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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages
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पातंजल-योगसूत्र-२ २१९

उस दीवार द्वारा सीमाबद्ध है। पर साथ ही हम अपनी एक इच्छाशक्ति भी देखते हैं और सोचते हैं कि इस इच्छाशक्ति को हम जहाँ चाहे लगा सकते हैं। पग-पग मे हम अनुभव करते हैं कि ये विरोधी भावद्वय हमारे सामने आ रहे हैं। हमे विश्वास करना पडता है कि हम मुक्त हैं, पर इधर प्रति मुहूर्त हम यह भी देखते है कि हम मुक्त नही है। इन दोनो मे से यदि एक भाव भ्रमात्मक हो, तो दूसरा भी भ्रमात्मक होगा, और यदि एक सत्य हो, तो दूसरा भी सत्य होगा, क्योकि दोनों ही अनुभवरूप एक ही नीव पर स्थापित है। योगी कहते हैं कि ये दोनो भाव सत्य है। बुद्धि तक लेने से हम सचमुच बद्ध है पर आत्मा की दृष्टि से हम मुक्तस्वभाव हैं। मनुष्य का यथार्थ स्वरूप—आत्मा या पुरुष—कार्य-कारण श्रृंखला के बाहर है। आत्मा का यह मुक्तस्वभाव ही भूत के विभिन्न स्तरों में से—बुद्धि, मन आदि नाना रूपो में से—प्रकाशित हो रहा है। वह इसी की ज्योति है, जो सबो के भीतर से प्रकाशित हो रही है। बुद्धि का अपना कोई चैतन्य नही है। प्रत्येक इन्द्रिय का मस्तिष्क में एक-एक केन्द्र है। समस्त इन्द्रियो का एक ही केन्द्र नही है, वरन् प्रत्येक का केन्द्र अलग-अलग है। तो फिर हमारी ये अनुभूतियाँ कहाँ जाकर एकत्व को प्राप्त होती है? यदि मस्तिष्क मे वे एकत्व को प्राप्त होती, तो आँख, कान, नाक सभी का एक ही केन्द्र रहता, पर हम निश्चित रूप से जानते हैं कि वैसा नही है—प्रत्येक के लिए अलग-अलग केन्द्र है। फिर भी मनुष्य एक ही समय मे देख और सुन सकता है। इसी से प्रतीत होता है कि इस बुद्धि के पीछे अवश्य एक एकत्व होना चाहिए। बुद्धि सदैव मस्तिष्क के साथ सम्बद्ध है, किन्तु

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इस बुद्धि के भी पीछे पुरुष विद्यमान है। वही एकत्वस्वरूप है। उसी के पास जाकर ये सब अनुभूतियाँ एकीभाव को प्राप्त होती हैं। आत्मा ही वह केन्द्र है, जहाँ समस्त भिन्न-भिन्न इन्द्रिय-अनुभूतियाँ जाकर एकीभूत होती है। यह आत्मा मुक्तस्वभाव है और उसका यह मुक्तस्वभाव ही तुम्हे प्रति क्षण कह रहा है कि तुम मुक्त हो। लेकिन भ्रम में पडकर तुम उस मुक्तस्वभाव को प्रति क्षण बुद्धि और मन के साथ मिला दे रहे हो। तुम उस मुक्तस्वभाव को बुद्धि पर आरोपित करते हो और दूसरे ही क्षण देखते हो कि बुद्धि मुक्तस्वभाव नही है। तुम फिर उस मुक्तस्वभाव को देह पर आरोपित करते हो, और प्रकृति तुम्हे तुरन्त बता देती है कि तुम फिर से भूल रहे हो, मुक्ति देह का धर्म नही है। यही कारण है कि हमारी मुक्ति और बन्धन ये दो प्रकार की अनुभूतियाँ एक ही समय देखने मे आती है। योगी मुक्ति और बन्धन दोनो का विचार करते हैं, और उनका अज्ञानान्धकार दूर हो जाता है। वे जान लेते हैं कि पुरुष मुक्त-स्वभाव है, ज्ञानघन है, वह बुद्धिरूप उपाधि के भीतर से इस सान्त ज्ञान के रूप मे प्रकाशित हो रहा है, बस इसी दृष्टि से वह बद्ध है।

तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥२१॥

सूत्रार्थ— (उक्त) दृश्य अर्थात् प्रकृति का स्वरूप (यानी विभिन्न रूपो में परिणाम) उस (द्रष्टा, चिन्मय पुरुष) के ही (भोग तथा मुक्ति के) लिए है।

व्याख्या— प्रकृति की अपनी कोई शक्ति नही है। जब तक पुरुष उसके पास उपस्थित रहता है, तभी तक उसकी शक्ति है ऐसा बोध होता है। चन्द्रमा का प्रकाश जैसे उसका

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पातंजल योगसूत्र-२ २१३

अपना नहीं है, सूर्य से लिया गया है, प्रकृति की शक्ति भी उसी प्रकार पुरुष से प्राप्त है। योगियों के मतानुसार, सारा व्यक्त जगत् प्रकृति से उत्पन्न हुआ है, पर प्रकृति का अपना कोई उद्देश्य नहीं है, केवल पुरुष को मुक्त करना ही उसका प्रयोजन है।

कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥२२॥

सूत्रार्थ—जिन्होंने उस परम पद को प्राप्त कर लिया है, उनके लिए प्रकृति का नाश हो जाने पर भी वह नष्ट नहीं होती, क्योंकि वह दूसरों के लिए साधारण है।

