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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१७२ ] षष्ठ अध्याय

१७२ ] षष्ठ अध्याय
तते ब्रह्मघने नित्ये संभवन्ति न कल्पिताः ।
न शोकोऽस्ति न मोहोऽस्ति न जराऽस्ति न जन्म वा ॥१३॥
यदस्तीह तदेवास्ति विज्वरो भव सर्वदा ।
यथाप्राप्तानुभवतः सर्वत्वानभिवाञ्छनात् ॥१४॥
त्यागादानपरित्यागी विज्वरो भव सर्वदा ।
यस्येदं जन्म पाश्चात्यं तमाश्वेव महामते ॥१५॥
विशन्ति विद्या विमला मुक्ता वेणुमिवोत्तमम् ।
विरक्तमनसां सम्यक् स्वप्रसङ्गादुदाहृतम् ॥१६॥
द्रष्टृदृश्यसमायोगात् प्रत्ययानन्दनिश्चयः ।
यस्तं स्वमात्मतत्त्वोत्थं निष्पन्दं समुपास्महे ॥१७॥
द्रष्टृदर्शनदृश्यानि त्यक्त्वा वासनया सह ।
दर्शनप्रथमाभासमात्मानं समुपास्महे ॥१८॥
द्वयोर्मध्यगं नित्यमस्तिनास्तीति पक्षयोः ।
प्रकाशनं प्रकाशानामात्मानं समुपास्महे ॥१९॥
संत्यज्य हृद्गुहेशानं देवमन्यं प्रयान्ति ये ।
ते रत्नमभिवाञ्छन्ति त्यक्तहस्तस्थकौस्तुभाः ॥२०॥
उत्थितानुत्थितानेतानिन्द्रियारीन् पुनः पुनः ।
हन्याद्विवेकदण्डेन वज्रेणेव हरिर्गिरीन् ॥२१॥
हे पाप रहित-निदाघ ! मैं अन्य हूँ और यह अन्य है, इस प्रकार
की भ्रांति त्याग देने योग्य ही है । जहाँ मैं नहीं हूँ, वह स्थान नहीं है,
उस वस्तु का भी अभाव है, जो आत्ममय नहीं हो । यह सभी कुछ
सत् और चिन्मय है तो मैं अन्य किस वस्तु की अभिलाषा करूँ ? यह
सभी कुछ आत्मा है, यह निश्चय ही ब्रह्म है । इसमें शोक, मोह, जरा,
जन्म कुछ भी नहीं है । इस नित्य सच्चिदानन्द घन परमेश्वर में कल्प-

नात्मक भावों की संभावना नहीं है । जो आत्मतत्व में है, वही सब
कुछ है। इसलिए कहीं भी, किसी भी वस्तु की कामना न करते हुए जो
सहज में ही प्राप्त हो जाय, उसको निर्लिप्त भाव से भोगता रहे । न
किसी का त्याग और न ग्रहण, इस प्रकार विकार रहित रहो । हे पुत्र !
जिस पुरुष का यह जन्म अन्तिम अर्थात् जिसका आगे जन्म नहीं
होना है उस पुरुष में श्रेष्ठ जाति के मुक्ता के समान स्वच्छ विद्या प्रविष्ट
होती है । जिनके चित्त में वैराग्य का समावेश है उनके द्वारा भले
प्रकार अपने अनुभव द्वारा यह मत व्यक्त किया जाता है कि दृष्टा को
दृश्य के द्वारा जिस सुख की अनुभूति होती है, वह आत्मतत्व से उत्पन्न
हुआ स्पन्दन ही है और हम उसी का भले प्रकार से उपासना करते हैं ।
अस्ति और नास्ति के मध्यस्थ, प्रकाशों के भी प्रकाशक आत्मा के हम
उपासक हैं । वह आत्मा हमारे हृदय में महेश्वर रूप में स्थित है। जो
व्यक्ति उस शाश्वत आत्मा को छोड़कर अन्य वस्तुओं की उपलब्धि के लिए
प्रयत्नशील हैं, वे अपनी हस्तगता कौस्तुभ मणि का परित्याग कर अन्य
रत्न की कामना करते हैं । यह इन्द्रिय रूपी शत्रु सबल हों या बलहीन,
विवेक रूपी दण्ड से बारम्बार ताडन करने योग्य हैं । जैसे इन्द्र अपने
वज्र के प्रहार द्वारा बड़े-बड़े पर्वतों को भी गिरा देते हैं, वैसे ही विवेक
बुद्धि के द्वारा इन्द्रिय रूपी शत्रुओं को उठने न देना चाहिए ॥११-२१॥

संसाररात्रिदुःस्वप्ने शून्ये देहमये भ्रमे ।
सर्वतवापवित्रं तद्दृष्टं संसृतिविभ्रमम् ॥२२॥
अज्ञानोपहतो बाल्ये यौवने वनिताहतः ।
शेषे कलत्रचिन्तार्त्तः किं करोति नराधमः ॥२३॥
सतोऽसत्ता स्थिता मूर्ध्नि रम्याणां मूर्च्छयंरम्यता ।
सुखानां मूर्ध्नि दुःखानि किमेकं संश्रयाम्यहम् ॥२४॥
येषां निमेषणोन्मेषौ जगतः प्रलयोदयौ ।