राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातजल-योगसूत्र-२ २०९
प्रतीत होगा। चैतन्य अनुलोम-परिणाम को प्राप्त होकर स्थूल भूत का आकार धारण करता है, स्थूल भूत फिर विलोम-परिणाम से चैतन्यरूप मे परिणत होता है, और इस प्रकार क्रम चलता रहता है। सांख्य और अन्य सब धर्मों के आचार्यगण भी चैतन्य को ही प्रथम स्थान देते है। उससे वह श्रृंखला इस प्रकार का रूप धारण करती है कि पहले चैतन्य, और पीछे भूत। वैज्ञानिक भूत को पहले लेकर कहते हैं कि पहले भूत, और पीछे चैतन्य। पर ये दोनो ही उसी एक श्रृंखला की बात कहते है। किन्तु भारतीय दर्शन इस चैतन्य और भूत दोनो के परे जाकर उस पुरुष या आत्मा का साक्षात्कार करता है, जो ज्ञान के भी अतीत है। यह ज्ञान तो मानो उस ज्ञानस्वरूप आत्मा के पास से प्राप्त आलोक के समान है।
द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥२०॥
सूत्रार्थ—द्रष्टा केवल चैतन्यमात्र है; यद्यपि वह स्वयं पवित्र-स्वरूप है, तो भी वह बुद्धि के भीतर से देखा करता है।
व्याख्या—यहाँ पर भी सांख्यदर्शन की बात कही जा रही है। हमने पहले देखा है, सांख्यदर्शन का यह मत है कि अत्यन्त क्षुद्र पदार्थ से लेकर बुद्धि तक सभी प्रकृति के अन्तर्गत है, किन्तु पुरुष (आत्माएँ) इस प्रकृति के बाहर हैं, इन पुरुषो के कोई गुण नही है। तब फिर आत्मा क्योकर सुखी या दुःखी होती है? केवल बुद्धि मे प्रतिबिम्बित होकर वह वैसी प्रतीयमान होती है। जैसे स्फटिक के एक टुकडे के पास एक लाल फूल रखने पर वह स्फटिक लाल दिखाई देता है, उसी प्रकार हम जो सुख या दुःख अनुभव कर रहे हैं, वह वास्तव मे प्रतिबिम्ब मात्र है, वस्तुतः आत्मा में यह सब कुछ भी नही है। आत्मा प्रकृति से सम्पूर्णतः
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