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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages
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पातंजल-योगसूत्र—२ १९१

दमन कैसे होगा ? उन्हें कैसे दबाया जाय ? जब मैं क्रुद्ध होता हूँ, तब मेरा सारा मन मानो क्रोध की एक बड़ी तरंग में परिणत हो जाता है। मैं वह अनुभव कर सकता हूँ, उसे देख सकता हूँ, उसे मानो हाथ में लेकर हिला-डुला सकता हूँ, उसके साथ अनायास ही, जो इच्छा हो वही कर सकता हूँ, उसके साथ लड़ाई कर सकता हूँ, पर यदि मैं मन के अत्यन्त गहरे प्रदेश में न जा सकूँ, तो कभी भी मैं उसे जड़ से उखाड़ने में सफल न हो सकूँगा। कोई मुझे दो कड़ी बातें सुना देता है, और मैं अनुभव करता हूँ कि मेरा खून गरम होता जा रहा है। उसके और भी कुछ कहने पर मेरा खून उबल उठता है और मैं अपने आपे से बाहर हो जाता हूँ, क्रोध-वृत्ति के साथ मानो अपने को एक कर लेता हूँ। जब उसने मुझे सुनाना आरम्भ किया था, उस समय मुझे अनुभव हो रहा था कि मुझमें क्रोध आ रहा है। उस समय क्रोध अलग था और मैं अलग; किन्तु जब मैं क्रुद्ध हो उठा, तो मैं ही मानो क्रोध में परिणत हो गया। इन वृत्तियों को जड़ से—उनकी सूक्ष्मावस्था से ही उखाड़ना पड़ेगा, वे हमारे ऊपर कार्य कर रही है, यह समझने के पहले ही उन पर संयम करना पड़ेगा। संसार के अधिकतर मनुष्यों को तो इन वृत्तियों की सूक्ष्मावस्था के अस्तित्व तक का पता नहीं। जिस अवस्था में ये वृत्तियाँ अवचेतन अर्थात् ज्ञान की निम्न भूमि से थोड़ी-थोड़ी करके उदित होती हैं, उसी को वृत्ति की सूक्ष्मावस्था कहते हैं। जब किसी सरोवर की तली से एक बुलबुला ऊपर उठता है, तब हम उसे देख नहीं पाते; केवल इतना ही नहीं, जब वह सतह के बिलकुल नजदीक आ जाता है, तब भी हम उसे देख नहीं पाते, पर जब वह ऊपर उठकर फट जाता है और एक लहर फैला देता है, तभी हम उसका

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अस्तित्व जान पाते हैं। इसी प्रकार जब हम इन वृत्तियों को उनकी सूक्ष्मावस्था में ही पकड़ सकेंगे, तभी हम उन्हें रोकने में समर्थ हो सकेंगे। उनके स्थूल रूप धारण करने के पहले ही यदि हम उनको पकड़ न सके, उनको संयत न कर सके, तो फिर किसी भी वासना पर सम्पूर्ण रूप से जय प्राप्त कर सकने की आशा नहीं। वासनाओं को संयत करने के लिए हमें उनके मूल में जाना पड़ेगा। तभी हम उनके बीज तक को दग्ध कर डालने में सफल होंगे। जैसे भूने हुए बीज जमीन में बो देने पर फिर अंकुरित नहीं होते, उसी प्रकार ये वासनाएँ भी फिर कभी उदित न होंगी।

ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥१०॥

**सूत्रार्थ—**उन सूक्ष्म संस्कारों को प्रतिप्रसव यानी प्रतिलोम-परिणाम के द्वारा (अर्थात् चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन द्वारा) नाश करना पड़ता है।

**व्याख्या—**ध्यान के द्वारा जब चित्तवृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं, तब जो बच रहता है, उसे सूक्ष्म संस्कार या वासना कहते हैं। उसको नष्ट करने का उपाय क्या है? उसे प्रतिप्रसव अर्थात् प्रतिलोम-परिणाम के द्वारा नष्ट करना पड़ता है। प्रतिलोम-परिणाम का अर्थ है—कार्य का कारण में लय। चित्तरूप कार्य जब समाधि के द्वारा अस्मितारूप अपने कारण में लीन हो जाता है, तभी चित्त के साथ ये सब संस्कार भी नष्ट हो जाते हैं।

ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ॥११॥

**सूत्रार्थ—**ध्यान के द्वारा उनकी (स्थूल) वृत्तियाँ नष्ट करनी पड़ती हैं।

**व्याख्या—**ध्यान ही इन बड़ी तरंगों की उत्पत्ति को रोकने का एक प्रधान उपाय है। ध्यान के द्वारा मन की ये वृत्तिरूप-

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लहरे दब जाती हैं। यदि तुम दिन-पर-दिन, मास-पर-मास, वर्ष-पर-वर्ष, इस ध्यान का अभ्यास करो—जब तक वह तुम्हारे स्वभाव मे न भिद जाय, जब तक तुम्हारे इच्छा न करने पर भी वह ध्यान आप-से-आप न आने लगे—तो क्रोध, घृणा आदि वृत्तियाँ संयत हो जायेंगी।

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥१२॥

सूत्रार्थ—कर्मसंस्कारो के समुदाय की जड़ ये सब पूर्वोक्त क्लेश ही हैं; वर्तमान या भविष्य में होने वाले जीवन में वे फल प्रसव करते हैं।