व्याख्या—यह ज्ञात करा देना ही कि आत्मा प्रकृति से सम्पूर्ण स्वतन्त्र है, प्रकृति का एक मात्र लक्ष्य है। जब आत्मा यह जान लेती है, तब प्रकृति उसे और किसी प्रकार प्रलोभित नहीं कर सकती। जो लोग मुक्त हो गए हैं, केवल उन्हीं के लिए यह सारी प्रकृति बिलकुल उड़ जाती है। पर ऐसे करोड़ों लोग हमेशा ही रहेंगे, जिनके लिए प्रकृति कार्य करती रहेगी।

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥२३॥

सूत्रार्थ—दृश्य (प्रकृति) और उसके स्वामी (द्रष्टा पुरुष)—इन दोनों की शक्ति के (भोग्यत्व और भोक्तृत्वरूप) स्वरूप की उपलब्धि का हेतु 'संयोग' है।

व्याख्या—इस सूत्र के अनुसार, जब आत्मा प्रकृति के साथ संयुक्त होती है, तभी इस संयोग के कारण दोनों की क्रम से द्रष्टृत्व और दृश्यत्व इन दोनों शक्तियों का प्रकाश होता है। तभी यह सारा जगत्-प्रपंच विभिन्न रूपों में व्यक्त होता रहता है। अज्ञान ही इस संयोग का हेतु है। हम प्रतिदिन देखते हैं कि हमारे दुःख या सुख का कारण है—शरीर के साथ अपना संयोग कर लेना। यदि मुझे यह निश्चित रूप से ज्ञान रहता

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कि मैं शरीर नहीं हूँ, तो मुझे ठंड, गरमी या और किसी का ख्याल नहीं रहता। यह शरीर एक समवाय या संहति मात्र है। यह कहना भूल है कि मेरा शरीर अलग है, तुम्हारा शरीर अलग और सूर्य एक पृथक् पदार्थ है। यह सारा जगत् महाभूत के एक समुद्र के समान है। उस महासमुद्र मे तुम एक बिन्दु हो, मैं एक दूसरा बिन्दु और सूर्य एक तीसरा। हम जानते हैं कि यह भूत सदा ही भिन्न-भिन्न रूप धारण कर रहा है। आज जो सूर्य का उपादान बना हुआ है, कल वही हमारे शरीर के उपादान के रूप में परिणत हो सकता है।

तस्य हेतुरविद्या ॥२४॥

**सूत्रार्थ—**उस संयोग का कारण है अविद्या अर्थात् अज्ञान।

**व्याख्या—**हमने अज्ञान के कारण अपने को एक निर्दिष्ट शरीर में आबद्ध करके अपने दुःख का रास्ता खोल रखा है। यह धारणा कि "मैं शरीर हूँ", एक कुसंस्कार मात्र है। यह कुसंस्कार ही हमें सुखी या दुःखी करता है। अज्ञान से उत्पन्न इस कुसंस्कार से ही हम शीत, उष्ण, सुख, दुःख आदि अनुभव कर रहे हैं। हमारा कर्तव्य है—इस कुसंस्कार के पार चले जाना। किस तरह इसे कार्य में परिणत करना होगा, यह योगी दिखला देते हैं। यह प्रमाणित हो चुका है कि मन की एक विशेष अवस्था में देह-बोध बिलकुल नहीं रह जाता—उस समय शरीर भले ही दग्ध होता रहे, पर जब तक मन की वह अवस्था रहती है, तब तक मनुष्य किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव नहीं करता। पर हो सकता है, मन की ऐसी उच्चावस्था अचानक एक मुहूर्त के लिए आँधी के समान आए, और दूसरे ही क्षण चली जाय। किन्तु यदि हम इस अवस्था को योग के द्वारा, ठीक

पातंजल-योगसूत्र—२ २१५

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पातंजल-योगसूत्र—२ २१५

शास्त्रीय ढंग से प्राप्त करे, तो हम सदैव आत्मा को शरीर से पृथक् रख सकते हैं ।

तदभावात् संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् ॥२५॥

सूत्रार्थ—उस (अज्ञान) का अभाव होते ही (पुरुष-प्रकृति के) संयोग का अभाव (हो जाता है। यही) हान (अज्ञान का परित्याग) है (और) वही द्रष्टा की कैवल्यपद में अवस्थिति है ।

व्याख्या—योगशास्त्र के मतानुसार, आत्मा अविद्या के कारण प्रकृति के साथ संयुक्त हो गई है, प्रकृति के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा उद्देश्य है। यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है। प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है। बाह्य एवं अन्त-प्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान-पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया-कलाप तो उसके गौण अंग-प्रत्यंग मात्र हैं। योगी मन संयम के द्वारा इस चरम लक्ष्य मे पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। जब तक हम प्रकृति के हाथ से अपना उद्धार नही कर लेते, तब तक हम क्रीतदास के समान हैं; प्रकृति जैसा कहती है, हम उसी प्रकार चलने को लाचार होते है। योगी कहते है, जो मन को वशीभूत कर सकते है, वे भूत को भी वशीभूत कर लेते हैं। अन्त प्रकृति बाह्य प्रकृति की अपेक्षा कही उच्चतर है, और उस पर अधिकार जमाना—उस पर जय प्राप्त करना अपेक्षाकृत कठिन है। इसीलिए जो अन्त प्रकृति को वशीभूत कर सकते है, -सारा जगत् उनके वशीभूत हो जाता है।

