राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातंजल-योगसूत्र-२ २०३
बद्ध नहीं थे। प्रकृति का बन्धन तुम पर किसी काल मे नहीं है। योगी तुम्हे यही शिक्षा देते है, धैर्यपूर्वक इसको सीखो। योगी यह समझने देते हैं कि पुरुष किस प्रकार इस प्रकृति के साथ अपने को मिलाकर--अपने को मन और जगत् के साथ एकरूप करके अपने आप को दुःखी समझने लगता है। योगी यह भी कहते है कि इस दुखमय संसार से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय है--प्रकृति के सारे सुख-दु ख भोगकर अभिज्ञता प्राप्त कर लेना। भोग अवश्यम्भावी है, वह तो करना ही होगा, अतएव जितनी जल्दी वह कर लिया जाय, उतना ही मगल है। हमने अपने आपको इस जाल. मे फँसा लिया है, हमे इसके बाहर आना होगा। हम स्वय-इस फन्दे मे फँस गए हैं, और अब अपने ही प्रयत्न से उससे मुक्ति प्राप्त करनी पडेगी। अतएव, पति-पत्नी सम्बन्धी, मित्र सम्बन्धी तथा और भी जो सब छोटी-छोटी प्रेम की आकाक्षाएँ है, सभी को भोग कर डालो। यदि अपना स्वरूप तुम्हे सदा याद रहे, तो तुम शीघ्र ही निर्विघ्न इसके पार हो जाओगे। यह कभी न भूलना कि यह अवस्था बिलकुल अल्प समय के लिए है और हमे इसके भीतर से बाध्य होकर जाना पड रहा है। भोग--सुख--दुःख का यह अनुभव ही--हमारा एकमात्र महान् शिक्षक है, लेकिन स्मरण रहे, ये सब भोग मार्ग की केवल सामयिक घटनाएँ मात्र हैं, वे क्रमश हमें एक ऐसी अवस्था मे ले जाते है, जहाँ ससार की समस्त वस्तुएँ बिलकुल तुच्छ हो जाती हैं। तब पुरुष विश्वव्यापी विराट् के रूप मे प्रकाशित हो जाती है और तब यह सारा विश्व सिन्धु मे एक बिन्दु-सा प्रतीत होने लगता है और अपनी ही इस क्षुद्रता के कारण--इस शून्यता के कारण न जाने कहाँ विलीन हो जाता है। सुख-दुःख का भोग तो