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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 218 of 307

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Page 218

पातंजल-योगसूत्र-२ २०१

इन्द्रियां जिसका (प्रकट) स्वरूप है, (पुरुष के) भोग और मुक्ति के लिए ही जिसका प्रयोजन है, वह दृश्य है।

व्याख्या—दृश्य अर्थात् प्रकृति भूतो और इन्द्रियों की समष्टि है; भूत कहने से स्थूल, सूक्ष्म सब प्रकार के भूतो का बोध होता है, और इन्द्रिय से आँख आदि समस्त इन्द्रियाँ तथा मन आदि का भी बोध होता है। उनके धर्म तीन प्रकार के हैं; जैसे—प्रकाश, कार्य और स्थिति यानी जड़त्व, इन्ही को दूसरे शब्दो मे सत्त्व, रज और तम कहते है। समग्र प्रकृति का उद्देश्य क्या है? यही कि पुरुष समुदाय भोग करके विशेषज्ञ हो जाय। पुरुष मानो अपने महान् ईश्वरीय भाव को भूल गया है। इस सम्बन्ध में एक बड़ी सुन्दर कहानी है—

किसी समय देवराज इन्द्र शूकर बनकर कीचड मे रहते थे, उनके एक शूकरी थी—उस शूकरी से उनके बहुतसे बच्चे पैदा हुए थे। वे बडे सुख से समय बिताते थे। कुछ देवता उनकी यह दुरावस्था देखकर उनके पास आकर बोले, "आप देवराज है, समस्त देवगण आपके शासन के अधीन है। फिर आप यहाँ क्यों हैं?" परन्तु इन्द्र ने उत्तर दिया, "मै बडे मजे मे हूँ। मुझे स्वर्ग की परवाह नही, यह शूकरी और ये बच्चे जब तक हैं, तब तक स्वर्ग आदि कुछ भी नही चाहिए।" देवगण यह सुनकर तो किंकर्तव्य-विमूढ हो गए—उन्हे कुछ सूझ न पडा। कुछ दिनो बाद उन्होने मन-ही-मन एक सकल्प किया कि वे एक-के-बाद-एक सब बच्चो को मार डालेगे। एक दिन उन्होने आकर एक बच्चे को मार डाला, फिर दूसरे को, और इस प्रकार सभी बच्चे मार डाले गए। अन्त में देवगणो ने उस शूकरी को भी मार डाला। जब इन्द्र का सारा परिवार इस प्रकार नष्ट हो गया, तो इन्द्र कातर होकर विलाप