व्याख्या—कर्माशय का अर्थ है इन सस्कारो की समष्टि। हम जो भी कार्य करते है, वह मानस-सरोवर मे एक लहर उठा देता है। हम सोचते है कि इस काम के समाप्त होते ही वह लहर भी चली जायगी, पर वास्तव में वैसा नही होता। वह तो बस सूक्ष्म आकार भर धारण कर लेती है, पर रहती वही है। जब हम उस कार्य को स्मरण मे लाने का प्रयत्न करते है, त्योही वह फिर से उठ आती है और लहर-रूप धारण कर लेती है। इससे यह स्पष्ट है कि वह मन के ही भीतर छिपी हुई थी, यदि ऐसा न होता, तो स्मृति ही सम्भव न होती। अतएव हर एक काम, हर एक विचार, वह चाहे शुभ हो चाहे अशुभ, मन के सबसे गहरे प्रदेश में जाकर सूक्ष्मभाव धारण कर लेता है और वही सचित रहता है। सुखकर या दुखकर सभी प्रकार के विचार को क्लेश कहते है, क्योकि योगियो के मतानुसार दोनो से ही अन्त में दुःख उत्पन्न होता है। इन्द्रियो से जो सब सुख मिलते हैं, वे अन्त में दुःख ही लाते है, क्योकि भोग से और अधिक भोग की तृष्णा होती है और इसका अनिवार्य फल होता है—दुःख। मनुष्य की वासना का कोई अन्त नही, वह लगातार वासना-पर-

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वासना रखता जाता है और जब ऐसी अवस्था में पहुँचता है, जहाँ उसकी वासना पूर्ण नहीं होती, तो फल होता है—दुःख। इसीलिए योगीगण शुभ-अशुभ समस्त संस्कारों की समष्टि को क्लेश कहते हैं, वे सब आत्मा की मुक्ति में बाधक होते हैं।

हमारे सारे कार्यों के सूक्ष्म मूलस्वरूप संस्कारों के बारे में भी ऐसा ही समझना चाहिए। वे कारणस्वरूप होकर इहजीवन अथवा परजीवन में फल प्रसव करते हैं। विशेष स्थलों में ये संस्कार, विशेष प्रबल रहने के कारण, बहुत शीघ्र अपना फल दे देते हैं, अत्युत्कट पुण्य या पाप कर्म इहजीवन में ही अपना फल सामने ला देता है। योगीगण कहते हैं कि जो मनुष्य इहजीवन में ही अत्यन्त प्रबल शुभ संस्कार उपार्जन कर सकते हैं, उन्हें मृत्यु तक वाट जोहने की आवश्यकता नहीं होती, वे तो इसी जीवन में अपने शरीर को देव-शरीर में परिणत कर सकते हैं। योगियों के ग्रन्थों में इस प्रकार के कई दृष्टान्तों का उल्लेख मिलता है। ये व्यक्ति अपने शरीर के उपादान तक को बदल डालते हैं। ये लोग अपने शरीर के परमाणुओं को ऐसे नए ढंग से ठीक कर लेते हैं कि उनको फिर और कोई बीमारी नहीं होती, और हम लोग जिसे मृत्यु कहते हैं, वह भी उनके पास नहीं फटक सकती। ऐसी घटना न होने का तो कोई कारण नहीं है। शरीरविधानशास्त्र खाद्य का अर्थ बतलाते हैं—सूर्य से शक्ति-ग्रहण। वह शक्ति पहले वनस्पति में प्रवेश करती है, उस वनस्पति को कोई पशु खा लेता है, फिर उस पशु को कोई मनुष्य। इसे वैज्ञानिक भाषा में व्यक्त करना हो, तो कहना पड़ेगा कि हमने सूर्य से कुछ शक्ति ग्रहण करके उसे अपने अंगीभूत कर लिया। यदि यही बात हो, तो इस शक्ति

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को अपने अन्दर लेने के लिए केवल एक ही तरीका क्यो रहना चाहिए ? पौधे हमारी तरह शक्तिग्रहण नही करते; और हम जिस प्रकार शक्ति सग्रह करते हैं, धरती उस प्रकार नही करती। पर तो भी सभी किसी-न-किसी प्रकार से शक्तिसग्रह करते ही हैं। योगियो का कहना है कि वे केवल मन की शक्ति के द्वारा शक्तिसग्रह कर सकते हैं। वे कहते हैं कि हम बिना किसी साधारण उपाय का अवलम्बन किए ही यथेच्छ शक्ति भीतर ले सकते हैं। जैसे एक मकडी अपने ही उपादान से जाला बनाकर उसमे बद्ध हो जाती है और जाले के तन्तुओ का सहारा लिए बिना कही नही जा सकती, उसी प्रकार हमने भी अपने ही उपादान से इस स्नायु-जाल की सृष्टि की है और अब उस स्नायु-प्रणाली का बिना अवलम्बन किए कोई काम ही नही कर सकते। योगी कहते है, हम क्यो उसमे बद्ध हो ?

इस तत्व को और एक उदाहरण देकर समझाया जा सकता है। हम पृथ्वी के किसी भी भाग में विद्युत्-शक्ति भेज सकते हैं, पर उसके लिए हमे तार की जरूरत पड़ती है। किन्तु प्रकृति तो बिना तार के ही बडे परिमाण मे यह शक्ति भेजती रहती है। हम भी वैसा क्यों न कर सकेगे ? हम चारो ओर मानस-विद्युत् भेज सकते हैं। हम जिसे मन कहते हैं, वह बहुत कुछ विद्युत्-शक्ति के ही सदृश है। स्नायु के बीच मे जो एक तरल पदार्थ प्रवाहित होता है, उसमे बडे परिमाण मे विद्युत्-शक्ति है, इसमें कोई सन्देह नही, क्योकि विद्युत् के समान उसके भी दोनो ओर विपरीत शक्तिद्वय दिखाई पडती है, तथा विद्युत् के अन्यान्य सब धर्म उसनें भी देखे जाते है। इस विद्युत्-शक्ति को अभी हम केवल स्नायुओ में से ही प्रवाहित कर सकते

