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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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Page 217

२०० | राजयोग

आपस में विरोध। प्रत्येक अपनी-अपनी ओर खींचती है, और इस प्रकार स्थायी सुख असम्भव हो जाता है।

हेयं दुःखमनागतम् ॥१६॥

सूत्रार्थ— जो दुःख अभी तक नहीं आया, उसका त्याग करना चाहिए।

व्याख्या— कर्म का कुछ अंश हम पहले ही भोग चुके हैं, कुछ अंश हम वर्तमान में भोग रहे हैं, और शेष अंश भविष्य में फल प्रदान करेगा। हमने जिसका भोग कर लिया है, वह तो अब समाप्त हो चुका। हम वर्तमान में जिसका भोग कर रहे हैं, उसका भोग तो हमें करना ही पड़ेगा, केवल जो कर्म भविष्य में फल देने के लिए बच रहा है, उसी पर हम जय प्राप्त कर सकते हैं अर्थात् उसका नाश कर सकते हैं। इसीलिए हमें अपनी पूरी शक्ति उस कर्म के नाश के लिए प्रयुक्त कर देनी चाहिए, जिसने अभी तक कोई फल पैदा नहीं किया है।

द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥१७॥

सूत्रार्थ— यह जो हेय है, अर्थात् जिस दुःख का त्याग करना होगा, उसका कारण है द्रष्टा और दृश्य का संयोग।

व्याख्या— इस द्रष्टा का अर्थ क्या है?—मनुष्य की आत्मा—पुरुष। दृश्य क्या है?—मन से लेकर स्थूल भूत तक सारी प्रकृति। इस पुरुष और मन के संयोग से ही समस्त सुख-दुःख उत्पन्न हुए हैं। तुम्हें याद होगा, इस योगदर्शन के मतानुसार पुरुष शुद्धस्वरूप है, ज्योंही वह प्रकृति के साथ संयुक्त होता है और प्रकृति में प्रतिबिम्बित होता है, त्योंही वह सुख अथवा दुःख का अनुभव करता हुआ प्रतीत होता है।

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥१८॥

सूत्रार्थ— प्रकाश, क्रिया और स्थिति जिसका स्वभाव है, भूत और