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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१५२ ] [ पंचम अध्याय

१५२ ] [ पंचम अध्याय
भृत्योऽभिमतकर्तृत्वान्मन्त्री सर्वार्थकारणात् ।
सामन्तश्चेन्द्रियाक्रान्तेर्मनो मन्ये विवेकिनः ॥७९
लालनात् स्निग्धललना पालनात् पालकः पिता ।
सुहृदुत्तमविन्यासान्मनो मन्ये मनीषिणः ॥८०
स्वालोकितः शास्त्रदृशा स्वबुद्ध्या स्वानुभावितः ।
प्रयच्छति परां सिद्धिं त्यक्त्वाऽऽत्मानं मनः पिता ॥८१
सुदृष्टः सुहृदः स्वच्छः सुक्रान्तः सुप्रबोधितः ।
स्वगुणोनोजितो भाति हृदि हृद्यो मनोमणिः ॥८२
एनं मनोमणिं ब्रह्मन् बहुपङ्ककलङ्कितम् ।
विवेकवारिणा सिद्ध्यै प्रक्षाल्यालोकवान् भव ॥८३
विवेकं परमाश्रित्य बुद्ध्या सत्यमवेक्ष्य च ।
इन्द्रियारीनलं छित्त्वा तीर्णो भव भवार्णवात् ॥८४
जो मनुष्य सत् असत् के मध्य से इस प्रकार देखता है कि न
मैं यहाँ हूँ तथा अन्य कुछ भी यहाँ नहीं है, मैं सम्पूर्ण दोषों से रहित
ब्रह्म हूँ वही यथार्थ देखने वाला है। जैसे दर्शन, दृष्टा और दृश्यों की
ओर बिना राग के ही मन खिंच जाता है, वैसे ही ज्ञानीजन बिना राग
के ही कर्तव्य-कर्म करते रहते हैं। जैसे अनुगृहीत चोर चौर्यकर्म को
त्यागकर मैत्री निभाहता है, वैसे ही भले प्रकार विचार कर भोगा हुआ
भोग संतुष्टि का कारण बनता है। जिस गाँव में जाने की कभी इच्छा
भी नहीं की थी, उस गाँव के मार्ग पर अकस्मात आ जाने पर जिस
प्रकार राहगीर उस मार्ग को देखता हुआ आश्चर्यान्वित होता है, उसी
प्रकार ज्ञानी पुरुष भोगात्मक ऐश्वर्यों को आश्चर्य से देखते हैं। नियंत्रित
मन थोड़े से भोग को ही बहुत अधिक समझता हुआ उसे क्लेशप्रद
मानकर पीछा छुड़ाना चाहता है। जिस राजा के लिए शत्रु द्वारा आक्रांत
न होने पर राज्य के सभी भोग तुच्छ बने रहते हैं, वही राजा शत्रु के

बन्धन से छूटने पर भोजन के एक ग्रास से ही तृप्त हो जाता है। हाथ से
हाथ को मलकर, दांत से दांत को चबाकर और अङ्गों से अङ्गों को
भींचकर पूर्ण पराक्रम द्वारा मन को जीतने का यत्न करो। इस विश्व
रूप सागर में मन को जीतने से बढ़कर अन्य कोई उपाय नहीं है। इस
घोर नरक में दुष्कर्म रूपी मदोन्मत्त गजराज विचरण कर रहे हैं। आशा
-रूपी अस्त्रों से सुसज्जित इन्द्रियरूप शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना
अत्यन्त कठिन है। जो चित्त के अहङ्कार का दमन करते हैं और इन्द्रिय-
रूप शत्रुओं को जीत चुके हैं उनकी भोगलिप्सा हेमन्त में कमल क्षुप के
नष्ट होने के समान ही नष्ट हो जाती है। वेतालरूपी वासना हृदय में
तभी तक टिक सकती है, जब तक मन की एकाग्रता के अभ्यास द्वारा
उस पर नियन्त्रण नहीं कर लिया जाता। विवेकी पुरुष अपने मन को
भृत्य के समान आज्ञाकारी बना लेते हैं, वह उनके सभी प्रयोजनों का
मन्त्री के समान पालन करते हैं। मैं समझता हूँ कि वह सम्पूर्ण इन्द्रियों
को वशीभूत कर लेता है इसलिए सामन्त के समान भी है। मनन करने
वाले पुरुष का मन लालन करने से स्नेहमयी ललना के समान और
पालन करने से पिता के समान है। शास्त्र की अनुकूलता से और आत्मा-
नुभव से प्राप्त प्रकाश और बुद्धि के द्वारा मन रूपी पिता परम सिद्धि का
देने वाला है। आत्म गुणों से तेजस्विता को प्राप्त हुआ मन रूपी मणि
हृदय में शोभा पा रहा है। यह सुदृढ़, स्वच्छ, अत्यन्त हृष्ट, भले प्रकार
चैतन्य तथा भली भांति नियन्त्रित है। यह विभिन्न प्रकार के कीचड़ों
से मलीनता को प्राप्त हो रहा है। हे पुत्र ! इस मन रूपी मणि को
विवेक रूपी जल से स्वच्छ कर डालो। यही तुम्हें तेजस्विता प्रदान
करेगी। विवेक के आश्रय से बुद्धि को सत्य का साक्षात् करने में
लगाओ, इस उपाय से तुम्हारे इन्द्रिय रूपी शत्रु पूर्णतः छिन्न-भिन्न हो
जायेंगे और इसके फलस्वरूप तुम इस विश्व समुद्र से पार हो
पाओगे ॥ ६१–८४ ॥