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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१७८ षष्ठ अध्याय

१७८ षष्ठ अध्याय
संन्तज्य परमोदारं पदमेति महामनाः ।
बन्धास्थामथ मोक्षास्थां सुखदुःखदशामपि ॥५३
समत्व बुद्धि के द्वारा जो पुरुष वासना को सर्वथा क्षीण करके
ममत्व रहित हो जाता है, उसी से देह का बन्धन भी त्यागा जा सकता
है। इसलिए वासना को नष्ट कर देना परम कर्तव्य है। जीवन्मुक्त उसी
को कहते हैं जो अहङ्कारात्मिका वासना का सहज ही त्याग कर, ध्येय
वस्तु का भी त्याग कर देता है। संकल्प रूपिणी वासना का समूल त्याग
ही शांति-लाभ कराने वाला है। जीवन्मुक्त पुरुष ही वैसा त्याग करने
में समर्थ है और वही पुरुष ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ कहा जाता है। ऐसे ही
मनुष्य संसार के संतापों से मुक्त होकर ब्रह्मत्व को प्राप्त होते हैं। योगी
जन शम और दम से युक्त होने के कारण समय-समय पर प्राप्त होने
वाले सुख-दुःखों में लिप्त नहीं होते। इच्छा और अनिच्छा दोनों से ही
जो रहित हैं और जो सुषुप्त के समान व्यवहार करने वाला है, वह
जीवन्मुक्त कहा जाता है। जिस पुरुष में वासना का अभाव है वह काम,
क्रोध, मोह, हर्ष, अमर्ष और भय आदि के वशीभूत होकर सुख-दुःख को
नहीं मानता। बाह्य विषयों से आविर्भूत तृष्णा बन्धन में डालने वाली
है और सब प्रकार से विषय वासनाओं से शून्य तृष्णा मुक्ति प्राप्त
कराने वाली है। किसी वस्तु के प्राप्त करने की कामना दुःख भय की
जन्मदायिनी है। उसे घोर बन्धन स्वरूपा समझनी चाहिए। सन्त जन
सत्-असत् रूप पदार्थों की अभिलाषा का सर्वथा त्याग करके परम श्रेष्ठ
पद पाते हैं। हे पुत्र ! बन्धन में विश्वास तथा मोक्ष में विश्वास
सत्-असत् में विश्वास यह सब सुख-दुःख स्वरूप ही है। इनके त्याग
द्वारा प्रशान्त महासागर के समान निश्चल और अत्यन्त शांत होना
श्रेयस्कर है ॥ ४५-५३ ॥
त्यक्त्वा सदसदास्थां त्वं तिष्ठाक्षुब्धमहाब्धिवत् ।
जायते निश्चयः साधो पुरुषस्य चतुर्विधः ॥५४

महोपनिषद् ] [ १७६
आपादमस्तकमहं मातापितृविनिर्मितः ।
इत्येको निश्चयो ब्रह्मन् बन्धायासवलोकनात् ॥५५
अतीतं सर्वभावेभ्यो वालाग्रादप्यहं तनुः ।
इति द्वितीयो मोक्षाय निश्चयो जायते सताम् ॥५६
जगज्जालपदार्थात्मा सर्व एवाहमक्षयः ।
तृतीयो निश्चयश्चोक्तो मोक्षायैव द्विजोत्तम् ॥५७
अहं जगद्वा सकलं शून्यं व्योम समं सदा ।
एवमेष चतुर्थोऽपि निश्चयो मोक्षसिद्धिदः ॥५८
एतेषां प्रथमः प्रोक्तस्तृष्णया बन्धयोग्यया ।
शुद्धतृष्णास्त्रयः स्वच्छा जीवन्मुक्ता विलासिनः ॥५९
सर्वं चाप्यहमेवेति निश्चयो यो महामते ।
तमादाय विषादाय न भूयो जायते मतिः ॥६०
हे श्रेष्ठ आत्मन् ! मनुष्य चार प्रकार के निश्चय वाला है ।
‘मेरे देह की रचना माता-पिता द्वारा हुई है’ यह प्रथम निश्चय मानना
चाहिए । ‘मैं जगदात्मक भावों से रहित केशाग्र से भी सूक्ष्माकार आत्मा
हूँ’ यह दूसरे प्रकार का निश्चय है । इस निश्चय के द्वारा सन्तजनों को
मुक्ति प्राप्त होती है । ‘मैं अखिल विश्व के पदार्थों का आत्मा सर्वस्वरूप
एवम् अविनाशी हूँ’ यह तीसरे प्रकार का निश्चय भी मुक्ति का कारण
होता है । ‘मैं और यह सम्पूर्ण विश्व आकाश के समान शून्य हैं’ यह
चौथे प्रकार का निश्चय मोक्ष-सिद्धि का दाता है । इनमें प्रथम निश्चय
बन्धन प्रदान करने वाली तृष्णा से ओत-प्रोत है । शेष तीन प्रकार के
निश्चय पवित्र तृष्णा वाले हैं । जो लोग इन तीन प्रकार के निश्चयों
से युक्त होते हैं वे आत्मतत्व में रत रहने वाले जीवन्मुक्त हैं ।
सब कुछ अपने को ही मानने वाले पुरुष फिर-फिर कर विषाद में नहीं
पड़ते हैं ॥ ५४-६० ॥
शून्यं तत् प्रकृतिर्माया ब्रह्म विज्ञानमित्यपि ।
शिवः पूरुष ईशानो नित्यमात्मेति कथ्यते ॥६१