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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पातंजल-योगसूत्र—२ २१५

पातंजल-योगसूत्र—२ २१५

शास्त्रीय ढंग से प्राप्त करे, तो हम सदैव आत्मा को शरीर से पृथक् रख सकते हैं ।

तदभावात् संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् ॥२५॥

सूत्रार्थ—उस (अज्ञान) का अभाव होते ही (पुरुष-प्रकृति के) संयोग का अभाव (हो जाता है। यही) हान (अज्ञान का परित्याग) है (और) वही द्रष्टा की कैवल्यपद में अवस्थिति है ।

व्याख्या—योगशास्त्र के मतानुसार, आत्मा अविद्या के कारण प्रकृति के साथ संयुक्त हो गई है, प्रकृति के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा उद्देश्य है। यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है। प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है। बाह्य एवं अन्त-प्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन संयम अथवा ज्ञान, इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ। बस यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान-पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया-कलाप तो उसके गौण अंग-प्रत्यंग मात्र हैं। योगी मन संयम के द्वारा इस चरम लक्ष्य मे पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। जब तक हम प्रकृति के हाथ से अपना उद्धार नही कर लेते, तब तक हम क्रीतदास के समान हैं; प्रकृति जैसा कहती है, हम उसी प्रकार चलने को लाचार होते है। योगी कहते है, जो मन को वशीभूत कर सकते है, वे भूत को भी वशीभूत कर लेते हैं। अन्त प्रकृति बाह्य प्रकृति की अपेक्षा कही उच्चतर है, और उस पर अधिकार जमाना—उस पर जय प्राप्त करना अपेक्षाकृत कठिन है। इसीलिए जो अन्त प्रकृति को वशीभूत कर सकते है, -सारा जगत् उनके वशीभूत हो जाता है।

२१६ राजयोग

वह उनके दान के समान हो जाता है। राजयोग, प्रकृति को इस तरह वश में लाने का उपाय दिखला देता है। हम बाह्य जगत् में जिन सब शक्तियों के साथ परिचित हैं, उनकी अपेक्षा उच्चतर शक्तियों को वश में लाना पड़ेगा। यह शरीर मन का एक बाह्य आवरण मात्र है। शरीर और मन दो अलग-अलग वस्तुएँ नहीं हैं, वे तो सीप और उसके खोल के समान हैं। वे एक ही वस्तु की दो विभिन्न अवस्थाएँ हैं। सीप के भीतर का जन्तु बाहर से नाना प्रकार के उपादान लेकर उस खोल को तैयार करता है। उसी प्रकार मन नामक यह आन्तरिक सूक्ष्म शक्तिसमूह भी बाहर से स्थूल भूत को लेकर उससे इस शरीर-रूपी ऊपरी खोल को तैयार कर रहा है। अतः हम यदि अन्तर्जगत् पर जय-लाभ कर सके, तो बाह्य जगत् को जीतना फिर बड़ा आसान हो जायगा। फिर, ये दो शक्तियाँ अलग-अलग नहीं हैं। ऐसी बात नहीं है कि कुछ शक्तियाँ भौतिक हैं और कुछ मानसिक। जैसे यह दृश्यमान भौतिक जगत् सूक्ष्म जगत् का स्थूल प्रकाश मात्र है, उसी प्रकार भौतिक शक्तियाँ भी सूक्ष्म शक्ति की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है।

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥

सूत्रार्थ—निरन्तर विवेक का अभ्यास ही अज्ञान-नाश का उपाय है।

व्याख्या—सारे साधन का यथार्थ लक्ष्य है यह सदसद्-विवेक—यह जानना कि पुरुष प्रकृति से भिन्न है, यह विशेष रूप से जानना कि पुरुष भूत भी नहीं है और मन भी नहीं, और चूंकि वह प्रकृति भी नहीं है, इसलिए उसका किसी प्रकार का परिणाम असम्भव है। केवल प्रकृति मे ही सर्वदा परिवर्तन हो रहा है, उसी का सदैव संश्लेषण-विश्लेषण हो रहा है। जब