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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 572 में से

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रुद्राक्षजाबालोपनिषत् [ ३१५
सांण पर जिसकी रेखा सुनहरी प्रतीत हो उसको उत्तम समझना चाहिये
तथा शिव भक्तों को ( पूजकों को ) वही धारण करना चाहिए । चोटी
में एक रुद्राक्ष तथा शिर पर ( माला में पिरोकर ) तीस रुद्राक्षों को
धारण करना चाहिए ॥१६-१७॥ गले में छत्तीस तथा दोनों भुजाओं
में सोलह-सोलह तथा मणिबन्ध गट्टा ( पंजे के प्रारम्भ के हिस्से ) में
बारह तथा कन्धे में पन्द्रह रुद्राक्ष धारण करने चाहिये ॥१८॥ एक सौ
आठ रुद्राक्षों की माला बनाकर गले में उपवीत रूप में ( जैसे मालायें
पहनी जाती हैं ) धारण करें ( बनावे ) । दो लड़ी, तीन लड़ी, अथवा
पाँच लड़ी किंवा सात लड़ियों को कण्ठ देश में धारण करना चाहिये ।
मुकुट, कुण्डल तथा कान की बाली ( अथवा हार रूप में ) भी धारण
करने चाहिये ॥१९-२०॥
केयूरकटके सूत्रं कुक्षिबन्धे विशेषतः ।
सुप्ते पीते सदाकालं रुद्राक्षं धारयेन्नरः ॥ २१
त्रिशतं त्वधमं पञ्चशतं मध्यममुच्यते ।
सहस्रमुत्तमं प्रोक्तमेवं भेदेन धारयेत् ॥ २२
शिरसीशानमन्त्रेण कण्ठे तत्पुरुषेण तु ।
अघोरेण गले धार्यं तेनैव हृदयेऽपि च ॥ २३
अघोरबीजमन्त्रेण करयोर्धारयेत् सुधीः ।
पञ्चाशदक्षग्रथितान् व्योमव्याप्यभिचोदरे ॥ २४
पंच ब्रह्मभिरंगैश्च त्रिमाला पंच सप्त च ।
ग्रथित्वा मूलमन्त्रेण सर्वाण्यक्षाणि धारयेत् ॥ २५
बाजूबन्द, कुक्षिबन्ध में भी विशेष रूप से सूत्र को ( सूत्र में
बँधी माला को ) सोते जागते हुये हमेशा धारण करना चाहिये ॥२१॥