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है। पर बात यह है कि स्नायुओ की सहायता लिए बिना ही हम इसे क्यो नही प्रवाहित कर सकेगे ? योगी कहते है, हाँ, यह पूरी तरह से सम्भव है, और सम्भव ही नही, वरन् इसे कार्य में भी परिणत किया जा सकता है। और जब तुम इसमे कृत-कार्य हो जाओगे, तब सारे ससार भर मे अपनी इस शक्ति को परिचालित करने मे समर्थ हो जाओगे । तब तुम किसी स्नायु-यन्त्र की सहायता लिए बिना ही किसी भी स्थान मे, किसी भी शरीर द्वारा कार्य कर सकोगे । जब तक आत्मा इस स्नायु-यन्त्ररूप प्रणाली के भीतर से काम करती रहती है, हम कहते है, कि मनुष्य जीवित है, ओर जब इन यन्त्रो का कार्य बन्द हो जाता है, तो कहते है कि मनुष्य मर गया । पर जब मनुष्य इस प्रकार के स्नायु-यन्त्र की सहायता से, या बिना उसकी सहायता के भी, कार्य करने मे समर्थ हो जाता है, तब उसके लिए जन्म और मृत्यु का कोई अर्थ नही रह जाता । ससार मे जितने शरीर है, वे सब-के-सब तन्मात्रायो से बने हुए हैं, उनमें भेद है केवल तन्मात्राओ के विन्यास की प्रणाली मे । यदि तुम्ही उस विन्यास के कर्ता हो, तो तुम इच्छानुसार शरीर की रचना कर सकते हो । यह शरीर तुम्हारे सिवाय और किसने बनाया है ? अन्न कौन खाता है ? यदि कोई और तुम्हारे लिए भोजन करता रहे, तो तुम कोई अधिक दिन जीवित न रहोगे । उस अन्न से रुधिर भी कौन तैयार करता है ? अवश्य तुम्ही । उस रुधिर को शुद्ध करके कौन धमनियो में प्रवाहित करता है ? तुम्ही । हम शरीर के मालिक हैं और उसमे वास करते हैं। उसका किस प्रकार पुनर्गठन किया जाय, बस इसी ज्ञान को हम खो बैठे हैं। हम यन्त्र के समान अवनतस्वभाव हो गए है। हम शरीर के परमाणुओ को.

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त्रिविन्यासप्रणाली भूल गए हैं। अतः आज हम जिसे यन्त्रवत् किए जा रहे हैं, उसी को अब जान-बूझकर करना होगा। हम ही तो मालिक हैं—कर्ता हैं, अतः हमी को इस विन्यासप्रणाली को नियमित करना होगा। और जब हम इसमें कृतकार्य हो जायेंगे, तब अपनी इच्छानुसार शरीर का पुनर्गठन कर लेंगे, और तब हमारे लिए जन्म, मृत्यु, आधि-व्याधि कुछ भी न रह जायगा।

सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥१३॥

सूत्रार्थ—(मन में इस संस्काररूप) मूल के विद्यमान रहने तक उसका फलभोग (मनुष्य आदि विभिन्न) जाति, (भिन्न-भिन्न) आयु और सुख-दुःख के भोग (के रूप में) होता रहता है।

**व्याख्या—**संस्काररूप जड़ अर्थात् कारण भीतर में विद्यमान रहने के कारण वे ही व्यक्तभाव धारण कर फल के रूप में परिणत होते हैं। कारण का नाश होकर कार्य अर्थात् फल का उदय होता है, फिर कार्य सूक्ष्मभाव धारण कर बाद के कार्य का कारणस्वरूप होता है। वृक्ष बीज को उत्पन्न करता है, बीज फिर बाद के वृक्ष की उत्पत्ति का कारण होता है। हम इस समय जो कुछ कर्म कर रहे हैं, वे समस्त पूर्वसंस्कार के फल-स्वरूप हैं। ये ही कर्म फिर संस्कार के रूप में परिणत होकर भावी कार्य का कारण हो जायेंगे। बस इसी प्रकार कार्य-कारण-प्रवाह चलता रहता है। इसीलिए यह सूत्र कहता है कि कारण विद्यमान रहने से उसका फल या कार्य अवश्यमेव होगा। यह फल पहले जाति के रूप में प्रकाशित होता है—कोई लोग मनुष्य होंगे, तो कोई देवता, कोई पशु, तो कोई असुर। फिर, यह कर्म आयु को भी नियमित करता है। एक मनुष्य पचास वर्ष जीवित रहता है, तो दूसरा सौ वर्ष, और कोई दो वर्ष के बाद

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ही चल बसता है। यह जो आयु की विभिन्नता है, वह पूर्वकर्म द्वारा ही नियमित होती है। फिर इसी प्रकार, किसी को देखने पर प्रतीत होता है कि मानो सुख-भोग के लिए ही उसका जन्म हुआ है—यदि वह वन में भी चला जाय, तो वहां भी सुख मानो उसके पीछे-पीछे जाता है। और कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा होता है कि उसके पीछे दुःख मानो छाया के समान लगा रहता है। यह सब उनके अपने-अपने पूर्वकर्म का फल है। योगियों के मतानुसार पुण्यकर्म सुख लाते हैं और पापकर्म दुःख। जो मनुष्य कुकर्म करता है, वह क्लेश के रूप में अपने किए का फल अवश्य भोगता है।

ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥१४॥

सूत्रार्थ—वे (जाति, आयु और भोग) हर्ष और शोकरूप फल के देनेवाले होते हैं, क्योंकि उनके कारण हैं पुण्य और पाप कर्म।

परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥१५॥

सूत्रार्थ—परिणाम-काल में परिणाम (नतीजा) रूप जो दुःख है, भोग-काल में भोग में विघ्न होने की आशंकारूप जो दुःख है, अथवा सुख के संस्कार से उत्पन्न होनेवाला तृष्णारूप जो दुःख है—उस सबका जन्मदाता होने के कारण, तथा गुणवृत्तियों में अर्थात् सत्त्व, रज और तम में परस्पर विरोध होने के कारण विवेकी पुरुष के लिए सब-का-सब दुःखरूप ही है।

