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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

पातंजल-योगसूत्र १६७

Page 184Permalink

पातंजल-योगसूत्र १६७

प्रणाली तैयार हो जाती है। यही कारण है कि योगाभ्यास के समय हमारे सामने पहले इतनी शारीरिक बाधाएँ आती हैं; क्योंकि योग सम्पूर्णतया नवीन प्रकार के विचारों एवं भावों की समष्टि है। इसीलिए हम देखते हैं कि धर्म का वह अंश, जो प्राकृतिक, जागतिक भाव को लेकर सामने आता है, सर्वसाधारण के लिए इतनी बहुतायत से ग्राह्य होता है, और उसका दूसरा अंश अर्थात् दर्शन या मनोविज्ञान, जो केवल मनुष्य के आभ्यन्तरिक भाग को लेकर संलग्न रहता है, साधारणतः लोगों को उतना ग्राह्य नहीं होता। हमें अपने इस जगत् की व्याख्या स्मरण रखनी चाहिए। हमारा यह जगत् क्या है ? वह तो हमारे ज्ञान के स्तर पर प्रकाशित अनन्त सत्ता मात्र है। अनन्त का केवल कुछ अंश हमारे ज्ञान के सामने प्रकाशित हुआ है और उसी को हम अपना जगत् कहते हैं। अतएव हमने देखा कि जगत् के अतीत एक अनन्त सत्ता वर्तमान है। और धर्म को इन दोनों को लेकर रहना पड़ता है। अर्थात् यह क्षुद्र पिण्ड, जिसे हम अपना जगत् कहते हैं, और जगत् के अतीत अनन्त सत्ता—ये दोनों ही धर्म के विषय हैं। जो धर्म इन दोनों में से केवल एक को लेकर रहता है, वह अपूर्ण है। धर्म को इन दोनों को ही अपना विषय बनाना चाहिए। अनन्त का जो भाग हम अपने इस ज्ञान के भीतर से अनुभव करते हैं, जो मानो देश-काल-निमित्तरूप चक्र के भीतर आ पड़ा है, उसको धर्म के जिस अंश ने अपना विषय बनाया है, वह अंश अनायास हमें बोधगम्य हो जाता है, क्योंकि हम तो पहले से ही उसी के अन्दर हैं और इस जगत् के भाव एक प्रकार से स्मरणातीत काल से ही हमारे परिचित हैं। पर उसका जो अंश अनन्त को लेकर है, वह हमारे