राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
पातंजल-योगसूत्र-२ २१७
पातंजल-योगसूत्र-२ २१७
निरन्तर अभ्यास के द्वारा हम विवेक-लाभ करेंगे, तब अज्ञान चला जायगा और पुरुष अपने स्वरूप में अर्थात् सर्वज्ञ, सर्व-शक्तिमान और सर्वव्यापी रूप में प्रतिष्ठित हो जायगा।
तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥२७॥
सूत्रार्थ— उनके (ज्ञानी के) विवेक-ज्ञान के सात उच्चतम सोपान हैं।
व्याख्या— जब इस ज्ञान की प्राप्ति होती है, तब मानो वह एक के बाद एक करके सात स्तरों में आता है। और जब उनमें से एक अवस्था आरम्भ हो जाती है, तब हम निश्चित रूप से जान सकते हैं कि हमें अब ज्ञान की प्राप्ति हो रही है। पहली अवस्था आने पर मन में ऐसा होने लगेगा कि जो कुछ जानने का है, जान लिया। मन में तब और किसी प्रकार का असन्तोष नहीं रह जाता। जब तक हमारी ज्ञान-पिपासा बनी रहती है, तब तक हम इधर-उधर ज्ञान की खोज में लगे रहते हैं। जहाँ से भी कुछ सत्य मिलने की सम्भावना रहती है, झट वहीं दौड जाते हैं। जब वहाँ उसकी प्राप्ति नहीं होती, तब मन अशान्त हो जाता है। फिर अन्य दिशा में हम सत्य की खोज में भटकते फिरते हैं। जब तक हम यह अनुभव नहीं कर लेते कि समस्त ज्ञान हमारे अन्दर है, जब तक यह दृढ़ धारणा नहीं हो जाती कि कोई भी हमें सत्य की प्राप्ति करने में सहायता नहीं पहुँचा सकता, हमें स्वयं ही अपने आपकी सहायता करनी होगी, तब तक सारा सत्यान्वेषण ही वृथा है। जब हम विवेक का अभ्यास आरम्भ करेंगे, तो हमारे सत्य के नजदीक आते जाने का पहला चिह्न यह प्रकाशित होगा कि वह पूर्वोक्त असन्तोष की अवस्था चली जायगी। हमारी यह निश्चित धारणा हो जायगी कि हमने
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सत्य को पा लिया है—और यह सत्य के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता। तब हम यह जान लेते हैं कि सत्यस्वरूप सूर्य उदित हो रहा है, हमारी अज्ञानरजनी पर प्रभात की लाली छा रही है। और तब, हृदय में आशा भरकर, जब तक वह परमपद प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक अध्यवसायसम्पन्न होकर रहना होगा। दूसरी अवस्था में सारे दुःख चले जायेंगे। तब जगत् का बाहरी या भीतर कोई भी विषय हमें दुःख नहीं पहुँचा सकेगा। तीसरी अवस्था में हमें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो जायगी, अर्थात् हम सर्वज्ञ हो जायेंगे। चौथी अवस्था में विवेक की सहायता से सारे कर्तव्यों का अन्त हो जायगा। उसके बाद चित्तविमुक्ति की अवस्था आयगी। तब हम समझ सकेंगे कि हमारी सारी विघ्न-बाधाएँ चली गई हैं। जिस प्रकार किसी पर्वत के शिखर से एक पत्थर के टुकड़े को नीचे लुढ़का देने पर वह फिर ऊपर नहीं जा सकता, उसी प्रकार मन की चंचलता, मन संयम की असमर्थता आदि सभी गिर जायेंगे, अर्थात् नष्ट हो जायेंगे। छठी अवस्था में चित्त समझ लेगा कि इच्छा मात्र से ही वह अपने कारण में लीन हो जा रहा है। अन्त में हम देख पायेंगे कि हम स्वस्वरूप में अवस्थित हैं और इतने दिन तक जगत् में एकमात्र हमी अवस्थित थे। मन या शरीर के साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं था—उनके साथ हमारे युक्त होने की बात तो दूर ही रहे। वे अपना-अपना काम आप कर रहे थे और हमने अज्ञानवश अपने आपको उनसे युक्त कर रखा था। पर हम तो सदा से अकेले ही रहे हैं। इस संसार में केवल हमी सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी और सदानन्दस्वरूप हैं। हमारी अपनी आत्मा इतनी पवित्र और पूर्ण है कि हमें और किसी की आवश्यकता नहीं थी। हमें सुखी करने