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वह उनके दान के समान हो जाता है। राजयोग, प्रकृति को इस तरह वश में लाने का उपाय दिखला देता है। हम बाह्य जगत् में जिन सब शक्तियों के साथ परिचित हैं, उनकी अपेक्षा उच्चतर शक्तियों को वश में लाना पड़ेगा। यह शरीर मन का एक बाह्य आवरण मात्र है। शरीर और मन दो अलग-अलग वस्तुएँ नहीं हैं, वे तो सीप और उसके खोल के समान हैं। वे एक ही वस्तु की दो विभिन्न अवस्थाएँ हैं। सीप के भीतर का जन्तु बाहर से नाना प्रकार के उपादान लेकर उस खोल को तैयार करता है। उसी प्रकार मन नामक यह आन्तरिक सूक्ष्म शक्तिसमूह भी बाहर से स्थूल भूत को लेकर उससे इस शरीर-रूपी ऊपरी खोल को तैयार कर रहा है। अतः हम यदि अन्तर्जगत् पर जय-लाभ कर सके, तो बाह्य जगत् को जीतना फिर बड़ा आसान हो जायगा। फिर, ये दो शक्तियाँ अलग-अलग नहीं हैं। ऐसी बात नहीं है कि कुछ शक्तियाँ भौतिक हैं और कुछ मानसिक। जैसे यह दृश्यमान भौतिक जगत् सूक्ष्म जगत् का स्थूल प्रकाश मात्र है, उसी प्रकार भौतिक शक्तियाँ भी सूक्ष्म शक्ति की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है।

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥

सूत्रार्थ—निरन्तर विवेक का अभ्यास ही अज्ञान-नाश का उपाय है।

व्याख्या—सारे साधन का यथार्थ लक्ष्य है यह सदसद्-विवेक—यह जानना कि पुरुष प्रकृति से भिन्न है, यह विशेष रूप से जानना कि पुरुष भूत भी नहीं है और मन भी नहीं, और चूंकि वह प्रकृति भी नहीं है, इसलिए उसका किसी प्रकार का परिणाम असम्भव है। केवल प्रकृति मे ही सर्वदा परिवर्तन हो रहा है, उसी का सदैव संश्लेषण-विश्लेषण हो रहा है। जब

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पातंजल-योगसूत्र-२ २१७

निरन्तर अभ्यास के द्वारा हम विवेक-लाभ करेंगे, तब अज्ञान चला जायगा और पुरुष अपने स्वरूप में अर्थात् सर्वज्ञ, सर्व-शक्तिमान और सर्वव्यापी रूप में प्रतिष्ठित हो जायगा।

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥२७॥

सूत्रार्थ— उनके (ज्ञानी के) विवेक-ज्ञान के सात उच्चतम सोपान हैं।

व्याख्या— जब इस ज्ञान की प्राप्ति होती है, तब मानो वह एक के बाद एक करके सात स्तरों में आता है। और जब उनमें से एक अवस्था आरम्भ हो जाती है, तब हम निश्चित रूप से जान सकते हैं कि हमें अब ज्ञान की प्राप्ति हो रही है। पहली अवस्था आने पर मन में ऐसा होने लगेगा कि जो कुछ जानने का है, जान लिया। मन में तब और किसी प्रकार का असन्तोष नहीं रह जाता। जब तक हमारी ज्ञान-पिपासा बनी रहती है, तब तक हम इधर-उधर ज्ञान की खोज में लगे रहते हैं। जहाँ से भी कुछ सत्य मिलने की सम्भावना रहती है, झट वहीं दौड जाते हैं। जब वहाँ उसकी प्राप्ति नहीं होती, तब मन अशान्त हो जाता है। फिर अन्य दिशा में हम सत्य की खोज में भटकते फिरते हैं। जब तक हम यह अनुभव नहीं कर लेते कि समस्त ज्ञान हमारे अन्दर है, जब तक यह दृढ़ धारणा नहीं हो जाती कि कोई भी हमें सत्य की प्राप्ति करने में सहायता नहीं पहुँचा सकता, हमें स्वयं ही अपने आपकी सहायता करनी होगी, तब तक सारा सत्यान्वेषण ही वृथा है। जब हम विवेक का अभ्यास आरम्भ करेंगे, तो हमारे सत्य के नजदीक आते जाने का पहला चिह्न यह प्रकाशित होगा कि वह पूर्वोक्त असन्तोष की अवस्था चली जायगी। हमारी यह निश्चित धारणा हो जायगी कि हमने