व्याख्या—योगीगण कहते हैं कि जिनमें विवेकशक्ति है, जिनमें थोड़ीसी भी अन्तर्दृष्टि है, वे सुख और दुःख नामवाली सर्वविध वस्तुओं के अन्तस्तल तक को देख लेते हैं और जान लेते हैं कि ये सुख और दुःख आपस में मानो गुंथे हुए हैं, एक ही

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दूसरे मे परिणत हो जाता है और इनसे संसार मे कोई भी अछूता नही रहता—ये सबके पास आते हैं। वे विवेकी पुरुष देखते है कि मनुष्य सारा जीवन मृगजल के पीछे दौड़ता रहता है और कभी अपनी वासनाओ को पूर्ण नही कर पाता। एक समय महाराज युधिष्ठिर ने कहा था, 'जीवन मे सबसे आश्चर्य-जनक घटना तो यह है कि हम प्रतिक्षण प्राणियो को कालकवलित होते देखते हैं, फिर भी सोचते है कि हम कभी नही मरेंगे।' चारो ओर मूर्खो से घिरे रहकर हम सोचते है कि हमी एकमात्र पण्डित है। चारो ओर सब प्रकार की चचलता के दृष्टान्तो से घिरे रहकर हम सोचते है कि हमारा प्यार ही एकमात्र स्थायी प्यार है। यह कैसे हो सकता है ? प्यार भी स्वार्थपरता से भरा है। योगी कहते हैं, 'अन्त में हम देखेंगे कि दोस्तो का प्रेम, सन्तान का प्रेम, यहाँ तक कि पति-पत्नी का प्रेम भी धीरे-धीरे क्षीण होकर नाश को प्राप्त हो जाता है।' नाश ही इस ससार का धर्म है—वह किसी भी वस्तु को अछूता नही रखता। जब मनुष्य ससार की समस्त वासनाओ मे, यहाँ तक कि प्यार में भी निराश हो जाता है, तभी मानो आश्चर्यचकित के समान वह समझ पाता है कि यह ससार भी कैसा भ्रम है, कैसा स्वप्न के समान है। तभी वैराग्य की एक किरण उसके हृदय मे फैलती है, तभी वह जगदातीत सत्ता की मानो थोड़ीसी झलक पाता है। इस ससार को छोडने पर ही पारलौकिक तत्त्व हृदय मे उद्भासित होता है, इस ससार के सुख में आसक्त रहते तक यह कभी सम्भव नही होता। ऐसे कोई महात्मा नही हुए, जिन्हे यह उच्चावस्था प्राप्त करने के लिए इन्द्रिय-सुख-भोग त्यागना न पड़ा हो। दुःख का कारण है—प्रकृति की विभिन्न शक्तियो का

> द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥१७॥

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आपस में विरोध। प्रत्येक अपनी-अपनी ओर खींचती है, और इस प्रकार स्थायी सुख असम्भव हो जाता है।

हेयं दुःखमनागतम् ॥१६॥

सूत्रार्थ— जो दुःख अभी तक नहीं आया, उसका त्याग करना चाहिए।

व्याख्या— कर्म का कुछ अंश हम पहले ही भोग चुके हैं, कुछ अंश हम वर्तमान में भोग रहे हैं, और शेष अंश भविष्य में फल प्रदान करेगा। हमने जिसका भोग कर लिया है, वह तो अब समाप्त हो चुका। हम वर्तमान में जिसका भोग कर रहे हैं, उसका भोग तो हमें करना ही पड़ेगा, केवल जो कर्म भविष्य में फल देने के लिए बच रहा है, उसी पर हम जय प्राप्त कर सकते हैं अर्थात् उसका नाश कर सकते हैं। इसीलिए हमें अपनी पूरी शक्ति उस कर्म के नाश के लिए प्रयुक्त कर देनी चाहिए, जिसने अभी तक कोई फल पैदा नहीं किया है।

द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥१७॥

सूत्रार्थ— यह जो हेय है, अर्थात् जिस दुःख का त्याग करना होगा, उसका कारण है द्रष्टा और दृश्य का संयोग।

व्याख्या— इस द्रष्टा का अर्थ क्या है?—मनुष्य की आत्मा—पुरुष। दृश्य क्या है?—मन से लेकर स्थूल भूत तक सारी प्रकृति। इस पुरुष और मन के संयोग से ही समस्त सुख-दुःख उत्पन्न हुए हैं। तुम्हें याद होगा, इस योगदर्शन के मतानुसार पुरुष शुद्धस्वरूप है, ज्योंही वह प्रकृति के साथ संयुक्त होता है और प्रकृति में प्रतिबिम्बित होता है, त्योंही वह सुख अथवा दुःख का अनुभव करता हुआ प्रतीत होता है।

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥१८॥

सूत्रार्थ— प्रकाश, क्रिया और स्थिति जिसका स्वभाव है, भूत और

पातंजल-योगसूत्र-२ २०१

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पातंजल-योगसूत्र-२ २०१

इन्द्रियां जिसका (प्रकट) स्वरूप है, (पुरुष के) भोग और मुक्ति के लिए ही जिसका प्रयोजन है, वह दृश्य है।

व्याख्या—दृश्य अर्थात् प्रकृति भूतो और इन्द्रियों की समष्टि है; भूत कहने से स्थूल, सूक्ष्म सब प्रकार के भूतो का बोध होता है, और इन्द्रिय से आँख आदि समस्त इन्द्रियाँ तथा मन आदि का भी बोध होता है। उनके धर्म तीन प्रकार के हैं; जैसे—प्रकाश, कार्य और स्थिति यानी जड़त्व, इन्ही को दूसरे शब्दो मे सत्त्व, रज और तम कहते है। समग्र प्रकृति का उद्देश्य क्या है? यही कि पुरुष समुदाय भोग करके विशेषज्ञ हो जाय। पुरुष मानो अपने महान् ईश्वरीय भाव को भूल गया है। इस सम्बन्ध में एक बड़ी सुन्दर कहानी है—

