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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१०८ ] [ तृतीय अध्याय

१०८ ] [ तृतीय अध्याय
शाम्यतीदं कथं दुःखमिति तप्तोऽस्मि चेतसा ॥६
चिन्तानिचयचक्राणि नानन्दाय धनानि मे ।
सप्रसूतकलत्राणि गृहाण्युग्रापदामिव ॥७
इयमस्मिन् स्थितोदारा संसारे परिपेलवा ।
श्रीर्मुने परिमोहाय साऽपि नूनं न शर्मदा ॥८
आयुः पल्लवकाणाग्रलम्बाम्बुकणभंगुरम् ।
उन्मत्त इव संत्यज्य यात्यकाण्डे शरीरकम् ॥६
विषयाशीविषासंगपरिजर्जरचेतसाम् ।
अप्रौढात्मविवेकानामायुरायासकारणम् ॥१०
बाल्यावस्था से ही तपकांक्षी निदाघ अपने पिता से आज्ञा लेकर
तीर्थयात्रा के उद्देश्य से चल पड़े। अपनी इस यात्रा में उन्होंने साढ़े तीन
करोड़ तीर्थों में स्नान किया। फिर घर लौटकर अपने पिता महर्षि ऋभु
को अपनी बात सुनाते हुए कहा—'पिता जी, मैंने जिन साढ़े तीन करोड़
तीर्थों में स्नान किया है, उनके पुण्य स्वरूप मेरे मन में यह विचार उत्पन्न
हुए हैं कि यह विश्व उत्पन्न होता और नष्ट हो जाता है और फिर उत्पन्न
होने के लिये ही नष्ट होता है। तभी चराचर जीवों की चेष्टा वाला यह
प्रपंच अस्थिर है, इसका जीवन क्षण-मात्र है। यह ऐश्वर्ययुक्त सम्पूर्ण
पदार्थ विपत्तियों के कारण हैं। यह सभी लोहे की कील के समान
परस्पर पृथक रहते हुए मानसिक कल्पना रूप चुम्बक के द्वारा ही एकत्र
किये जाते हैं। जैसे मार्ग चलने वाला व्यक्ति मरुभूमि में चलते-चलते
विरक्त हो जाता है, वैसे ही मैं इन सब सांसारिक पदार्थों से विरक्त हो
रहा हूँ। क्योंकि यह मुझे दुःखदायी जान पड़ते हैं। इस दुःख से मुक्ति
किस प्रकार मिलेगी, यह विचार मेरे हृदय को सन्तप्त कर रहा है।
जिन धन रूप ऐश्वर्यों के कारण चिन्ताएँ चक्कर काटती रहती हैं, वे
धन मेरे लिये सुख देने वाले नहीं हैं। स्त्री, पुत्र आदि सब घोर विपत्तियों
के घर हैं। विश्व में उदारता की मूर्ति, अत्यन्त कोमलांगी वह लक्ष्मी जी

महोपनिषत् [ १०६
भी अत्यन्त मोह उत्पन्न करने वाली हैं। निश्चय ही उनके द्वारा जीव
को सुख प्राप्त नहीं हो सकता। जैसे प०त्ते के अग्रभाग में जो जल की बूँद
लटकती हैं वह क्षणभंगुर है, वैसे ही मनुष्य की आयु भी क्षणभंगुर है।
इसलिये असमय ही इस देह को त्याग कर मुझे उन्मत्त के समान प्रस्थान
करना पड़ेगा। जिनका मन विषयरूपी सर्प के सङ्ग से जीर्ण होगया है
और जिनको आत्म विवेक की प्राप्ति नहीं हुई, उनका जीवन कष्ट का
ही कारण बना है ॥९—१०॥
युज्यते वेष्टनं वायोराकाशस्यः च खण्डनम्।
ग्रथनं च तरंगाणामास्था नायुषि युज्यते ॥११
प्राप्यं संप्राप्यते येन भूयो येन न शोच्यते।
पराया निर्वृतेः स्थानं यत्तज्जीवितमुच्यते ॥१२
तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः।
स जीवति मनो यस्य मननेनोपजीवति ॥१३
जातास्त एव जगति जन्तवः साधुजीविताः।
ये पुनर्नैह जायन्ते शेषा जरठगर्दभाः ॥१४
भारो विवेकिनः शास्त्रं भारो ज्ञानं च रागिणः।
अशान्तस्य मनो भारं भारोऽनात्मविदो वपुः ॥१५
अहंकारवशादापदहंकाराद्दुराधयः।
अहंकारवशादीहा नाहंकारात् परो रिपुः ॥१६
अहङ्कारवशाद्यच्चन्मया भुक्तं चराचरम्।
तत्तत् सर्वंभवस्त्वेव वस्त्वहंकाररिक्तता ॥१७
इतश्चेतश्च सुव्यग्रं व्यर्थमेवाभिधावति।
मनो दूरतरं याति ग्रामे कौलेयको यथा ॥१८
क्रूरेण जनतां याता (तः) तृष्णाभार्याऽनुगामिना।
वशां कौलेयकेनैव ब्रह्मन् भुक्तोऽस्मि चेतसा ॥१९
अध्यंष्ठिपमात्म्हतः सुमेरूमूलनादपि