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२१८राजयोग

सत्य को पा लिया है—और यह सत्य के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता। तब हम यह जान लेते हैं कि सत्यस्वरूप सूर्य उदित हो रहा है, हमारी अज्ञानरजनी पर प्रभात की लाली छा रही है। और तब, हृदय में आशा भरकर, जब तक वह परमपद प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक अध्यवसायसम्पन्न होकर रहना होगा। दूसरी अवस्था में सारे दुःख चले जायेंगे। तब जगत् का बाहरी या भीतर कोई भी विषय हमें दुःख नहीं पहुँचा सकेगा। तीसरी अवस्था में हमें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो जायगी, अर्थात् हम सर्वज्ञ हो जायेंगे। चौथी अवस्था में विवेक की सहायता से सारे कर्तव्यों का अन्त हो जायगा। उसके बाद चित्तविमुक्ति की अवस्था आयगी। तब हम समझ सकेंगे कि हमारी सारी विघ्न-बाधाएँ चली गई हैं। जिस प्रकार किसी पर्वत के शिखर से एक पत्थर के टुकड़े को नीचे लुढ़का देने पर वह फिर ऊपर नहीं जा सकता, उसी प्रकार मन की चंचलता, मन संयम की असमर्थता आदि सभी गिर जायेंगे, अर्थात् नष्ट हो जायेंगे। छठी अवस्था में चित्त समझ लेगा कि इच्छा मात्र से ही वह अपने कारण में लीन हो जा रहा है। अन्त में हम देख पायेंगे कि हम स्वस्वरूप में अवस्थित हैं और इतने दिन तक जगत् में एकमात्र हमी अवस्थित थे। मन या शरीर के साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं था—उनके साथ हमारे युक्त होने की बात तो दूर ही रहे। वे अपना-अपना काम आप कर रहे थे और हमने अज्ञानवश अपने आपको उनसे युक्त कर रखा था। पर हम तो सदा से अकेले ही रहे हैं। इस संसार में केवल हमी सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी और सदानन्दस्वरूप हैं। हमारी अपनी आत्मा इतनी पवित्र और पूर्ण है कि हमें और किसी की आवश्यकता नहीं थी। हमें सुखी करने

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के लिए और कुछ भी आवश्यक नहीं था, क्योंकि हमी सुखस्वरूप हैं। हम देख लेंगे कि यह ज्ञान और किसी के ऊपर निर्भर नहीं रहता। जगत् में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो हमारे ज्ञानालोक से प्रकाशित न हो। यही योगी की अन्तिम अवस्था है। तब योगी धीर और शान्त हो जाते हैं, वे और कोई कष्ट अनुभव नहीं करते, वे फिर कभी अज्ञान-मोह से भ्रान्त नहीं होते, दुःख उन्हें छू नहीं सकता। वे जान लेते हैं कि मैं नित्यानन्दस्वरूप, नित्य-पूर्णस्वरूप और सर्वशक्तिमान् हूँ।

योगांगानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥२८॥

सूत्रार्थ— योग के विभिन्न अंगों का अनुष्ठान करते-करते जब अपवित्रता का नाश हो जाता है, तब ज्ञान प्रदीप्त हो उठता है; उसकी अन्तिम सीमा है विवेकख्याति।

व्याख्या— अब साधन की बात कही जा रही है। अभी तक जो कुछ कहा गया, वह अपेक्षाकृत उच्चतर व्यापार है। वह अभी हमसे बहुत दूर है, किन्तु वही हमारा आदर्श है, हमारा एकमात्र लक्ष्य है। उस लक्ष्यस्थल पर पहुँचने के लिए पहले शरीर और मन को संयत करना आवश्यक है। तभी उस आदर्श में हमारी अनुभूति स्थायी हो सकेगी। हमारा लक्ष्य क्या है यह हमने जान लिया है, अब उसे प्राप्त करने के लिए साधन आवश्यक हैं।

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान-
समाधयोऽष्टावंगानि ॥२९॥

सूत्रार्थ— यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—ये आठ (योग के) अंग हैं।

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥३०॥

सूत्रार्थ— अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी का अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संग्रह का अभाव)—ये पाँच यम कहलाते हैं।

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राजयोग

**व्याख्या—**जो पूर्ण योगी होना चाहते हैं, उन्हे स्त्री-पुरुष-भेद का भाव छोड़ देना पड़ेगा। आत्मा के कोई लिंग नही हैं—उसमे न स्त्री है, न पुरुष, तब क्यो वह स्त्री-पुरुष के भेद-ज्ञान द्वारा अपने आपको कलुषित करे ? बाद में हम और भी अच्छी तरह समझ सकेंगे कि ये सब भाव हमे क्यो बिलकुल छोड़ देने चाहिए। चोरी जैसे एक कुकर्म है, परिग्रह यानी दूसरे के पास से कुछ ग्रहण करना भी वैसा ही एक कुकर्म है। उपहार ग्रहण करनेवाले मनुष्य के मन पर दाता के मन का असर पड़ता है, इसलिए ग्रहण करनेवाले के भ्रष्ट हो जाने की सम्भावना रहती है। दूसरे के पास से कुछ ग्रहण करने से मन की स्वाधीनता चली जाती है और हम मोल लिए हुए गुलाम के समान दाता के अधीन हो जाते हैं। अतएव किसी प्रकार का उपहार ग्रहण करना भी उचित नही।

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥

**सूत्रार्थ—**ये सब (उक्त यम) जाति, देश, काल और समय यानी उद्देश्य के द्वारा अवच्छिन्न न होने पर सार्वभौम महाव्रत कहलाते हैं।

**व्याख्या—**ये सब साधन अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह प्रत्येक व्यक्ति के लिए—प्रत्येक पुरुष, स्त्री और बालक के लिए—बिना किसी जाति, देश या अवस्था के भेद से अनुष्ठेय हैं।

शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥३२॥

**सूत्रार्थ—**बाह्य एवं अन्त शौच, सन्तोष, तपस्या, स्वाध्याय (मन्त्र-जप या अध्यात्म-शास्त्रों का पठन-पाठन) और ईश्वरोपासना—(ये पाँच) नियम हैं।

