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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

पातंजल-योगसूत्र-३ २३९

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पातंजल-योगसूत्र-३ २३९

शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभाग-
संयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥१७॥

सूत्रार्थ—शब्द, अर्थ और प्रत्यय (ज्ञान)—इनको, आपस में अध्यास हो जाने के कारण, जो संकरावस्था हो रही है, उसके विभाग में संयम करने से समस्त प्राणियों की वाणी का ज्ञान (हो जाता है)।

व्याख्या—शब्द से उस बाह्य विषय का बोध होता है, जो मन में किसी वृत्ति को जागरित कर देता है। अर्थ कहने से शरीर मे का वह प्रवाह समझना चाहिए, जो इन्द्रिय-द्वार से प्राप्त विषयो के अभिघात से उत्पन्न हुई संवेदना को ले जाकर मस्तिष्क में पहुँचा देता है। और ज्ञान कहने से मन की उस प्रतिक्रिया को समझना चाहिए, जिससे विषयानुभूति होती है। इन तीनों के मिश्रित होने से ही हमारे इन्द्रियग्राह्य विषय उत्पन्न होते हैं। मान लो, मैने एक शब्द सुना, पहले बाहर में एक कम्पन हुआ, तत्पश्चात् श्रवणेन्द्रिय द्वारा मन में एक बोध-प्रवाह गया, उसके बाद मन ने प्रतिक्रिया की, और मैं उस शब्द को जान सका। मैंने यह जो उस शब्द को जाना है, वह तीन पदार्थों का मिश्रण है—पहला, कम्पन, दूसरा, अनुभूतिप्रवाह, और तीसरा, प्रतिक्रिया। साधारणत, ये तीन व्यापार पृथक् नही किए जा सकते, पर अभ्यास के द्वारा योगी उनको पृथक् कर सकते हैं। जब मनुष्य इनको अलग करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है, तब वह फिर जिस किसी शब्द में सयम का प्रयोग करे, वह उसी क्षण उस अर्थ को समझ सकता है, जिसको प्रकाशित करने के लिए वह शब्द उच्चारित हुआ है, फिर वह शब्द चाहे मनुष्य द्वारा किया गया हो, चाहे अन्य किसी प्राणी द्वारा।

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२४० राजयोग

संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥१८॥

सूत्रार्थ—सस्कारो को प्रत्यक्ष कर लेने से पूर्वजन्म का ज्ञान (हो जाता है)।

व्याख्या—हम जो कुछ अनुभव करते है, वह समस्त हमारे चित्त मे तरग के रूप में आया करता है। वह फिर चित्तरूपी सरोवर की तली मे चला जाता है और क्रमश ' सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता जाता है। वह बिलकुल नष्ट नही हो जाता। वह वहाँ जाकर अत्यन्त सूक्ष्मभाव से रहता है। यदि हम उस तरग को फिर से ऊपर ला सके, तो वही स्मृति कहलाती है। अतएव योगी यदि मन से इन सब पूर्वसस्कारो में सयम कर सके, तो वे पूर्वजन्म की बाते स्मरण करना आरम्भ कर देंगे।

प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥१९॥

सूत्रार्थ—दूसरे के शरीर में जो सब चिह्न हैं, उनमें संयम करने से उस व्यक्ति के मन का ज्ञान (हो जाता है)।

व्याख्या—प्रत्येक व्यक्ति के शरीर मे कुछ विशिष्ट चिह्न रहते हैं, जिनके द्वारा उसको दूसरे व्यक्तियो से पृथक् करके पहचाना जाता है। जब योगी किसी मनुष्य के इन विशेष चिन्हो में सयम करते हैं, तब वे उस मनुष्य के मन का स्वभाव जान लेते है।

न च तत् सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ॥२०॥

सूत्रार्थ—किन्तु उस चित्त का अवलम्बन क्या है, यह वे नहीं जान सकते, क्योंकि वह उनके सयम का विषय नहीं है।

व्याख्या—ऊपर के सूत्र मे शरीर के चिन्हो मे सयम की जो बात कही गई है, उसके द्वारा उस व्यक्ति के मन में उस.