१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 320, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें३१२ ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत्
तत्राश्रुबिन्दवो जाता महारुद्राक्षवृक्षकाः ।
स्थावरत्वतनुप्राप्य भक्तानुग्रहकारणात् ॥ ५
रुद्राक्ष के विषय में भुसुण्ड का प्रश्न—एक समय इन कालाग्नि
रुद्र से भुसुण्ड ने पूछा—कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति कैसे हुई ? और उसको
धारण करने से क्या फल होता है ? ॥१॥ भगवान् कालाग्नि रुद्र ने
उसको कहा कि त्रिपुर नामक राक्षस को मारने के लिए मैंने आँखें बन्द
करलीं अर्थात् समाधिस्थ होगया । तब उन आंखों से जल की बूंदें
पृथ्वी में गिरीं और वह रुद्राक्ष बन गईं । सब के ऊपर कृपा करने के
लिए ( मैं इतना ही कहता हूँ ) कि उसके नाम लेने मात्र से दस गौ
दान करने का फल और देखने तथा स्पर्श करने से दुगुना फल होता है ।
इससे अधिक ( आगे ) मैं नहीं कह सकता ॥२॥ इस विषय में श्लोक
हैं—प्रश्नः—कहां स्थित हैं ? क्या नाम है ? और कैसे मनुष्य इसे
धारण करते हैं ? कितने भेद हैं ? और किन मन्त्रों से किस प्रकार
धारण किये जाते हैं ? ॥३॥ उत्तर—एक हजार दिव्य वर्ष [ देवताओं
के वर्ष ] में मैंने आँखें खोलीं तो पृथ्वी में आंखों से जल की बूंदें गिरीं
॥४॥ वहां आंसू की बूंदें महारुद्राक्ष के पेड़ बन गईं और भक्तों पर
दया की दृष्टि से स्थावर [ अचल ] हो गईं ॥५॥
भक्तानां धारणात् पापं दिवारात्रिकृतं हरेत् ।
लक्षं तु दर्शनात् पुण्यं कोटिस्तद्धारणाद्भवेत् ॥ ६
तस्य कोटिशतं पुण्यं लभते धारणान्नरः ।
लक्षकोटिसहस्राणि लक्षकोटिशतानि च ॥ ७
तज्जपाल्लभते पुण्यं नरो रुद्राक्षधारणात् ।
धात्रीफलप्रमाणं यच्छ्रेष्ठमेतदुदाहृतम् ॥ ८