किसी समय देवराज इन्द्र शूकर बनकर कीचड मे रहते थे, उनके एक शूकरी थी—उस शूकरी से उनके बहुतसे बच्चे पैदा हुए थे। वे बडे सुख से समय बिताते थे। कुछ देवता उनकी यह दुरावस्था देखकर उनके पास आकर बोले, "आप देवराज है, समस्त देवगण आपके शासन के अधीन है। फिर आप यहाँ क्यों हैं?" परन्तु इन्द्र ने उत्तर दिया, "मै बडे मजे मे हूँ। मुझे स्वर्ग की परवाह नही, यह शूकरी और ये बच्चे जब तक हैं, तब तक स्वर्ग आदि कुछ भी नही चाहिए।" देवगण यह सुनकर तो किंकर्तव्य-विमूढ हो गए—उन्हे कुछ सूझ न पडा। कुछ दिनो बाद उन्होने मन-ही-मन एक सकल्प किया कि वे एक-के-बाद-एक सब बच्चो को मार डालेगे। एक दिन उन्होने आकर एक बच्चे को मार डाला, फिर दूसरे को, और इस प्रकार सभी बच्चे मार डाले गए। अन्त में देवगणो ने उस शूकरी को भी मार डाला। जब इन्द्र का सारा परिवार इस प्रकार नष्ट हो गया, तो इन्द्र कातर होकर विलाप

२०२ राजयोग

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करने लगे। तब देवताओ ने इन्द्र की शूकर-देह को भी चीर डाला। तब तो इन्द्र उस शूकर-देह से बाहर होकर हँसने लगे और सोचने लगे, 'मे भी कैसा भयकर स्वप्न देख रहा था। कहाँ मे देवराज, और कहाँ इस शूकर-जन्म को ही एकमात्र जन्म समझ बैठा था, यही नही, वरन् सारा ससार शूकर-देह धारण करे, ऐसी कामना कर रहा था।' पुरुष भी बस इसी प्रकार प्रकृति के साथ मिलकर भूल जाता है कि वह शुद्धस्वभाव और अनन्तस्वरूप है। पुरुष को अस्तित्वशाली नही कहा जा सकता, क्योकि वह स्वय अस्तित्वस्वरूप है। आत्मा को ज्ञानसम्पन्न नही कहा जा सकता, क्योकि आत्मा स्वय ज्ञानस्वरूप है। उसे प्रेम-सम्पन्न नही कहा जा सकता, क्योकि वह स्वय प्रेमस्वरूप है। आत्मा को अस्तित्वशाली, ज्ञानयुक्त अथवा प्रेममय कहना सर्वथा भूल है। प्रेम, ज्ञान और अस्तित्व पुरुष के गुण नही, वे तो उसका स्वरूप हैं। जब वे किसी वस्तु मे प्रतिबिम्बित होते हैं, तब चाहो तो उन्हे उस वस्तु के गुण कह सकते हो। किन्तु वे पुरुष के गुण नही हैं, वे तो उस महान् आत्मा, उस अनन्त पुरुष का स्वरूप हैं, जिसका न जन्म है, न मृत्यु और जो अपनी महिमा में विराजमान है। किन्तु वह यहाँ तक स्वरूपभ्रष्ट हो गया है कि यदि तुम उसके पास जाकर कहो कि तुम शूकर नही हो, तो वह चिल्लाने लगता है और काटने दौडता है।

इस माया के बीच, इस स्वप्नमय जगत् के बीच हमारी भी ठीक वही दशा हो गई है। यहाँ है केवल रोना, केवल दुख,- केवल हाहाकार। अजीब तमाशा है यहाँ का। यहाँ सोने के कुछ गोले लुढका दिए जाते है और बस सारा ससार उनके लिए पागलो के समान छूट पडता है। तुम कभी भी किसी नियम के

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पातंजल-योगसूत्र-२ २०३

बद्ध नहीं थे। प्रकृति का बन्धन तुम पर किसी काल मे नहीं है। योगी तुम्हे यही शिक्षा देते है, धैर्यपूर्वक इसको सीखो। योगी यह समझने देते हैं कि पुरुष किस प्रकार इस प्रकृति के साथ अपने को मिलाकर--अपने को मन और जगत् के साथ एकरूप करके अपने आप को दुःखी समझने लगता है। योगी यह भी कहते है कि इस दुखमय संसार से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय है--प्रकृति के सारे सुख-दु ख भोगकर अभिज्ञता प्राप्त कर लेना। भोग अवश्यम्भावी है, वह तो करना ही होगा, अतएव जितनी जल्दी वह कर लिया जाय, उतना ही मगल है। हमने अपने आपको इस जाल. मे फँसा लिया है, हमे इसके बाहर आना होगा। हम स्वय-इस फन्दे मे फँस गए हैं, और अब अपने ही प्रयत्न से उससे मुक्ति प्राप्त करनी पडेगी। अतएव, पति-पत्नी सम्बन्धी, मित्र सम्बन्धी तथा और भी जो सब छोटी-छोटी प्रेम की आकाक्षाएँ है, सभी को भोग कर डालो। यदि अपना स्वरूप तुम्हे सदा याद रहे, तो तुम शीघ्र ही निर्विघ्न इसके पार हो जाओगे। यह कभी न भूलना कि यह अवस्था बिलकुल अल्प समय के लिए है और हमे इसके भीतर से बाध्य होकर जाना पड रहा है। भोग--सुख--दुःख का यह अनुभव ही--हमारा एकमात्र महान् शिक्षक है, लेकिन स्मरण रहे, ये सब भोग मार्ग की केवल सामयिक घटनाएँ मात्र हैं, वे क्रमश हमें एक ऐसी अवस्था मे ले जाते है, जहाँ ससार की समस्त वस्तुएँ बिलकुल तुच्छ हो जाती हैं। तब पुरुष विश्वव्यापी विराट् के रूप मे प्रकाशित हो जाती है और तब यह सारा विश्व सिन्धु मे एक बिन्दु-सा प्रतीत होने लगता है और अपनी ही इस क्षुद्रता के कारण--इस शून्यता के कारण न जाने कहाँ विलीन हो जाता है। सुख-दुःख का भोग तो