**व्याख्या—**बाह्यशौच अर्थात् शरीर को पवित्र रखना;

पातंजल-योगसूत्र--२ [२२१]

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पातंजल-योगसूत्र--२ [२२१]

अपवित्र मनुष्य कभी योगी नही हो सकता; इस बाह्यशौच के साथ-साथ अन्त:शौच भी आवश्यक है। समाधिपाद के ३३ वे सूत्र में जिन धर्मों (गुणो) की बात कही गई हैं, उनके पालन से यह अन्त शौच आता है। यह सत्य है कि बाह्यशौच से अन्त शौच अधिक उपकारी है, किन्तु दोनो की ही आवश्यकता है, और अन्त शौच के बिना केवल बाह्यशौच कोई फल उत्पन्न नही करता।

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥३३॥

सूत्रार्थ — वितर्क अर्थात् योग (यम और नियम) के विरोधी भाव उपस्थित होने पर उनके प्रतिपक्षी विचारो का बारम्बार चिन्तन करना चाहिए।

व्याख्या — ऊपर मे जिन सब धर्मों (गुणो) की बात कही गई है, उनके अभ्यास का यही उपाय है। उदाहरणार्थ, जब मन मे क्रोध की एक बडी तरंग आती है, तब उसे कैसे वश मे लाया जाय ? उसके विपरीत एक तरंग उठाकर। उस समय प्रेम की बात मन मे लाओ। कभी-कभी ऐसा होता है कि पत्नी अपने पति पर खूब गरम हो जाती है, उसी समय उसका बच्चा वहां आ जाता है और वह उसे गोद मे उठाकर चूम लेती है, इससे उसके मन में बच्चे के प्रति प्रेमरूप तरंग उठने लगती है और वह पहले की तरंग को दबा देती है। प्रेम, क्रोध के विपरीत है। इसी प्रकार जब मन मे चोरी का भाव उठे, तो चोरी के विपरीत भाव का चिन्तन करना चाहिए। जब दान ग्रहण करने की इच्छा पैदा हो, तो उसके विपरीत भाव का चिन्तन करना चाहिए—आदि-आदि।

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥३४॥

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सूत्रार्थ—वितर्क अर्थात् योग के विरोधी हैं हिंसा आदि भाव; (वे तीन प्रकार के होते हैं—) स्वयं किए हुए, दूसरों से करवाए हुए और अनुमोदन किए हुए, इनके कारण हैं—लोभ, क्रोध और मोह, इनमें भी कोई थोड़े परिमाण का, कोई मध्यम परिमाण का और कोई बहुत बड़े परिमाण का होता है, इनके अज्ञान और क्लेशरूप अनन्त फल हैं,—इस प्रकार (विचार करना ही) प्रतिपक्ष की भावना है।

व्याख्या—मैं स्वयं यदि कोई झूठ कहूँ, तो उससे जो पाप होता है, उतना ही पाप तब भी होता है, जब मैं दूसरे को झूठ बात कहने लगाता हूँ, अथवा दूसरे की किसी झूठ बात का अनुमोदन करता हूँ। वह झूठ भले ही जरासा हो, तो भी झूठ तो है ही। पर्वत की कन्दरा में भी बैठकर यदि तुम कोई पाप-चिन्तन करो, किसी के प्रति भीतर में घृणा का भाव पोषण करो, तो वह भी संचित रहेगा, और कालान्तर में फिर से वह तुम्हारे पास आकर तुम पर आघात करेगा, किसी-न-किसी दिन एक-न-एक प्रकार के दुःख के रूप में वह प्रबल वेग से तुम पर आक्रमण करेगा। यदि तुम अपने हृदय से ईर्ष्या और घृणा का भाव चारो ओर बाहर भेजो, तो वह चक्रवृद्धिब्याज सहित तुम पर आकर गिरेगा। दुनिया की कोई भी ताकत उसे रोक न सकेगी। यदि तुमने एक बार उस शक्ति को बाहर भेज दिया, तो फिर निश्चित जानो, तुम्हे उसका प्रतिघात सहन करना ही पड़ेगा। यह स्मरण रहने पर तुम कुकर्मों से बचे रह सकोगे।

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥३५॥

सूत्रार्थ—भीतर में अहिंसा के प्रतिष्ठित हो जाने पर, उसके निकट सब प्राणी अपना स्वाभाविक वैर-भाव त्याग देते हैं।

व्याख्या—यदि कोई व्यक्ति अहिंसा की चरम अवस्था को प्राप्त कर ले, तो उसके सामने, जो सब प्राणी स्वभावत ही

पातंजल-योगसूत्र—२

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पातंजल-योगसूत्र—२

हिंस्र हैं वे भी शान्तभाव धारण कर लेते हैं। उस योगी के सामने शेर और मेमना एक साथ खेलेंगे। इस अवस्था की प्राप्ति होने पर ही समझना कि तुम्हारा अहिंसाव्रत दृढप्रतिष्ठित हो गया है।

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥३६॥

सूत्रार्थ — जब सत्यव्रत हृदय में प्रतिष्ठित हो जाता है, तब कोई कर्म बिना किए ही अपने लिए या दूसरे के लिए कर्म का फल प्राप्त करने की शक्ति योगी में आ जाती है।

