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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

पातंजल-योगसूत्र-३ २३३

Page 250Permalink

पातंजल-योगसूत्र-३ २३३

व्याख्या—जब ध्यान में वस्तु का रूप या बाहरी भाग परित्यक्त हो जाता है, तभी यह समाधि-अवस्था आती है। मान लो, में इस पुस्तक के बारे मे ध्यान कर रहा हूँ और सोचो, मैं उसमें चित्त-संयम करने मे सफल हो गया। तब केवल, बिना किसी रूप मे प्रकाशित, अर्थ नामक आभ्यन्तरिक सवेदनाएँ (अनुभूतियाँ) ही मेरे ज्ञान में आने लगती है। ध्यान की इस अवस्था को समाधि कहते है।

त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥

सूत्रार्थ—इन तीनो का जब एक साथ अर्थात् एक ही वस्तु के सम्बन्ध में अभ्यास किया जाता है, तब उसे संयम कहते हैं।

व्याख्या—जब कोई व्यक्ति अपने मन को किसी निर्दिष्ट वस्तु की ओर ले जाकर उस वस्तु में कुछ समय तक के लिए धारण कर सकता है, और फिर उसके अन्तर्भाग को उसके बाहरी आकार से अलग करके बहुत समय तक रख सकता है, तभी समझना चाहिए कि संयम हुआ। अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि, ये तीनों क्रमशः एक के बाद एक, किसी एक वस्तु के ऊपर होने पर एक संयम हुआ। तब उस वस्तु का बाहरी आकार न जाने कहाँ चला जाता है, मन में केवल उसका अर्थ मात्र उद्भासित होता रहता है।

तज्जयात् प्रज्ञालोकः ॥५॥

सूत्रार्थ—उसको जीत लेने से ज्ञानालोक का प्रकाश होता है।

व्याख्या—जब कोई मनुष्य इस संयम के साधन में सफल हो जाता है, तब सारी शक्तियाँ उसके हाथ मे आ जाती हैं। यह संयम ही योगी के ज्ञानलाभ का प्रधान यन्त्रस्वरूप है। ज्ञान के विषय अनन्त हैं। वे स्थूल, स्थूलतर, स्थूलतम और सूक्ष्म,