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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 572 में से

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पृष्ठ 318

३१० ] [ अक्षमालिकोपनिषत्
हो । साथ ही तुम सारे लोक की रक्षा करने वाली सकल संसार की
प्राणदात्री, सब कुछ उत्पन्न करने वाली दिन तथा रात्रि की प्रवर्तक
एवं नदियों, से दूसरी नदियों, सभी देशों, द्वीपों लोक में संचार करने
की शक्ति रखने वाली हो । इन सभी जगह तुम विद्यमान हो तथा
सदैव स्फुरण करने वाली ( हृदयों में प्रकाशित होने वाली) तथा
सभी के हृदयों में वास करती हो । परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी
आदि जो वाणी हैं तुम उनकी स्वरूप हो तथा सभी तत्त्वरूपिणी,
सर्वं विद्यामय, सभी शक्तियों की अधिष्ठात्री, सर्व देवों की
आराध्या हो । तुम वशिष्ठ मुनि द्वारा आराधित एवं विश्वामित्र
मुनि द्वारा उपसेव्यमान ( सेवा शुश्रूषा किये जाने वाली ) हो, तुम्हें
बार-बार नमस्कार है ॥१५॥ इसे प्रातः अध्ययन करने वाला रात में
किये गये पापों से मुक्त हो जाता है । सांयकाल इसे पढ़ने वाला
दिन में किये पापों से छूट जाता है । जो सायं प्रातः दोनों समय
सदैव इसका पाठ करता है, वह बड़ा पापी भी तो पाप मुक्त हो
'जाता है। भगवान् गुह ने प्रजापति को अन्त में यही कहा कि इस प्रकार
अभिमन्त्रित पूजित अक्षमाला से जपा हुआ मन्त्र शीघ्र हीं सिद्धिदायक
होता है । ॥१६॥
॥ अक्षमालिकोपनिषत् समाप्त ॥
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