**व्याख्या—**जब सत्य की यह शक्ति तुममें प्रतिष्ठित हो जायगी, तब स्वप्न में भी तुम झूठ बात नही कहोगे। तब शरीर, मन और वचन से सत्य ही बाहर आयगा। तब तुम जो कुछ कहोगे, वही सत्य हो जायगा। यदि तुम किसी से कहो, “तुम कृतार्थ होओ,” तो वह उसी क्षण कृतार्थ हो जायगा। किसी पीड़ित मनुष्य से यदि कहो, “रोगमुक्त हो जाओ,” तो वह उसी समय स्वस्थ हो जायगा।

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७॥

सूत्रार्थ — अस्तेय में प्रतिष्ठित हो जाने पर (उस योगी के सामने) सब प्रकार के धन-रत्न प्रकट हो जाते हैं।

**व्याख्या—**तुम जितना ही प्रकृति से दूर भागोगे, वह उतना ही तुम्हारा अनुसरण करेगी, और यदि तुम उसकी जरा भी परवाह न करो, तो वह तुम्हारी दासी बनकर रहेगी।

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥

**सूत्रार्थ—**ब्रह्मचर्य की दृढ़ स्थिति हो जाने पर वीर्यलाभ होता है।

**व्याख्या—**ब्रह्मचर्यवान मनुष्य के मस्तिष्क में प्रबल शक्ति—महती इच्छाशक्ति संचित रहती है। ब्रह्मचर्य के बिना और किसी भी उपाय से आध्यात्मिक शक्ति नही आ सकती।

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२२४ | राजयोग

जितने महान् मस्तिष्कशाली पुरुष हो गए हैं, वे सभी ब्रह्मचर्य्य-वान थे। इसके द्वारा मनुष्य-जाति पर आश्चर्यजनक क्षमता प्राप्त की जा सकती है। मानवसमाज के सभी आध्यात्मिक नेता-गण ब्रह्मचर्य्यवान थे—उन्हे सारी शक्ति इस ब्रह्मचर्य्य से ही प्राप्त हुई थी। अतएव योगी का ब्रह्मचर्य्यवान होना अनिवार्य्य है।

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥३९॥

सूत्रार्थ — अपरिग्रह के दृढ़प्रतिष्ठित हो जाने पर पूर्वजन्मो की बात स्मृति में उदित हो जाती है।

व्याख्या — जब योगी दूसरे के पास से कोई वस्तु स्वीकार नही करते, तब उन पर दूसरो का कोई असर नही पड़ता, वे किसी के द्वारा अनुगृहीत नही होते और इसलिए वे स्वाधीन एव मुक्त-स्वभाव हो जाते हैं। उनका मन शुद्ध हो जाता है। दान स्वीकार करने से दाता के पाप भी लेने की सम्भावना रहती है। इस परिग्रह को त्याग देने पर मन शुद्ध हो जाता है, और इससे जो सब फल प्राप्त होते हैं, उनमें पूर्वजन्म की स्मृति का उदय होना प्रथम है। तभी वे योगी सम्पूर्ण रूप से अपने लक्ष्य में दृढ होकर रह सकते हैं। वे देख लेते हैं कि इतने दिन तक वे केवल आवागमन कर रहे थे। तब वे दृढ प्रतिज्ञा कर लेते है कि अब की वार मै अवश्य मुक्त होऊँगा, मै अब और आवागमन नही करूँगा, प्रकृति का दास नही होऊँगा।

शौचात् स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥

सूत्रार्थ — शौच के प्रतिष्ठित हो जाने पर अपने शरीर के प्रति घृणा का उद्रेक होता है, दूसरो के साथ संग करने की भी फिर प्रवृत्ति नहीं रहती।

व्याख्या — जब यथार्थ वाह्य और आभ्यन्तर दोनो प्रकार

पातंजल-योगसूत्र—२ २२५

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पातंजल-योगसूत्र—२ २२५

के शौच सिद्ध हो जाते है, तब शरीर के प्रति उदासीनता आ जाती है—उसे कैसे अच्छा रखे, कैसे वह सुन्दर दिखेगा, ये सब भाव बिलकुल चले जाते है। सासारिक लोग जिसे अत्यन्त सुन्दर मुख कहेगे, उसमें यदि ज्ञान का कोई चिह्न न हो, तो वही योगी के निकट पशु के मुख के समान प्रतीत होगा। संसार के मनुष्य जिस मुख मे कोई विशेषता नही देखते, उसके पीछे यदि चैतन्य का प्रकाश हो, तो योगी उसे स्वर्गीय मुखश्री कहेगे। यह देह-तृष्णा मानव-जीवन के लिए एक अभिशापस्वरूप है। अत शौच-प्रतिष्ठा का पहला लक्षण यह दिखेगा कि तुम शरीर के प्रति उदासीन हो जाओगे—तुम्हारे मन में यह विचार तक न उठेगा कि तुम्हारे शरीर है भी। जब यह पवित्रता हममे आती है, तभी हम देह-भाव के ऊपर उठ सकते हैं।

सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥४१॥

सूत्रार्थ—इसके सिवा (इस शौच से) सत्त्वशुद्धि, सौमनस्य अर्थात् मन का प्रफुल्ल भाव, एकाग्रता, इन्द्रियजय और आत्मदर्शन की योग्यता—ये पाँचो भी होते है।

