१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०२ ] [ अक्षमालिकोपनिषत्
कृत्याऽदिनाशकर दुर्धर्ष चतुर्विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं झंकार
भूतनाशकर पञ्चविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं ञंकार मृत्युप्रमथन
षड्विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं टंकार सर्वव्याधिहर सुभग सप्तविं-
शेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं ठंकार चन्द्ररूपाष्टाविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
ओं डंकार गरुडात्मक विषघ्न शोभनैकोनत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ ।
ओं ढंकार सर्वसंपत्प्रद सुभग त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं णंकार
सर्वसिद्धिप्रद मोहकरैकत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं तंकार धन-
धान्यादिसंपत्प्रद प्रसन्न द्वात्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं थंकार
धर्मप्राप्तिकर निर्मल त्रयस्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं दंकार
पुष्टिवृद्धिकर प्रियदर्शन चतुस्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं धंकार
विषज्वरनिघ्न विपुल पञ्चत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं नंकार भुक्ति-
मुक्तिप्रद शान्त षट्त्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं पंकार विषविघ्न-
नाशन भव्य सप्तत्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं फंकाराणिमादिसिद्धि-
प्रद ज्योतीरूपाष्टात्रिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं बंकार सर्वदोषहर
शोभनैकोनचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं भंकार भूत प्रशान्तिकर
भयानक चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं मंकार विद्वेषिमोहनकरै-
कचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं यंकार सर्वव्यापक पावन
द्विचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं रंकार दाहकर विकृत
त्रिचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं लंकार विश्वम्भर भासुर
चतुश्चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं वंकार सर्वाप्यायकर निर्मल
पञ्चचत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं शंकार सर्वफलप्रद पवित्र
षट्चत्वारिंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं षंकार धर्मार्थकामद धवल