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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

उत्तरकाण्ड ] [ २३५

उत्तरकाण्ड ] [ २३५
ब्रह्मैवेदममृतं तत्पुरस्ता—
द्व्रह्मानन्दं परमं चैव पश्चात् ।
ब्रह्मानन्दं परमं दक्षिणे च
ब्रह्मानन्दं परमं चोत्तरं च ॥३०
एक मात्र वह परमात्मा ही सदा से वर्तमान है और अन्य सब
भेद, आदि तथा भेदाभेद उसमें ही व्याप्त हैं ॥ २६ ॥ वस्तु या
अवस्तु जो कुछ है वह सब साक्षात् ब्रह्म ही है । ऐसी अवस्था में
ब्रह्मज्ञान रखने वाला किसी का ग्रहण या त्याग कैसे कर सकता
है ? ॥ २७ ॥ जो ब्रह्म उपमारहित, वाणी और मन से अगोचर,
दृष्टि से दिखाई न देने वाला, ग्रहण न कर सकने योग्य, अगोत्र,
रूप रहित है, जो नेत्र, कान, हाथ, पैर आदि से रहित, नित्य, विभु,
सर्वगत, सूक्ष्म, अव्यय, मृत्युरहित है वही सब का अधिष्ठान या
आधार स्वरूप है । उसके आगे और पीछे श्रेष्ठ ब्रह्मानन्द ही है, दांये,
बांये भी वह परम ब्रह्मानन्द है ॥३०॥
स्वात्मन्येव स्वयं सर्वं सदा पश्यति निर्भयः ।
तदा मुक्तो न मुक्तश्च बद्धस्यैव विमुक्तता ॥३१
एवंरूपा परा विद्या सत्येन तपसाऽपि च ।
ब्रह्मचर्यादिभिर्धर्मैर्लभ्या वेदान्तवर्त्मना ॥३२
स्वशरीरे स्वयंज्योतिःस्वरूपं परमार्थिकम् ।
क्षीणदोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययाऽऽवृताः ॥३३
एवं स्वरूपविज्ञानं यस्य कस्यास्ति योगिनः ।
कुत्रचिद्गमनं नास्ति तस्य संपूर्ण रूपिणः ॥३४
आकाशमेकं संपूर्णं कुत्रचिन्न हि गच्छति ।
तद्वद्ब्रह्मात्मविच्छ्रेष्ठः कुत्रचिन्नैव गच्छति ॥३५

२३६ ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषत्
ऐसा साधक सब को सदा अपनी आत्मा के भीतर ही
निःशङ्क भाव से देखता है । इस प्रकार भाव रखने से ज्ञानी ही नहीं
अज्ञानी तक भी मुक्त हो जाता है ॥ ३१ ॥ यह परविद्या
सत्य, तपस्या और ब्रह्मचर्य से वेदान्त मार्ग द्वारा प्राप्त होती है ॥३२॥
जिनका अन्तःकरण शुद्ध है, जिसके दोष क्षीण हो गये हैं, वे ही
अपने भीतर स्वयं प्रकाशमान परमात्मा को देख सकते हैं, माया में फंसे
हुये उसको नहीं देख सकते ॥ ३३ ॥ जो योगी अपने स्वरूप
को इस प्रकार जानता है, उस पूर्णता प्राप्त का आवागमन नहीं
होता है ॥ ३४ ॥ जैसे जो सर्वत्र उपस्थित है वह कहीं नहीं आता
जाता, उसी प्रकार जिसने अपने को ब्रह्म रूप समझ लिया है वह कहीं
नहीं आ-जा सकता ॥३५॥
अभक्ष्यस्य निवृत्या तु विशुद्धं हृदयं भवेत् ।
आहारशुद्धौ चित्तस्य विशुद्धिर्भवति स्वतः ॥३६
चित्ते शुद्धे क्रमाज्ज्ञानं त्रुट्यन्ते ग्रन्थयः स्फुटम् ।
अभक्ष्यं ब्रह्मविज्ञानस्यैव देहिनः ॥३७
न सम्यग्ज्ञानिनस्तद्वत्स्वरूपं सकलं खलु ।
अहमन्नं सदाऽन्नाद इति हि ब्रह्मवेदनम् ॥३८
ब्रह्मविद्ग्रसति ज्ञानात्सर्वं ब्रह्मात्मनैव तु ।
ब्रह्मक्षत्रादिकं सर्वं यस्य स्यादोदनं सदा ॥३९
यस्योपसेचनं मृत्युस्त्यज्ज्ञानी तादृशः खलु ।
ब्रह्मस्वरूपविज्ञानाज्जगद्भोज्यं भवेत्खलु ॥४०
आहार में अभक्ष्य का त्याग कर देने से चित्त शुद्ध हो जाता
है, आहार की शुद्धि से चित्त की शुद्धि स्वयमेव हो जाती है ॥३६॥
जब चित्त शुद्ध हो जाता है तो क्रम से ज्ञान होता जाता है
और अज्ञान की ग्रन्थियां नष्ट हो जाती हैं । पर भक्ष्याभक्ष्य का विचार
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi