१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअक्षमालिकोपनिषत् [ ३०३
सप्तचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ। ओं संकार सर्वकारण सावंत्र्यणि-
काष्टचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ। ओं हंकार सर्ववाङ्मय निर्मलै-
कोनपञ्चाशदक्षे प्रतितिष्ठ। ओं लंकार सर्वशक्तिप्रद प्रधान
पञ्चाशदक्षे प्रतितिष्ठ। ओं क्षकार परापरतत्त्वज्ञापक
परंज्योतीरूप शिखामणौ प्रतितिष्ठ ॥५॥
इसके बाद उसे नन्दा आदि पांच गायों के दूध से तथा गौ के
शरीर से उत्पन्न गोमूत्र, गोमय, दूध, दधि, घृत, इन पंचगव्यों से
शोधित करके, पुनः पंचगव्य ( नन्दादि पांच गायों के दही मात्र से )
तथा गन्ध मिश्रित जल से स्नान कराकर ओंकार का उच्चारण
करते हुए पत्र कूर्च द्वारा स्नान करवा कर, मन्त्र शास्त्र में प्रसिद्ध
तक्कोल, उशीर कपूर आदि आठ गन्धों से लीपकर "मणशिला"
नामक धातु पर स्थापित कर अक्षत तथा पुष्पों से उसकी पूजा करके
प्रत्येक अक्ष (मणके) को अ से लेकर क्ष तक के अक्षरों
द्वारा क्रमशः भावित करें (उनकी उसमें स्थापना करें) ॥४॥
ॐ हे ओंकार ! तुम मृत्यु को जीतने वाले हो। सर्व व्यापक इस प्रथम
अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे ओंकार ! तुम आकर्षण शक्ति वाले
हो, सर्वव्यापी हो, इस दूसरे अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ।
ओं हे इंकार ! तुम पुष्टि (पोषण) करने वाले तथा क्षुभिततारहित
हो तीसरे अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ईकार ! तुम
वाणी की स्वच्छता को करने वाले तथा निर्मल हो इस चौथे अक्ष में
प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे उंकार ! तुम सभी को सभी प्रकार
के बल देने वाले तथा सारयुक्तों में श्रेष्ठ हो, पांचवें अक्ष में प्रतिष्ठित
हो जाओ। ओं हे ऊंकार ! तुम उच्चारण करने वाले तथा
दुःसह (न सहे जा सकने वाले) हो इस छठे अक्ष में प्रतिष्ठित
हो जाओ। ओं हे ऋंकार ! तुम संक्षोभ (चलचित्तता) को करने