राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
७२ राजयोग
७२ राजयोग
उपर्युक्त तीन प्रक्रियाओं में से पहली और अन्तिम क्रियाएँ कठिन भी नही और उनमे किसी प्रकार की विपत्ति की आशंका भी नही। पहली क्रिया का जितना अभ्यास करोगे, उतना ही तुम शान्त होते जाओगे। उसके साथ ओंकार जोड़कर अभ्यास करो, देखोगे, जब तुम दूसरे कार्य मे लगे हो, तब भी तुम उसका अभ्यास कर सक रहे हो। उस क्रिया के फल से, देखोगे, तुम अपने को सभी बातो मे अच्छा ही महसूस कर रहे हो। इस तरह कठोर साधना करते-करते एक दिन तुम्हारी कुण्डलिनी जग जायगी। जो दिन मे केवल एक या दो बार अभ्यास करेंगे, उनके शरीर और मन कुछ स्थिर भर हो जायेंगे और उनका स्वर मधुर हो जायगा। परन्तु जो कमर बाँधकर साधना के लिए आगे बढ़ेंगे, उनकी कुण्डलिनी जागृत् हो जायगी, उनके लिए सारी प्रकृति एक नया रूप धारण कर लेगी, उनके लिए ज्ञान का द्वार खुल जायगा। तब फिर ग्रन्थो मे तुम्हे ज्ञान की खोज न करनी होगी। तुम्हारा मन ही तुम्हारे निकट अनन्त-ज्ञान-विशिष्ट पुस्तक का काम करेगा। मैने मेरुदण्ड के दोनो ओर से प्रवाहित इडा और पिंगला नामक दो शक्तिप्रवाहो का पहले ही उल्लेख किया है, और मेरुमज्जा के बीच से जानेवाली सुषुम्ना की बात भी कही है। यह इडा, पिंगला और सुषुम्ना प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है। जिनके मेरुदण्ड है, उन सभी के भीतर ये तीन प्रकार की भिन्न-भिन्न क्रिया-प्रणालियाँ मौजूद है। परन्तु योगी कहते है, साधारण जीव में यह सुषुम्ना बन्द रहती है, उसके भीतर किसी तरह की क्रिया का अनुभव नही किया जा सकता, किन्तु इडा और पिंगला नाडियो का कार्य, अर्थात् शरीर के विभिन्न भागो में शक्तिवहन करना, सभी प्राणियो में होता रहता है।
अध्यात्म प्राण का संयम ७३
केवल योगी में यह सुषुम्ना खुली रहती है। यह सुषुम्ना-द्वार खुलने पर उसके भीतर से स्नायविक शक्तिप्रवाह जब ऊपर चढता है, तब चित्त उच्च से उच्चतर भूमि पर उठता जाता है, और अन्त में हम अतीन्द्रिय राज्य में चले जाते हैं। हमारा मन तब अतीन्द्रिय, ज्ञानातीत, पूर्णचैतन्य इत्यादि नामोंवाली अवस्था प्राप्त कर लेता है। तब हम बुद्धि के अतीत प्रदेश में चले जाते हैं, वहाँ तर्क नहीं पहुँच सकता। इस सुषुम्ना को खोलना ही योगी का एकमात्र उद्देश्य है। ऊपर में जिन शक्तिवहन-केन्द्रों का उल्लेख किया गया है, योगियों के मत में वे सुषुम्ना में ही अवस्थित हैं। रूपक की भाषा में उन्ही को पद्म कहते हैं। सबसे नीचेवाला पद्म सुषुम्ना के सबसे नीचे भाग में अवस्थित है। उसका नाम है मूलाधार। इसके बाद दूसरा है स्वाधिष्ठान। तीसरा मणिपूर। फिर चौथा अनाहत, पाँचवाँ विशुद्ध, छठा आज्ञा, और सातवाँ है सहस्रार या सहस्रदल पद्म। यह सहस्रार सबसे ऊपर, मस्तिष्क में स्थित है। अभी इनमें से केवल दो केन्द्रों (चक्रों) की बात हम लेंगे—सबसे नीचेवाले मूलाधार की और सबसे ऊपरवाले सहस्रार की। सबसे नीचेवाले चक्र में ही समस्त शक्तियाँ अवस्थित हैं, और उस शक्ति को उस जगह से लेकर मस्तिष्कस्थ सर्वोच्च चक्र पर ले जाना होगा। योगी कहते हैं, मनुष्य-देह में जितनी शक्तियाँ हैं, उनमें ओज सबसे उत्कृष्ट कोटि की शक्ति है। यह ओज मस्तिष्क में संचित रहता है। जिसके मस्तक में ओज जितने अधिक परिमाण में रहता है, वह उतना ही अधिक बुद्धिमान् और आध्यात्मिक बल से बली होता है। एक व्यक्ति बड़ी सुन्दर भाषा में सुन्दर भाव व्यक्त करता है, परन्तु लोग आकृष्ट नहीं होते। और दूसरा