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२०४ राजयोग

हमें करना ही पड़ेगा, पर स्मरण रहे, हम अपना चरम लक्ष्य कभी न भूलें।

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥१९॥

सूत्रार्थ—विशेष (भूतेन्द्रिय), अविशेष (तन्मात्र अस्मिता), केवल चिह्नमात्र (महत्) और चिह्नशून्य (प्रकृति)—ये चार (सत्त्वादि) गुणों की अवस्थाएँ हैं।

व्याख्या—यह पहले कहा जा चुका है कि योगशास्त्र सांख्यदर्शन पर स्थापित है; यहाँ पर फिर से सांख्यदर्शन का जगत्-सृष्टिप्रकरण स्मरण कर लेना आवश्यक है। सांख्यमत से, प्रकृति ही जगत् का निमित्त और उपादान कारण है। यह प्रकृति तीन प्रकार के धातुओं से निर्मित है—सत्त्व, रज और तम। तम पदार्थ केवल अन्धकारस्वरूप है, जो कुछ अज्ञानात्मक और भारी है, सभी तमोमय है। रज क्रियाशक्ति है। और सत्त्व स्थिर एव प्रकाशस्वभाव है। सृष्टि के पूर्व प्रकृति जिस अवस्था में रहती है, उसे सांख्यमतावलम्बी दार्शनिकगण अव्यक्त, अविशेष या अविभक्त कहते हैं, इसका तात्पर्य यह कि इस अवस्था में नाम-रूप का कोई भेद नहीं रहता, इस अवस्था में ये तीनों पदार्थ पूर्ण साम्यभाव से रहते हैं। उसके बाद जब यह साम्यावस्था नष्ट होकर वैषम्यावस्था आती है, तब ये तीनों पदार्थ अलग-अलग रूप से परस्पर मिश्रित होते रहते हैं और उनका फल है यह जगत्। प्रत्येक मनुष्य में भी ये तीन पदार्थ विद्यमान हैं। जब सत्त्व प्रबल होता है, तब ज्ञान का उदय होता है, रज प्रबल होने पर क्रिया की वृद्धि होती है, और तम प्रबल होने पर अन्धकार, आलस्य और अज्ञान आते हैं। सांख्यमत के अनुसार, त्रिगुणमयी प्रकृति का सर्वोच्च प्रकाश है महत् या बुद्धि-

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तत्त्व—उसे सर्वव्यापी या सार्वजनीन बुद्धितत्त्व कहते हैं। प्रत्येक मानव-बुद्धि इस सर्वव्यापी बुद्धितत्त्व का एक अंश-मात्र है। सांख्य-मनोविज्ञान के मत से, मन और बुद्धि में विशेष भेद है। मन का काम है केवल विषय के आघात से उत्पन्न संवेदनाओं को भीतर ले जाकर एकत्रित करना और उन्हें बुद्धि अर्थात् व्यष्टि या व्यक्तिगत महत् के सामने रख देना। बुद्धि उन सब विषयों का निश्चय करती है। महत् से अहंतत्त्व और महत्तत्त्व से सूक्ष्म भूतों की उत्पत्ति होती है। ये सूक्ष्म भूत फिर परस्पर मिलकर इन बाहरी स्थूल भूतों में परिणत होते हैं; उसी से इस स्थूल जगत् की उत्पत्ति होती है। सांख्यदर्शन का मत है कि बुद्धि से लेकर पत्थर के एक टुकड़े तक सभी एक ही पदार्थ से उत्पन्न हुए हैं, उनमें जो भेद है, वह केवल उनकी सूक्ष्मता और स्थूलता में ही है। सूक्ष्म कारण है और स्थूल कार्य। सांख्यदर्शन के मतानुसार, पुरुष समग्र प्रकृति के बाहर है, वह जड़ नहीं है। पुरुष बुद्धि, मन, तन्मात्रा या स्थूल भूत इनमें से किसी के भी समान नहीं है। वह सर्वथा अलग है, उसका स्वभाव सम्पूर्णत भिन्न है। इससे वे यह सिद्धान्त स्थिर करते हैं कि पुरुष अवश्य मृत्युरहित, अजर और अमर होना चाहिए, क्योंकि वह किसी प्रकार के मिश्रण से उत्पन्न नहीं हुआ है। और जो किसी मिश्रण से उत्पन्न नहीं हुआ है, उसका कभी नाश भी नहीं हो सकता। इन पुरुषों या आत्माओं की संख्या अनगिनती है।

अब हम इस सूत्र का तात्पर्य समझ सकेंगे। 'विशेष' शब्द स्थूल भूतों को लक्ष्य करता है—जिनकी हम इन्द्रियों से उपलब्धि कर सकते हैं। 'अविशेष' का अर्थ है सूक्ष्म भूत—