**व्याख्या—**इस शौच के अभ्यास द्वारा सत्त्व पदार्थ का प्राबल्य होता है और मन एकाग्र एव प्रफुल्ल हो जाता है। तुम धर्म-पथ में अपने अग्रसर होने का प्रथम लक्षण यह देखोगे कि तुम दिन-पर-दिन बड़े प्रफुल्ल होते जा रहे हो। यदि कोई व्यक्ति विषादयुक्त दिखे, तो वह अजीर्ण का फल भले ही हो, पर धर्म का लक्षण नही हो सकता। सुख का भाव ही सत्त्व का स्वाभाविक धर्म है, सात्त्विक मनुष्य के लिए सभी सुखमय प्रतीत होते हैं। अत. जब तुममें यह आनन्द का भाव आता रहे, तो समझना कि तुम योग मे उन्नति कर रहे हो। सारे दुःख-कष्ट तमोगुण से

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> स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥

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२२६ राजयोग

उत्पन्न होते हैं; अतएव तुम्हे उससे बचकर रहना होगा—उसको दूर कर देना होगा। विषादपूर्ण होकर चेहरा उतारे रहना तमोगुण का एक लक्षण है। सबल, दृढ़, स्वस्थ, युवक और साहसी मनुष्य ही योगी बनने के योग्य है। योगी के लिए सभी सुखमय प्रतीत होते हैं, वे जिस किसी मनुष्य को देखते हैं, उसी से उनको आनन्द होता है। यही धार्मिक मनुष्य का चिह्न है। पाप ही कष्ट का कारण है, अन्य किसी कारण से कष्ट नहीं आता। उतरा हुआ चेहरा लेकर क्या होगा? कैसा भयानक दृश्य है वह! ऐसी सूरत लेकर बाहर मत जाना। किसी दिन ऐसा होने पर दरवाजा बन्द करके समय बिता देना। संसार के भीतर इस बीमारी को संक्रामित करने का तुम्हें क्या अधिकार है? जब तुम्हारा मन संयत हो जायगा, तब तुम पूरे शरीर को वश में रख सकोगे। तब फिर तुम इस यन्त्र के दास नहीं बने रहोगे, यह देह-यन्त्र ही तुम्हारा दास होकर रहेगा। तब यह देह-यन्त्र आत्मा को खींचकर नीचे की ओर न ले जाकर उसकी मुक्ति में महान् सहायक हो जायगा।

सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः ॥४२॥

सूत्रार्थ— सन्तोष से परम सुख प्राप्त होता है।

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥

सूत्रार्थ— तपस्या से जब अशुद्धि का नाश हो जाता है, तब शरीर और इन्द्रियों की सिद्धि हो जाती है अर्थात् उनमें नाना प्रकार की शक्तियां आती हैं।

व्याख्या— तपस्या का फल कभी-कभी अचानक दूरदर्शन, दूरश्रवण इत्यादि रूप से प्रकाशित होता है।

स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥

सूत्रार्थ— मन्त्र के पुनः-पुनः उच्चारण या अभ्यास से इष्टदेवता के दर्शन होते हैं।

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पातंजल-योगसूत्र—२ २२७

**व्याख्या—**जितने उच्च स्तर के जीव (देवता, ऋषि, सिद्ध) देखने की इच्छा करोगे, अभ्यास भी उतना ही अधिक करना पड़ेगा।

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥४५॥

**सूत्रार्थ—**ईश्वर में समस्त अर्पण करने से समाधि-लाभ होता है।
**व्याख्या—**ईश्वर पर निर्भरता से समाधि की पूर्णता होती है।

स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥

**सूत्रार्थ—**स्थिर भाव से सुखपूर्वक बैठने का नाम आसन है।
**व्याख्या—**अब आसन की बात कही जायगी। जब तक तुम स्थिर भाव से बहुत समय तक बैठे रहने में समर्थ नही होते, तब तक प्राणायाम एव अन्यान्य साधनो मे किसी प्रकार सफल नही हो सकोगे। आसन के स्थिर होने का तात्पर्य है—शरीर के अस्तित्व का बिलकुल भान तक न होना। साधारणत यह देखा जाता है कि ज्योही तुम चन्द मिनट के लिए बैठते हो, त्योही शरीर में नाना प्रकार के विकार आने लगते है। पर जब तुम स्थूल देहभाव के परे चले जाओगे, तब तुम्हे शरीर का भान तक न रहेगा। फिर तुम सुख या दुख कुछ भी अनुभव नही करोगे। जब फिर से तुम्हे शरीर का ज्ञान आयगा, जब तुम आसन से उठोगे, तो ऐसा लगेगा कि तुमने बहुत समय तक विश्राम किया है। यदि शरीर को सम्पूर्ण विश्राम देना सम्भव हो, तो वह इसी प्रकार हो सकता है। जब तुम इस प्रकार शरीर को अपने अधीन करके उसे दृढ रख सकोगे, तब जानना कि तुम्हारा साधन भी दृढ हुआ है। किन्तु जब तक शारीरिक विघ्न-बाधाएँ आती रहेगी, तब तक तुम्हारे स्नायु चचल रहेगे और तुम किसी भी प्रकार मन को एकाग्र न कर सकोगे।

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१२८ राजयोग

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥

**सूत्रार्थ—**शरीर में एक प्रकार का जो अभिमानात्मक प्रयत्न है (अर्थात् चंचलता की ओर शरीर की जो एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है), उसे शिथिल कर देने से और अनन्त के चिन्तन से (आसन स्थिर और सुखकर होता है)।

