१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
प्रथम अध्याय ] [ २५५
प्रथम अध्याय ] [ २५५
दण्डे से मारी जाने वाली सर्पिणी के समान फुत्कार कर सीधी हो जाती
है ॥४२-४५॥
बिलप्रवेशतो यत्र ब्रह्मनाड्यन्तरं व्रजेत् ।
तस्मान्नित्यं मूलबन्धः कर्तव्यो योगिभिः सदा ॥४६॥
कुम्भकान्ते रेचकादौ कर्तव्यस्तूड्डियाणकः ।
बन्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः ॥४७॥
तस्मादुड्डियणाख्योऽयं योगिभिः समुदाहृतः ।
सति वज्रासने पादौ कराभ्यां धारयेद्दृढम् ॥४८॥
गुल्फदेशसमीपे च कन्दं तत्र प्रपीडयेत् ।
पश्चिमं ताणमुदरे धारयेद्ध दये गले ॥४९॥
शनैः शनैर्यदा प्राणस्तुन्दसंधिं निगच्छति ।
तुन्ददोषं विनिर्धूय कर्तव्यं सततं शनैः ॥५०॥
तब वह बिल में प्रवेश करने के समान सुषुम्ना के भीतर जाती-
है। इस कारण योगियों को मूलबन्ध का अभ्यास सदैव करना चाहिये-
॥ ४६ ॥ कुम्भक के पश्चात् रेचक करने के पूर्व उड्डियानबन्ध करना
चाहिए, जिससे प्राण वायु सुषुम्ना के भीतर उड़ती है । इसलिए
योगीजन इसको उड्डियाण कहते हैं। इसके लिये वज्रासन लगाकर पैरों-
को हाथों से दृढ़तापूर्वक पकड़े। जहाँ गुल्फ (टखना) रखा जाता है
वहाँ कन्द स्थानों को दबाये, पेट को ऊपर की तरफ खींचे और हृदय-
तथा गले को भी तनाव देकर खींचे। इस विधि से प्राण क्रमशः पेट की
संधियों में प्रवेश करता है और पेट के सब दोषों को दूर करता है। इस-
कारण यह अभ्यास सदैव करते रहना चाहिये ॥४७-५०॥
पूरकान्ते तु कर्तव्यो बन्धो जालन्धराभिधः ।
कण्ठसंकोचरूपोऽसौ वायुमार्गनिरोधकः ॥५१॥
अधस्तात्कुञ्चनेनाशु कण्ठसंकोचने कृते ।
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२५६ [CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri] योगकुण्डल्युपनिषत्
मध्ये पश्चिमताणेन स्यात्प्राणो ब्रह्मनाडिगः ॥५२॥
पूर्वोक्तेन क्रमेणैव सम्यगासनमास्थितः ।
चालनं तु सरस्वत्याः कृत्वा प्राणं निरोधयेत् ॥५३॥
प्रथमे दिवसे कार्यं कुम्भकानां चतुष्टयम् ।
प्रत्येकं दशसंख्याकं द्वितीये पञ्चभिस्तथा ॥५४॥
विंशत्यलं तृतीयेऽह्नि पञ्चवृद्ध्या दिने दिने ।
कर्तव्यः कुम्भको नित्यं बन्धत्रयसमन्वितः ॥५५॥
जालन्धरबंध में कंठ का संकोचन वायु को रोकने के निमित्त
किया जाता है, वह बंध पूरक के अन्त में करना होता है ॥ ५१ ॥
अधोभाग में मूलबंध द्वारा गुदा का आकुंचन करे और ऊपर से जालंधर
बन्ध द्वारा कण्ठ का संकोचन करे और मध्य में पश्चिमतान(उड्डीयान)
से प्राण को खींचे। इस प्रकार सब तरफ से रोका जाकर प्राण
ब्रह्मनाड़ी (सुषुम्ना) में चढ़ता है ॥ ५२ ॥ जैसे पहले बतलाया गया
है सम्यक प्रकार से आसन पर बैठकर सरस्वती का चालन करके प्राण
का निरोध करना चाहिये ॥ ५३ ॥ प्रथम दिन चारों कुम्भकों को
दस-दस बार करना चाहिए और दूसरे दिन पन्द्रह-पन्द्रह बार करना
चाहिये। तीसरे दिन बीस-बीस करना चाहिये, इसी प्रकार प्रतिदिन
पाँच-पाँच बढ़ाता जाय। इन कुम्भकों का अभ्यास प्रतिदिन तीन बन्ध
सहित करना चाहिये ॥५४-५५॥
दिवा सुप्तिर्निशायां तु जागरादतिमैथुनात् ।
बहुसंक्रमणं नित्यं रोधान्मूत्रपुरीषयोः ॥५६॥
विषमासनदौषाश्च प्रयासप्राणचिन्तनात् ।
शीघ्रमूत्पद्यते रोगः स्तम्भयेद्यदि संयमी ॥५७॥
योगाभ्यासेन मे रोग उत्पन्न इति कथ्यते ।
ततोऽभ्यासं त्यजेदेवं प्रथमं विघ्नमुच्यते ॥५८॥
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi