सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पातंजल-योगसूत्र-३ २४५

पातंजल-योगसूत्र-३ २४५

सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थत्वात् स्वार्थसंयमात् पुरुषज्ञानम् ॥३६॥

सूत्रार्थ—पुरुष और बुद्धि, जो कि अत्यन्त पृथक् हैं—उनके विवेक के अभाव से ही भोग होता है। वह भोग परार्थ है अर्थात् किसी अन्य या पुरुष के लिए है। बुद्धि की एक दूसरी अवस्था का नाम है स्वार्थ; उसमें संयम करने से पुरुष का ज्ञान होता है।

व्याख्या—पुरुष और बुद्धि वास्तव में सर्वथा भिन्न हैं; ऐसा होने पर भी पुरुष बुद्धि में प्रतिबिम्बित होकर उसके साथ अपने को अभेद समझता है और उसी से अपने को सुखी या दुःखी अनुभव करता रहता है। बुद्धि की इस अवस्था को परार्थ कहते हैं, क्योंकि उसके सारे भोग अपने लिए नहीं, वरन् पुरुष के लिए हैं। इसके सिवा बुद्धि की और एक अवस्था है—उसका नाम है स्वार्थ। जब बुद्धि सत्त्वप्रधान होकर अत्यन्त निर्मल हो जाती है और उसमें पुरुष विशेष रूप से प्रतिबिम्बित होता है, तब वह बुद्धि अन्तर्मुखी होकर केवल पुरुष का अवलम्बन करती है। उस 'स्वार्थ' नामक बुद्धि में संयम करने से पुरुष का ज्ञान होता है। केवल पुरुष का अवलम्बन करनेवाली बुद्धि में संयम करने को कहने का तात्पर्य यह है कि शुद्ध पुरुष ज्ञाता होने के कारण कभी ज्ञान का विषय नहीं बन सकता।

ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥३७॥

सूत्रार्थ—उससे प्रातिभ ज्ञान और (अलौकिक) श्रवण, स्पर्श, दर्शन, स्वाद एवं वार्ता (घ्राण)—ये (छ सिद्धियाँ) प्रकट होती हैं।

ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥३८॥

सूत्रार्थ—ये (छहों) समाधि में उपसर्ग (विघ्न) हैं, पर व्युत्थान (संसार-अवस्था) में सिद्धिरूप हैं।

२४६ राजयोग

व्याख्या—योगी जानते हैं कि संसार के यावत् भोग पुरुष और मन के संयोग द्वारा होते हैं। यदि वे इस सत्य में कि 'आत्मा और प्रकृति एक दूसरे से पृथक् वस्तु है,' चित्त का संयम कर सके, तो उन्हें पुरुष का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। उससे विवेकज्ञान उदित होता है। जब वे इस विवेक को प्राप्त कर लेते हैं, तब उन्हें प्रातिभ नामक अत्यन्त उच्च कोटि का दैवज्ञान प्राप्त होता है। पर ये सब सिद्धियाँ उस उच्चतम लक्ष्य अर्थात् उस पवित्रस्वरूप आत्मा के ज्ञान और मुक्ति की प्रतिबन्धकस्वरूप हैं। ये सब तो मानो रास्ते में प्राप्त होनेवाली चीजें भर हैं। यदि योगी इन सिद्धियों का परित्याग कर दें, तभी वे उस उच्चतम ज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं। यदि वे इनमें अटक जायें, तो फिर उनकी उन्नति रुक जाती है।

बन्धकारणशैथिल्यात् प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥३९॥

सूत्रार्थ—जब बन्धन का कारण शिथिल हो जाता है और योगी चित्त के प्रचारस्थानों को (अर्थात् शरीरस्थ नाड़ीसमूह को) जान लेते हैं, तब वे दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

व्याख्या—योगी एक देह में रहकर और उस देह में क्रियाशील रहते हुए भी अन्य किसी मृत देह में प्रवेश करके उसे गतिशील कर सकते हैं। इसी प्रकार, वे किसी जीवित शरीर में प्रवेश करके उस व्यक्ति के मन और इन्द्रियों को निरुद्ध कर सकते हैं, तथा उस समय तक के लिए उस शरीर के भीतर से काम कर सकते हैं। प्रकृति और पुरुष के विवेक को प्राप्त करने पर ही ऐसा करना उनके लिए सम्भव होता है। यदि वे दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की इच्छा करें, तो उस शरीर में संयम