**व्याख्या—**अनन्त के चिन्तन के द्वारा आसन अविचलित (स्थिर) हो सकता है। पर हाँ, हम उस सर्वद्वन्द्वातीत अनन्त (ब्रह्म) के बारे में (सरलता से) चिन्तन नहीं कर सकते, किन्तु हम अनन्त आकाश के बारे में सोच सकते हैं।

ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥

**सूत्रार्थ—**इस प्रकार आसन सिद्ध हो जाने पर, तब द्वन्द्वपरम्परा और कुछ विघ्न उत्पन्न नहीं कर सकती।

**व्याख्या—**द्वन्द्व का अर्थ है शुभ-अशुभ, शीत-उष्ण, आलोक-अँधेरा, सुख-दुःख आदि विपरीत धर्मवाले दो-दो पदार्थ। ये सब फिर तुम्हें चंचल नहीं कर सकेंगे।

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥

**सूत्रार्थ—**उस आसन की सिद्धि होने के बाद श्वास और प्रश्वास दोनों की गति को संयत करना प्राणायाम कहलाता है।

**व्याख्या—**जब यह आसन सिद्ध हो जाता है, तब इस श्वास-प्रश्वास की गति को रोककर उस पर जय प्राप्त करना पड़ेगा। अत अब प्राणायाम का विषय आरम्भ होता है। प्राणायाम क्या है? शरीरस्थित जीवनी-शक्ति को वश में लाना। यद्यपि 'प्राण' शब्द बहुधा श्वास के अर्थ में प्रयुक्त होता है, तो भी वास्तव में वह श्वास नहीं है। प्राण का अर्थ है जागतिक समस्त शक्तियों की समष्टि। यह वह शक्ति है, जो प्रत्येक देह

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पातञ्जल-योगसूत्र-२ २२९

में अवस्थित है, और उसका ऊपरी प्रकाश है—फेफडे की यह गति। प्राण जब श्वास को भीतर की ओर खींचता है, तभी यह गति शुरू होती है, प्राणायाम करने के समय हम उसी को संयत करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्राण पर अधिकार प्राप्त करने के लिए हम पहले श्वास-प्रश्वास को संयत करना शुरू करते हैं, क्योकि वही प्राण-जय का सबसे सरल मार्ग है।

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥५०॥

सूत्रार्थ— बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति और स्तम्भवृत्ति के भेद से यह प्राणायाम तीन प्रकार का है, देश, काल और संख्या के द्वारा नियमित तथा दीर्घ या सूक्ष्म होने के कारण उनमें भी फिर नाना प्रकार के भेद हैं।

व्याख्या— यह प्राणायाम तीन प्रकार की क्रियाओ में विभक्त है। पहली—जब हम श्वास को अन्दर खींचते और धारण करते है, दूसरी—जब हम उसे बाहर निकालते और धारण करते है, तीसरी—जब श्वास और प्रश्वास को फेफडे के भीतर या उसके बाहर रोकते है। ये फिर देश, काल और संख्या के अनुसार भिन्न-भिन्न रूप धारण करते है। देश का अर्थ है—प्राण को शरीर के किसी अंगविशेष मे आबद्ध रखना। समय का अर्थ है—प्राण को किस स्थान में कितने समय तक रखना होगा, इस बात का ज्ञान, और संख्या का अर्थ है—यह जान लेना कि कितनी बार ऐसा करना होगा। इसीलिए कहाँ पर, कितने समय तक और कितनी बार रेचक आदि करना होगा, इत्यादि कहा जाता है। इस प्राणायाम का फल है उद्घात अर्थात् कुण्डलिनी का जागरण।

> धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥

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२३० राजयोग

वाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥५१॥

सूत्रार्थ—चौथे प्रकार का प्राणायाम वह है, जिसमें प्राणायाम के समय बाह्य या आभ्यन्तर किसी विषय का चिन्तन किया जाता है।

व्याख्या—यह चौथे प्रकार का प्राणायाम है। इसमें चिन्तन के साथ दीर्घकाल तक अभ्यास करते रहने से कुम्भक होता है। दूसरे प्राणायामों में चिन्तन का सम्पर्क नहीं रहता।

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२॥

सूत्रार्थ—उस (प्राणायाम के अभ्यास) से (चित्त के) प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है।

व्याख्या—चित्त में स्वभावत समस्त ज्ञान भरा है, वह सत्त्व पदार्थ द्वारा निर्मित है, पर रज और तम पदार्थों से ढका हुआ है। प्राणायाम के द्वारा चित्त का यह आवरण चला जाता है।

धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥

सूत्रार्थ—(उसी से) धारणा में मन की योग्यता भी (होती है)।

व्याख्या—यह आवरण चले जाने पर हम मन को एकाग्र करने में समर्थ होते हैं।

स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥५४॥

सूत्रार्थ—जब इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय को छोड़कर मानो चित्त का स्वरूप ग्रहण करती हैं, तब उसे प्रत्याहार कहते हैं।

व्याख्या—ये इन्द्रियाँ मन की ही विभिन्न अवस्थाएँ मात्र हैं। मैं एक पुस्तक देखता हूँ। वास्तव में, वह पुस्तक-आकृति बाहर में नहीं है। वह तो मन में है। बाहर की कोई चीज उस आकृति को केवल जगा भर देती है, वास्तव में तो वह चित्त में ही है।