१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
तृतीय अध्याय ] [ २७१
तृतीय अध्याय ] [ २७१
मनसोत्पद्यते बिन्दुर्यथा क्षीरं घृतात्मकम् ।
न च बन्धनमध्यस्थं तद्वै कारणमानसम् ॥६
चन्द्रार्कमध्यमा शक्तिर्यत्रस्था तत्र बन्धनम् ।
ज्ञात्वा सुषुम्ना तद्भेदं कृत्वा वायुं च मध्यगम् ॥७
स्थित्वाऽसौ बैन्दवस्थाने घ्राणरन्ध्रे निरोधयेत् ।
वायुं बिन्दुं समाख्यातं सत्वं प्रकृ तिमेव च ॥८
षट् चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत्सुखमण्डलम् ।
मूलाधारं स्वाधिष्ठानं मणिपूरं तृतीयकम् ॥६
अनाहतं विशुद्धिं च आज्ञाचक्रं च षष्ठकम् ।
आधारं गुदमित्युक्तं स्वाधिष्ठानं तु लैङ्गिकम् ॥१०
मणिपूरं नाभिदेशं हृदयस्थमनाहतम् ।
विशुद्धिः कण्ठमूले च आज्ञाचक्रं च मस्तकम् ॥११
यह बिन्दु मन से ही उत्पन्न होता है, जैसे दूध से घी प्रकट
होता है। उस बिन्दु में कोई बन्धन नहीं है, वरन् जो कुछ बन्धन है
वह सब मन का ही है ॥ ६॥ सूर्य और चन्द्र के मध्य में जो
शक्ति रहती है वही बन्धन रूप है। इसलिये इन दोनों के मध्य की
सुषुम्ना का ज्ञान प्राप्त करके उसके भीतर प्राण को चलाना
आवश्यक है ॥ ७॥ प्राण को इसी बिन्दु स्थान में स्थिर करके
नासिका से वायु का निरोध करना चाहिये। यही प्राणवायु, बिन्दु,
सत्व और प्रकृति का वर्णन है ॥ ८ ॥ इसके साथ ही षट्चक्रों
की जानकारी भी प्राप्त करनी चाहिये जिससे सुख की स्थिति प्राप्त
हो सके । ये षट्चक्र इस प्रकार है—मूलाधार, स्वाधिष्ठान,
मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा। मूलाधार का स्थान गुदा है,
उसके ऊपर लिङ्ग के समीप स्वाधिष्ठान है, मणिपुर नाभि में है,
अनाहत हृदय में, विशुद्ध कण्ठ में और आज्ञा-चक्र मस्तक में होता
है ॥ ६-११ ॥
२७२ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत्
षट् चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत्सुखमण्डले ।
प्रविशेद्व वायुमाकृष्य तयैवोर्ध्वं नियोजयेत् ॥१२
एवं समभ्यसेद्वायुं स ब्रह्माण्डमयो भवेत् ।
वायुं बिन्दुं तथा चक्रं चित्तं चैव समभ्यसेत् ॥१३
समाधिमेकेन समममृतं यान्ति योगिनः ।
यथाऽग्निर्दारुमध्यस्थो नोत्तिष्ठेन्मथनं विना ॥१४
विना चाभ्यासयोगेन ज्ञानदीपस्तथा न हि ।
घटमध्यगतो दीपो बाह्ये नैव प्रकाशते ॥१५
भिन्ने तस्मिन्घटे चैव दीपज्वाला च भासते ।
स्वकायं घटमित्युक्तं यथा दीपो हि तत्पदम् ॥१६
गुरुवाक्यसमा भिन्ने ब्रह्मज्ञानं स्फुटीभवेत् ।
कर्णधारं गुरुं प्राप्य कृत्वा सूक्ष्मं तरन्ति च ॥१७
इन समस्त चक्रों का ज्ञान प्राप्त करके सुख मण्डल रूप सहस्र
दल कमल में प्रवेश करे और प्राण को ऊर्ध्व भाग में खींचकर स्थित
करे ॥ १२ ॥ इस प्रकार प्राण का अभ्यास करने से ब्रह्माण्ड में स्थित
हो जाती है । प्राणवायु, बिन्दु, चक्र तथा चित्त का उचित रूप से
अभ्यास करके योगीजन एक्य रूप की समाधि तक पहुँच जाते हैं, और
अमृत पद को प्राप्त होते हैं । जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि रहती है, पर
घिसने के बिना वह प्रकट नहीं होती, उसी प्रकार सतत अभ्यास के
बिना योग विद्या का दीपक भी प्रकाशित नहीं होता । अथवा जिस
प्रकार घड़े के भीतर रखा हुआ दीपक बाहर प्रकाश नहीं कर सकता
जब तक कि उस घड़े का भेदन न किया जाय, उसी प्रकार शरीर
रूपी घट के भीतर रखे हुये ब्रह्मरूपी दीप का प्रकाश भी उस समय
तक बाहर नहीं निकलता जब तक गुरु के उपदेश से इस घट का भेदन
नहीं होता । इस प्रकार इस अपार सागर को पार करने का उपाय गुरु
रूपी कर्णधार ही है ॥ १३-१७ ॥