राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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ही चल बसता है। यह जो आयु की विभिन्नता है, वह पूर्वकर्म द्वारा ही नियमित होती है। फिर इसी प्रकार, किसी को देखने पर प्रतीत होता है कि मानो सुख-भोग के लिए ही उसका जन्म हुआ है—यदि वह वन में भी चला जाय, तो वहां भी सुख मानो उसके पीछे-पीछे जाता है। और कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा होता है कि उसके पीछे दुःख मानो छाया के समान लगा रहता है। यह सब उनके अपने-अपने पूर्वकर्म का फल है। योगियों के मतानुसार पुण्यकर्म सुख लाते हैं और पापकर्म दुःख। जो मनुष्य कुकर्म करता है, वह क्लेश के रूप में अपने किए का फल अवश्य भोगता है।
ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥१४॥
सूत्रार्थ—वे (जाति, आयु और भोग) हर्ष और शोकरूप फल के देनेवाले होते हैं, क्योंकि उनके कारण हैं पुण्य और पाप कर्म।
परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥१५॥
सूत्रार्थ—परिणाम-काल में परिणाम (नतीजा) रूप जो दुःख है, भोग-काल में भोग में विघ्न होने की आशंकारूप जो दुःख है, अथवा सुख के संस्कार से उत्पन्न होनेवाला तृष्णारूप जो दुःख है—उस सबका जन्मदाता होने के कारण, तथा गुणवृत्तियों में अर्थात् सत्त्व, रज और तम में परस्पर विरोध होने के कारण विवेकी पुरुष के लिए सब-का-सब दुःखरूप ही है।
व्याख्या—योगीगण कहते हैं कि जिनमें विवेकशक्ति है, जिनमें थोड़ीसी भी अन्तर्दृष्टि है, वे सुख और दुःख नामवाली सर्वविध वस्तुओं के अन्तस्तल तक को देख लेते हैं और जान लेते हैं कि ये सुख और दुःख आपस में मानो गुंथे हुए हैं, एक ही