैवत रुद्राक्ष हमेशा सौभाग्य बढ़ाने वाला होता है ॥३६॥ बारह
मुँह वाला रुद्राक्ष महाविष्णु का स्वरूप समझा जाता है । यह बारह
सूर्यों का स्वरूप भी समझा जाता है तथा इनका उपासक इसे धारण
करता है ॥४०॥
त्रयोदशमुखं चाक्षं कामदं सिद्धिदं शुभम् ।
तस्य धारणमात्रेण कामदेवः प्रसोदति ॥ ४१
चतुर्दशमुखं चाक्षं रुद्रनेत्रसमुद्भवम् ।
सर्वव्याधिहरं चैव सर्वदाऽऽरोग्यमाप्नुयात् ॥ ४२
मद्यं मांसं च लशुनं पलाण्डुं शिग्रुमेव च ।
श्लेष्मातकं विड्वराहमभक्ष्यं वर्जयेन्नरः ॥ ४३
ग्रहणे विषुवे चैवमयने संक्रमेऽपि च ।
दर्शेषु पूर्णमासे च पूर्णेषु दिवसेषु च ।
रुद्राक्षधारणात् सद्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४४
रुद्राक्षमूलं तद्ब्रह्मा तन्नालं विष्णुरेव च ।
तन्मख रुद्र इत्याहुस्तद्विन्दुः सर्वं देवता । इति ॥ ४५
अथ कालाग्निरुद्रं भगवन्तं सनत्कुमारः पप्रच्छाधीहि भग-
वन् रुद्राक्षधारणविधिम् । तस्मिन् समये निदाघजड़भरतदत्ता-
त्रेयाकात्यायनभरद्वाजकपिलवसिष्ठपिप्पलादयश्च कालाग्निरुद्रं

३२० ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत्
परिसमेत्योचुः । अथ कालाग्निरुद्रः किमर्थं भवतामागमनमिति
होवाच । रुद्राक्षधारणविधिं वै सर्वे श्रोतुमिच्छामह इति
॥ ४६ ॥
अथ कालाग्निरुद्रः प्रोवाच । रुद्रस्य नयनादुत्पन्ना रुद्राक्षा
इति लोके ख्यायन्ते । अथ सदाशिवः संहारकाले संहारं कृत्वा
संहाराक्षं मुकुलीकरोति । तन्नयनाज्जाता रुद्राक्षा इति होवाच ।
तस्माद्रुद्राक्षत्वमिति कालाग्निरुद्रः प्रोवाच ॥ ४७
तेरह मुँह वाला रुद्राक्ष इच्छाओं तथा सिद्धियों को देने वाला
होता है । इसे धारण करने मात्र से कामदेव प्रसन्न होते हैं । यह शुभ
होता है ॥४१॥ चौदह मुँह वाला रुद्राक्ष भगवान् रुद्र की आँखों से
विशेष रूप से उत्पन्न हुआ है। यह सब रोगों को हरण ( दूर ) करने
वाला तथा परम आरोग्य का दायक होता है ॥४२॥ शराब, मांस,
लहसुन, प्याज, सहजन, लसौड़ा विड्वराह ( शाकविशेष ) आदि अभक्ष्य
वस्तुओं को इसके धारण करने वाले को छोड़ देना चाहिये ॥४३॥
ग्रहण के समय, जिन दिनों रात तथा दिन बराबर होते हैं (अर्थात्
तुला तथा मेष संक्रान्ति ( सूर्य की) के दिनों में, अयन परिवर्तन के
समय, अमावस्या पौर्णमासी ( मास समाप्ति पर ) जब दिन पूर्ण हो
जाय तब रुद्राक्ष धारण करने से शीघ्र पापमुक्त हो जाता है ॥४४॥
रुद्राक्ष का मूल भाग ब्रह्मा तथा नाल भाग ( छेद ) विष्णु तथा मुख
का भाग रुद्र तथा रुद्राक्ष के बिन्दु सब देवता कहे गये हैं ॥४५॥ इसके
बाद भगवान कालाग्नि रुद्र को सनत्कुमार ने पूछा ( कहा ) महाराज !
आप रुद्राक्ष धारण करने की विधि बतलाइये । इसी समय निदाघ,
जड़ भरत, दत्तात्रेय, कात्यायन, भारद्वाज, कपिल, वशिष्ठ, पिप्पलाद,
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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रुद्राक्षजाबालोपनिषत् [ ३२१

[Main Text]
आदि कालाग्नि रुद्र के चारों तरफ बैठ गये तथा भगवान कालाग्नि रुद्र
के यह पूछे जाने पर कि आप लोग क्यों आये हैं ? बोले—हम सब
रुद्राक्ष धारण की विधि को सुनना चाहते हैं ॥४६॥ तब कालाग्नि रुद्र
बोले—रुद्र के नेत्रों से उत्पन्न होने के कारण से यह रुद्राक्ष नाम से
प्रसिद्ध है। भगवान सदा शिव संहार के समय ( प्रलय काल में ) संहार
करके अपने संसार का संहार करने वाले नेत्र को मुकुलित कर लेते हैं
( जरा से खुले तथा अधिकतया बन्द ) उन्हीं से उत्पन्न रुद्राक्ष है ।
यही रुद्राक्ष का अपना स्वत्व है । इस प्रकार कालाग्नि ने उत्तर
दिया ॥४७॥

तद्रुद्राक्षे वाग्विषये कृते दशगोप्रदानेन यत् फलमवाप्नोति
तत् फलमश्नुते । स एव भस्मज्योती रुद्राक्ष इति । तद्रुद्राक्षं
करेण स्पृष्ट्वा धारणमात्रेण द्विसहस्रगोप्रदानफलं भवति । तद्रु-
द्राक्षं कर्णयोर्धार्यमाणे एकादशसहस्रगोप्रदानफलं भवति । एका-
दशरुद्रत्वं च गच्छति । तद्रुद्राक्षे शिरसि धार्यमाणे कोटिगो-
प्रदानफलं भवति । एतेषां स्थानानां कर्णयोः फलं वक्तुं न
शक्यमिति होवाच ॥ ४८

य इमां रुद्राक्षजाबालोपनिषदं नित्यमधीते बालो वा युवा
वा वेद स महान् भवति । स गुरुः सर्वेषां मन्त्राणामुपदेष्टा
भवति । एतैरेव होमं कुर्यात् । एतैरेवार्चनम् । तथा राक्षोघ्नं
मृत्युतारकं गुरुणा लब्धं कण्ठे बाहौ शिखायां वा बध्नोत । सप्त-
द्वीपवती भूमिर्दक्षिणार्थं नावकल्पते । तस्माच्छ्रद्धया यां कांचिद्गां
दद्यात् सा दक्षिणा भवति । य इमामुपनिषदं ब्राह्मणः पातर-
धीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधियानो दिवसकृतपापं