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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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पृष्ठ 321

रुद्राक्षजाबालोपनिषत् । [ ३१३
बदरीफलमात्रं तु मध्यमं प्रोच्यते बुधैः ।
अधमं चणमात्रं स्यात् प्रक्रियैषा मयोच्यते ॥ ९.
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चेति शिवाज्ञया ।
वृक्षा जाताः पृथिव्यां तु तज्जातीयाः शुभाक्षकाः ॥ १०
यह रुद्राक्ष, धारण करने से दिन तथा रात के किये हुये भक्तों
के पापों को हर लेता है । दर्शन से तो लाख गुना पुण्य तथा उसको
धारण करने से करोड़ गुना पुण्य होता है ॥६॥ करोड़ ही नहीं अरब
गुना पुण्य उसको धारण करने से मनुष्य प्राप्त करता है तथा रुद्राक्ष
धारण करने से और जप करने से मनुष्य [ जप की अपेक्षा ] लाख
करोड़ हजार गुना लाख करोड़ सौ गुना पुण्य प्राप्त करता है ॥७॥ जो
रुद्राक्ष आंवले के बराबर हो वह श्रेष्ठ कहा गया है ॥८॥ और जो
बेर के समान हो उसे विद्वान मनुष्य मध्यम कहते हैं तथा जो चने के
बराबर हो वह रुद्राक्ष अधम कहा जाता है। अब उसकी प्रक्रिया कहता
हूं ॥९॥ शिवजी की आज्ञा से उस मङ्गलमय रुद्राक्ष के ब्राह्मण क्षत्रिय
वैश्य तथा शूद्र जाति के [ रुद्राक्ष ] वृक्ष उत्पन्न हुए ॥१०॥
श्वेतास्तु ब्राह्मणा ज्ञेयाः क्षत्रिया रक्तवर्णकाः ।
पीता वैश्यास्तु विज्ञेयाः कृष्णाः शूद्रा उदाहृताः ॥ ११
ब्राह्मणो बिभृयाच्छ्वेतान् रक्तान् राजा तु धारयेत् ।
पीतान् वैश्यस्तु बिभृयात् कृष्णाञ्छूद्रस्तु धारयेत् ॥ १२
समाः स्निग्धा दृढाः स्थूलाः कण्टकैः संयुताः शुभाः ।
कृमिदष्टं छिन्नभिन्नं कण्टकैर्हीनमेव च ॥ १३
व्रणयुक्तमयुक्तं च षड् रुद्राक्षाणि वर्जयेत् ।
स्वयमेव कृतद्वारं रुद्राक्ष स्यादिहोत्तमम् ॥ १४
यत्तु पौरुषयत्नेन कृतं तन्मध्यमं भवेत् ।