१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
१६६ ] [ पंचम अध्याय
१६६ ] [ पंचम अध्याय
परमार्थेन विप्रेन्द्र मिथ्या सर्वं तु दृश्यते ॥१६५
कोशमाशाभुजंगानां संसाराडम्बरं त्यज ।
असदेतदिति ज्ञात्वा मातृभाव निवेशय ॥१६६
गन्धर्वनगरस्यार्थे भूषितेऽभूषिते तथा ।
अविद्यांशे सुतादौ वा कः क्रमः सुखदुःखयोः ॥१६७
धनदारेषु वृद्धेषु दुःखं युक्तं न तुष्टता ।
वृद्धायां मोहमायायां कः समाश्वासवानिह ॥१६८
यैरेव जायते रागो मूर्खस्याधिकतां गतै ।
तैरेव भोगैः प्राज्ञस्य विराग उपजायते ॥१६६
अतो निदाघ तत्त्वज्ञ व्यवहारेषु संसृतेः ।
नष्टं नष्टंपेक्षस्व प्राप्तं प्राप्तमुपाहर ॥१७०
अनागतानां भोगानामवाञ्छनमकृत्रिमम् ।
आगतानां च संभोग इति पण्डितलक्षणम् ॥१७१
शुद्धं सदतोर्मध्यं पदं बुद्ध्वाऽवलम्ब्य च ।
सबाह्याभ्यन्तरं दृश्यं मा गृहाण विमुञ्च मा ॥१७२
यस्य नेच्छा तथाऽनिच्छा ज्ञस्य कर्मणि तिष्ठतः ।
न तस्य लिप्यते प्रज्ञा पद्मपत्रमिवाम्बुभिः ॥१७३
यदि ते नेन्द्रियार्थश्रीः स्वदते हृदि वै द्विज ।
तदा विज्ञातविज्ञेयः समुत्तीर्णो भवार्णवात् ॥१७४
उच्चैः पदाय परया प्रज्ञया वासनागणात् ।
पुष्पाद्गन्धमिवोदारं चेतोवृत्तिं पृथक्कुरु ॥१७५
इस प्रकार प्रकट हुये ब्रह्मा जी भूत, भविष्यत, वर्तमान के प्रत्यक्ष
देखने वाले हैं। उन्होंने अपने सुन्दर देह को देखकर विचार किया कि
इस चिन्मात्र रूपी परमाकाश का आदि अन्त नहीं दिखाई देता । इसमें
महोपनिषत् [ १६७
सर्व प्रथम क्या हो ?' ऐसा विचार करते हुये उनकी आत्म-दृष्टि चैतन्य
हुई और उन्हें अतीत में हुई सृष्टि के अनेकों सर्ग दिखाई दिए ।
उससे उन्हें सब धर्मों और गुणों के क्रम याद हो आए । उन्होंने अपने
संकल्पों के द्वारा ही लीला पूर्वक विभिन्न प्रकार के रङ्गरूप और आचार
विचार वाली प्रजा को उत्पन्न किया । उनके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की
सिद्धि के लिये उन्होंने चित्र-विचित्र पदार्थों पद्धतियों, शास्त्रों और स्वर्ग
नरकादि की कल्पना की। हे पुत्र ! यह मन ही ब्रह्मरूप है, क्योंकि
कल्पना द्वारा संसार के स्थित होने के कारण ब्रह्मा के जीवन के साथ
ही इसका जीवन है। जब ब्रह्मा की आयु समाप्त होती है, तब यह मन
भी समाप्त हो जाता है । हे ब्रह्मन् ! यथार्थ में तो न कहीं कोई जन्म
लेता है और न मृत्यु को प्राप्त होता है। यह जो कुछ दिखाई देता है वह
सब मिथ्या है । यह संसार प्रपंच आशारूपी सर्पिणियों की पिटारी
मात्र है, इसका त्याग करना ही श्रेयस्कर है। इसे असत् जानकर मातृ-
भाव में अवस्थित होना उचित है। गंधर्व नगर सुसज्जित या असज्जित
कैसा भी क्यों न हो, तुच्छ ही है। उसी के समान अविद्या के अंश रूप
यह पुत्र, पत्नी आदि भी तुच्छ ही हैं। फिर इनके कारण सुख-दुःख
मानने से क्या लाभ है ? धन, स्त्री आदि सब कुछ प्रपंच है, इनकी वृद्धि
दुःख का ही कारण है। इसमें संतोष मानना ही निरर्थक है। मोह-
माया की वृद्धि होने पर कोई भी सुख-शान्ति नहीं पा सका । जो वस्तुएँ
अज्ञानी पुरुष को सुखमय प्रतीत होती हैं, उन्हीं वस्तुओं के प्रति ज्ञानी
पुरुष विरक्त रहते हैं । इसलिये हे पुत्र ! तुम तत्वज्ञानी हो, जागतिक
व्यवहारों में जिस-जिस का अभाव होता जाय उसकी इच्छा मत करो
और जो-जो सहज प्राप्त हो, उसे ग्रहण करते रहो । अप्राप्त भोगों की
इच्छा न करना और प्राप्त भोगों का उपभोग करना, यही पाण्डित्य है ।
सत्-असत् के मध्य शुद्ध पद का ज्ञान पाकर उसका अवलम्बन करना
और बाह्याभ्यांतरिक दृश्यों का न ग्रहण करना और न त्याग करना,