१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 324, कुल 572 में से
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३१६ ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत्
तीन सौ रुद्राक्ष ( धारण, अधम, पांच सौ मध्यम तथा एक हजार उत्तम
कहा गया है, इस प्रकार के भेद से धारण करना चाहिये ॥२२॥ शिर
में 'ईशानः सर्वविद्यानां'•••••••••इस मन्त्र से कण्ठ में 'तत्पुरुषाय विद्महे'
'महादेवाय' इस मन्त्र से गले में 'अघोरेभ्यो' इस मन्त्र से, गले तथा
हृदय में भी रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥२३॥ अघोर बीजमन्त्र के
द्वारा विद्वान को चाहिये कि हाथों में धारण करे तथा रुद्राक्षों के बीच
जो छेद होता है उसमें अ से लेकर क्ष तक जो ये पचास अक्षर हैं इन्हें
लिखकर पञ्चाक्षरी मन्त्र [ नमः शिवाय ] से अभिमन्त्रित करके
[ अक्षमालोपनिषद में कही गई रीतियों के अनुसार ] प्राण प्रतिष्ठादि
करके मूलमन्त्र से गूंथ कर तीन पाँच अथवा सात मालाओं के रूप में
धारण करना चाहिये ॥२४-२५॥
अथ हैन भगवन्तं कालाग्निरुद्रं भुसुण्डः पप्रच्छ रुद्राक्षाणां
भेदेन यदक्षं यत्स्वरूपं यत्फलमिति तत्स्वरूप मुखयुक्तमरिष्टनिर-
सनं कामाभीष्टफल ब्रूहीति होवाच ॥ २६
तत्रे ते श्लोका भवन्ति—
एकवक्त्रं रुद्राक्षं परतत्त्वस्वरूपकम् ।
तद्धारणात् परे तत्वे लीयते विजितेन्द्रियः ॥ २७
द्विवक्त्रं तु मुनिश्रेष्ठ चार्धनारीश्वरात्मकम् ।
धारणादर्धनारीशः प्रीयते तस्य नित्यशः ॥ २८
त्रिमुखं चैव रुद्राक्षमग्नित्रयस्वरूपकम् ।
तद्धारणाच्च हुतभुक्तस्य तुष्यति नित्यदा ॥ २९
चतुर्मुखं तु रुद्राक्षं चतुर्वक्त्रस्वरूपकम् ।
तद्धारणाच्चतुर्वक्त्रः प्रोयते तस्य नित्यदा ॥ ३०
इसके बाद इन भगवान कालाग्नि रुद्र से भुसुण्ड ने पूछा कि
रुद्राक्षों के भेद से जिन रुद्राक्षों का जो स्वरूप तथा जो फल होता है