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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

प्रथम अध्याय ] [ २५७

प्रथम अध्याय ] [ २५७
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
द्वितीयं संशयाख्यं च तृतीयं च प्रमत्तता ।
आलस्याख्यं चतुर्थं च निद्रारूपं तु पञ्चमम् ॥५९
षष्ठं तु विरतिर्भ्रान्तिः सप्तमं परिकीर्तितम् ।
विषयं चाष्टमं चैव अनाख्यं नवमं स्मृतम् ॥६०
अलब्धिर्योंगतत्त्वस्य दशमं प्रोच्यते बुधैः ।
इत्येतद्विघ्नदशकं विचारेण त्यजेद्बुधः ॥६१
दिन का सोना, रात का जगना, अति मैथुन, ज्यादा चलना,
मलमूत्र का सदैव रोकना, आसन की विषमता, हठपूर्वक प्राण का अभ्यास
आदि दोषों से शीघ्र ही रोगों का आक्रमण होता है ॥ ५६ ॥ यदि कोई
कहे कि मुझे योगाभ्यास ही से रोग हुआ, तो उसे समझ लेना चाहिए कि
योगाभ्यास का त्याग ही सबसे पहला विघ्न है, दूसरा विघ्न संशय करते
रहना, तीसरा प्रमत्तता, चौथा आलस्य, पाँचवां अधिक निद्रा, छठा प्रेम
न रहना, सातवां भ्रान्ति, आठवां विषमता, नवां अनाख्य और दसवां
योगतत्व की अप्राप्ति है। बुद्धिमान साधक इन सबको विचार कर
इनका त्याग कर दे ॥ ५७-६१ ॥
प्राणाभ्यासस्ततः कार्यों नित्यं सत्त्वास्थया धिया ।
सुषुम्ना लीयते चित्तं न च वायुः प्रधावति ॥६२
शुष्के मले तु योगी च स्याद्नतिश्चालिता ततः ।
अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वंगं कुरुते बलात् ॥६३
आकुञ्चनेन तं प्राहूर्मू'लबन्धोऽयमुच्यते ।
अपानश्चोर्ध्वगो भूत्वा वह्निना सह गच्छति ॥६४
प्राणस्थानं ततो वह्निः प्राणापानौ च सत्वरम् ।
मिलित्वा कुण्डलीं यति प्रसुप्ता कुण्डलाकृतिः ॥६५
तेनाग्निना च संतप्ता पवनेनैव चालिता ।
प्रसार्य स्वशरीर तु सुषुम्नाबदनान्तरे ॥६६
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

२५८ [ योगकुण्डल्‍युपनिषत्
इस प्रकार प्राणायाम का अभ्यास नियमित रूप से सत्वमयी
बुद्धि से करना चाहिए। इसके फलस्वरूप चित्त सुषुम्ना में संलग्न
रहता है और उसमें प्राणवायु दौड़ता है ॥ ६२ ॥ जब मलशोधन हो
जाय और प्राण चलने लगे तब प्रयत्नपूर्वक अपान की ऊर्ध्वगति करनी
चाहिए ॥ ६३ ॥ इसके लिए जो गुदा का आकुंचन किया जाता है,
उसे मूलबन्ध कहते हैं। यह अपान ऊपर आकर अग्नि के साथ संयुक्त
होता है और ऊपर चढ़ता है ॥ ६४ ॥ जब यह अग्नि प्राण स्थान में
पहुँच प्राणवायु से मिलता है और वे सोती हुई कुण्डलिनी को प्राप्त
होते हैं तो उसकी उष्णता से तप्त होकर तथा वायु से चलित होकर
कुण्डलिनी सीधी हो जाती है और सुषुम्ना के मुख में प्रवेश करती है
॥ ६५-६६ ॥
ब्रह्मग्रन्थिं ततो भित्त्वा रजोगुणसमुद्भवम् ।
सुषुम्ना वदने शीघ्रं विद्युल्लेखेव संस्फुरेत् ॥६७
विष्णुग्रन्थिं प्रयात्युच्चैः सत्वरं हृदि संस्थिता ।
ऊर्ध्वं गच्छति यच्चास्ते रुद्रग्रन्थिं तदुद्भवम् ॥६८
भ्रुवोर्मध्यं तु संभिद्य याति शीतांशुमण्डलम् ।
अनाहताख्यं यच्चक्रं दलैः षोडशभिर्युतम् ॥६९
तत्र शीतांशुसंजातं द्रवं शोषयति स्वयम् ।
चलिते प्राणवेगेन रक्तं पित्तं रविर्गृहात् ॥७०
रजोगुण से उत्पन्न ब्रह्मग्रन्थि को भेदकर यह कुण्डलिनी शक्ति
सुषुम्ना के भीतर बिजली की रेखा की तरह चढ़ती है ॥ ६७ ॥ शीघ्र
ही यह हृदय स्थिति विष्णु-ग्रन्थि को प्राप्त होती हुई और भी ऊपर
( आज्ञा चक्र ) जाती है और वहाँ रुद्र-ग्रन्थि को प्राप्त होती है ॥ ६८ ॥
वहाँ से यह भौंहों के मध्य स्थान को भेदती हुई चन्द्रमा के स्थान में
पहुँचती है, जहाँ सोलह पंखुरियों वाला अनाहत चक्र स्थित है ॥ ६९ ॥
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

प्रथम अभ्यास ] [ २५६
यहाँ यह चन्द्रमा से उत्पन्न द्रव को सोख लेती है तथा प्राणवायु के वेग
से रक्त और पित्त को सूर्य ग्रहण कर लेता है ॥ ७० ॥
यातेन्दुचक्रं यत्रास्ते शुद्धश्लेष्मद्रवात्मकम् ।
तन्न सिक्तं ग्रसत्युष्णं कथं शीतस्वभावकम् ॥७१
तथैव रभसा शुक्लं चन्द्ररूपं हि तप्यते ।
ऊर्ध्वं प्रहवति क्षुब्धा तदैव स्रवतेतराम् ॥७२
तस्यास्वादवशाच्चित्तं बहिष्टं विषमेषु यत् ।
तदेव परमं भुक्त्वा स्वस्थस्यात्मरतो युवा ॥७३
प्रकृत्यष्टकरूपं च स्थानं गच्छति कुण्डली ।
क्रोडीकृत्य शिवं याति क्रोडीकृत्य विलीयते ॥७४
इत्यधोध्वंरजः शुक्ले शिवे तदनु मारुतः ।
प्राणापानौ समौ याति सह जातौ तथैव च ॥७५
यह चन्द्र मंडल में जाकर वहाँ के द्रव पदार्थ को शोषण कर
लेती है और उसे उष्ण कर देती है । तब वहाँ शीतलता कैसे रह
सकती है ? ॥ ७१ ॥ यह चन्द्रमा के शुक्ल रूप को तप्त कर देती है
और क्षुब्ध होती हुई ऊपर चढ़ती है ॥ ७२ ॥ इसके प्रभाव से जो
चित्त पहले बाहरी पदार्थों में संलग्न रहता था, वह परमार्थ में लग
कर आत्मानन्द का उपभोग करने लगता है ॥ ७३ ॥ इस प्रकार
कुण्डलिनी अष्टधा प्रकृति को प्राप्त होकर शिव के साथ मिलती है और
उसी के साथ लय को प्राप्त हो जाती है ॥ ७४ ॥ इससे अधोभाग का
रज और ऊपर का शुक्ल मिलकर शिव में लीन हो जाते हैं, तथा प्राण
और अपान भी उन्हीं में लीन हो जाते हैं, क्योंकि वे समान रूप से
उत्पन्न होते हैं ॥ ७५ ॥
भूतेऽल्पे च मनोल्पे वा वाचके त्वतिवर्धते ।
धावयत्यखिला वाता अग्निमूषाहिरण्यवत् ॥७६
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

२६० ] योगकुण्डल्युपनिषत्
आधिभौतिकदेहं तु अधिदैविकविग्रहे ।
देहोऽतिविमलं याति चातिवाहिकतामियात् ॥७७
जाड्यभावविनिर्मुक्तममलं चिन्मयात्मकम् ।
तस्यातिवाहिकं मुख्यं सर्वेषां तु मदात्मकम् ॥७८
जायाभवविनिर्मुक्तिः कालरूपस्य विभ्रमः ।
इति तं स्वस्वरूपा हि मती रज्जुभुजङ्गवत् ॥७९
मृषैवोदेति सकलं मृषैव प्रविलीयते ।
रौप्यबुद्धिः शुक्तिकायां स्त्रीपुंसोर्भ्रंमतो यथा ॥८०
भौतिक देह चाहे छोटा हो या बड़ा हो जब उष्णता बहुत बढ़ती
है तो वह समस्त देह में उसी प्रकार फैल जाती है जैसे गर्मी पाकर सुवर्ण
फैल जाता है ॥ ७६ ॥ इसके प्रभाव से आधिभौतिक देह आधिदैविक
हो जाता है और शरीर अत्यन्त विमल होकर सूक्ष्म शरीर की तरह हो
जाता है ॥ ७७ ॥ वह जड़ता को त्याग कर निर्मल चित्स्वरूप हो
जाता है, जब कि अन्य देह जड़तायुक्त ही बने रहते हैं ॥ ७८ ॥
ऐसे साधक का गर्भवास छूट जाता है और काल का भी उस पर वश
नहीं चलता । उसको अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान हो जाता है । जिस
प्रकार रस्सी में सांप का भ्रम होता है, सीपी में चाँदी का भ्रम होता है,
स्त्री में पुरुष का भ्रम होता है, इसी प्रकार वह अपने देह सम्बन्धी भ्रम
को समझ जाता है कि यह मिथ्या है ॥ ७९-८० ॥
पिण्डब्रह्माण्डयोरैक्यं लिङ्गसूत्रात्मनोरपि ।
स्वापाव्याकृतयोरैक्यं स्वप्रकाशचिदात्मनोः ॥८१
शक्तिः कुण्डलिनी नाम बिसतन्तुनिभा शुभा ।
मूलकन्दं फणाग्रेण दृष्ट्वा कमलकन्दवत् ॥८२
मुखेन पुच्छं संगृह्य ब्रह्मरन्ध्रसमन्विता ।
पद्मासनगतः स्वस्थो गुदमाकुञ्च्य साधकः ॥८३