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२०६राजयोग

तन्मात्रा, इन तन्मात्राओ की उपलब्धि साधारण मनुष्य नही कर सकते। किन्तु पतञ्जलि कहते है, ‘यदि तुम योग का अभ्यास करो, तो कुछ दिनो वाद तुम्हारी अनुभव-शक्ति इतनी सूक्ष्म हो जायगी कि तुम सचमुच तन्मात्राओ को भी देख सकोगे।’ तुम लोगो ने सुना होगा कि हर एक मनुष्य की अपनी एक प्रकार की ज्योति होती है, प्रत्येक प्राणी के भीतर से हमेशा एक प्रकार का प्रकाश बाहर निकलता रहता है। पतञ्जलि कहते है, योगी ही उसे देखने मे समर्थ होते है। हममे से सभी उसे नही देख पाते, फिर भी जिस प्रकार फूल में से सदैव फूल की सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमाणुस्वरूप तन्मात्राएँ बाहर निकलती रहती हैं, जिसके द्वारा हम उसकी गन्ध ले सकते है, उसी प्रकार हमारे शरीर से भी ये तन्मात्राएँ सतत निकल रही है। प्रति दिन हमारे शरीर से शुभ या अशुभ किसी-न-किसी प्रकार की शक्तिराशि बाहर निकलती रहती है। अतएव हम जहाँ भी जायेंगे, वही आकाश इन तन्मात्राओ से पूर्ण होकर रहेगा। इसका असल रहस्य न जानते हुए भी, इसी से मनुष्य के मन में अनजाने मन्दिर, गिर्जा आदि बनाने का भाव आया है। भगवान को भजने के लिए मन्दिर बनाने की क्या आवश्यकता थी ? क्यो, कही भी तो ईश्वर की उपासना की जा सकती थी। फिर यह सब मन्दिर आदि क्यो, इसका कारण यह है कि स्वय इस रहस्य को न जानने पर भी, मनुष्य के मन में स्वाभाविक रूप से ऐसा उठा था कि जहाँ पर लोग ईश्वर की उपासना करते है, वह स्थान पवित्र तन्मात्राओ से परिपूर्ण हो जाता है। लोग प्रति दिन वहाँ जाया करते है, और मनुष्य जितना ही वहाँ आते-जाते हैं, उतना ही वे पवित्र होते जाते हैं और साथ ही वह स्थान

पातंजल-योगसूत्र—२ २०७

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पातंजल-योगसूत्र—२ २०७

भी अधिकाधिक पवित्र होता जाता है। यदि किसी मनुष्य के मन में उतना सत्त्वगुण नहीं है, और यदि वह भी वहाँ जाय, तो वह स्थान उस पर भी अपना असर डालेगा और उसके अन्दर सत्त्वगुण का उद्रेक कर देगा। अब हम समझ सकेंगे कि मन्दिर और तीर्थ आदि इतने पवित्र क्यों माने जाते हैं। पर यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि साधु व्यक्तियों के समागम के ऊपर ही उस स्थान की पवित्रता निर्भर रहती है। किन्तु सारी गड़बड़ी तो यही है कि मनुष्य उसका मूल उद्देश्य भूल जाता है—और भूलकर गाड़ी को बल के आगे जोतना चाहता है। पहले मनुष्य ही उस स्थान को पवित्र बनाते हैं, उसके बाद उस स्थान की पवित्रता स्वयं कारण बन जाती है और मनुष्यों को पवित्र बनाती रहती है। यदि उस स्थान में सदा असाधु व्यक्तियों का ही आवागमन रहे, तो वह स्थान अन्य स्थानों के समान ही अपवित्र बन जायगा। इमारत के गुण से नहीं वरन् मनुष्य के गुण से ही मन्दिर पवित्र माना जाता है, पर इसी को हम सदा भूल जाते हैं। इसीलिए प्रवल सत्त्वगुण-सम्पन्न साधु और महात्मागण चारों ओर यह सत्त्वगुण बिखेरते हुए अपने चारों ओर स्थित मनुष्यों पर महान् प्रभाव डाल सकते हैं। मनुष्य यहाँ तक पवित्र हो सकता है कि उसकी वह पवित्रता मानो बिलकुल प्रत्यक्ष देखी जा सकती है—वह देह को भेदकर बाहर आने लगती है। साधु का शरीर पवित्र हो जाता है, अत वह देह जहाँ विचरण करती है, वहाँ पवित्रता बिखेरती रहती है। यह कवित्व की भाषा नहीं है, रूपक नहीं है, सचमुच वह पवित्रता मानो इन्द्रियगोचर एक बाह्य वस्तु के समान प्रतीत होती है। इसका एक यथार्थ अस्तित्व है—एक यथार्थ सत्ता है

२०८ राजयोग

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२०८ राजयोग

जो कोई व्यक्ति उस साधु पुरुष के संस्पर्श में आता है, वही पवित्र हो जाता है।

अब देखें, 'लिंगमात्र' का अर्थ क्या है। लिंगमात्र कहने से बुद्धि (महत्तत्त्व) का बोध होता है, वह प्रकृति की पहली अभिव्यक्ति है, उसी से दूसरी सब वस्तुएँ अभिव्यक्त हुई हैं। गुणों की अन्तिम अवस्था का नाम है 'अलिंग' या चिह्नशून्य। यही पर आधुनिक विज्ञान और समस्त धर्मों में एक भारी झगडा देखा जाता है। प्रत्येक धर्म में यह एक साधारण सत्य देखने में आता है कि यह जगत् चैतन्यशक्ति से उत्पन्न हुआ है। ईश्वर हमारे समान कोई व्यक्तिविशेष है या नहीं, यह विचार छोडकर केवल मनोविज्ञान की दृष्टि से ईश्वरवाद का तात्पर्य यह है कि चैतन्य ही सृष्टि की आदिवस्तु है, उसी से स्थूल भूत का प्रकाश हुआ है। किन्तु आधुनिक दार्शनिकगण कहते हैं कि चैतन्य सृष्टि की आखिरी वस्तु है। अर्थात् उनका मत यह है कि अचेतन जड वस्तुएँ धीरे-धीरे प्राणी के रूप में परिणत हुई हैं, ये प्राणी क्रमश उन्नत होते-होते मनुष्य-रूप धारण करते हैं। वे कहते हैं, यह बात नहीं है कि जगत् की सब वस्तुएँ चैतन्य से प्रसूत हुईं हैं, वरन् चैतन्य ही सृष्टि की आखिरी वस्तु है। यद्यपि धर्मों एव विज्ञान के सिद्धान्त इस प्रकार आपस में ऊपर से विरुद्ध प्रतीत होते हैं, तथापि इन दोनों सिद्धान्तों को ही सत्य कहा जा सकता है। एक अनन्त श्रृंखला या श्रेणी लो, जैसे—क-ख-क-ख-क-ख आदि, अब प्रश्न यह है कि इसमें क पहले है या ख? यदि तुम इस श्रृंखला को क-ख क्रम से लो, तो 'क' को प्रथम कहना पडेगा, पर यदि तुम उसे ख-क से शुरू करो, तो 'ख' को आदि मानना होगा। अत. हम उसे जिस दृष्टि से देखेंगे, वह उसी प्रकार

पातजल-योगसूत्र-२ २०९

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पातजल-योगसूत्र-२ २०९

प्रतीत होगा। चैतन्य अनुलोम-परिणाम को प्राप्त होकर स्थूल भूत का आकार धारण करता है, स्थूल भूत फिर विलोम-परिणाम से चैतन्यरूप मे परिणत होता है, और इस प्रकार क्रम चलता रहता है। सांख्य और अन्य सब धर्मों के आचार्यगण भी चैतन्य को ही प्रथम स्थान देते है। उससे वह श्रृंखला इस प्रकार का रूप धारण करती है कि पहले चैतन्य, और पीछे भूत। वैज्ञानिक भूत को पहले लेकर कहते हैं कि पहले भूत, और पीछे चैतन्य। पर ये दोनो ही उसी एक श्रृंखला की बात कहते है। किन्तु भारतीय दर्शन इस चैतन्य और भूत दोनो के परे जाकर उस पुरुष या आत्मा का साक्षात्कार करता है, जो ज्ञान के भी अतीत है। यह ज्ञान तो मानो उस ज्ञानस्वरूप आत्मा के पास से प्राप्त आलोक के समान है।

द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥२०॥

सूत्रार्थ—द्रष्टा केवल चैतन्यमात्र है; यद्यपि वह स्वयं पवित्र-स्वरूप है, तो भी वह बुद्धि के भीतर से देखा करता है।

व्याख्या—यहाँ पर भी सांख्यदर्शन की बात कही जा रही है। हमने पहले देखा है, सांख्यदर्शन का यह मत है कि अत्यन्त क्षुद्र पदार्थ से लेकर बुद्धि तक सभी प्रकृति के अन्तर्गत है, किन्तु पुरुष (आत्माएँ) इस प्रकृति के बाहर हैं, इन पुरुषो के कोई गुण नही है। तब फिर आत्मा क्योकर सुखी या दुःखी होती है? केवल बुद्धि मे प्रतिबिम्बित होकर वह वैसी प्रतीयमान होती है। जैसे स्फटिक के एक टुकडे के पास एक लाल फूल रखने पर वह स्फटिक लाल दिखाई देता है, उसी प्रकार हम जो सुख या दुःख अनुभव कर रहे हैं, वह वास्तव मे प्रतिबिम्ब मात्र है, वस्तुतः आत्मा में यह सब कुछ भी नही है। आत्मा प्रकृति से सम्पूर्णतः

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२१० राजयोग

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२१० राजयोग

पृथक् वस्तु है। प्रकृति एक वस्तु है और आत्मा दूसरी—सम्पूर्ण पृथक् और सर्वदा पृथक्। साङ्ख्याचार्यगण कहते हैं कि ज्ञान एक मिश्र पदार्थ है, उसका ह्रास और वृद्धि दोनो है, वह परिवर्तनशील है, शरीर के समान उसमें भी क्रमश परिणाम होता है, शरीर के जो सब धर्म है, उसके भी प्राय वैसे ही धर्म हैं। नख का शरीर के साथ जैसा सम्बन्ध है, वैसा ही देह का ज्ञान के साथ। नख शरीर का एक अंशविशेष है, उसे सैकडो वार काट डालने पर भी शरीर बचा रहेगा। ठीक इसी प्रकार, यह शरीर सैकडो बार नष्ट होन पर भी ज्ञान युग-युगान्तर तक बचा रहेगा। तो भी यह ज्ञान कभी अविनाशी नही हो सकता, क्योकि वह परिवर्तनशील है, उसका ह्रास है, वृद्धि है। और जो परिवर्तनशील है, वह कभी अविनाशी नही हो सकता। यह ज्ञान एक सृष्ट पदार्थ है, और इसी से यह स्पष्ट है कि इसके ऊपर—इससे श्रेष्ठ एक दूसरा पदार्थ अवश्य है। सृष्ट पदार्थ कभी मुक्तस्वभाव नही हो सकता; भूत के साथ संश्लिष्ट प्रत्येक वस्तु प्रकृति के अन्तर्गत है और इसलिए वह चिरकाल के लिए बद्धभावापन्न है। तो फिर यथार्थ मे मुक्त है कौन? जो कार्य-कारण सम्बध के अतीत है, वही वास्तव में मुक्तस्वभाव है। यदि तुम कहो कि यह मुक्तभाव भ्रमात्मक है, तो मै कहूँगा कि यह बद्धभाव भी भ्रमात्मक है। हमारे ज्ञान मे ये दोनो ही भाव सदैव वर्तमान हैं, वे आपस में एक दूसरे के आश्रित है, एक के न रहने से दूसरा भी नही रह सकता। उनमें से एक भाव यह है कि हम बद्ध हैं। मान लो, हमारी इच्छा हुई कि हम दीवार के बीच में से होकर चले जायें। हम चेष्टा करते हैं और हमारा सिर दीवार से टकरा जाता है, तब हम देख पाते हैं कि हम