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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 214 of 307

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Page 214

पातंजल-योगसूत्र-२ ११७

त्रिविन्यासप्रणाली भूल गए हैं। अतः आज हम जिसे यन्त्रवत् किए जा रहे हैं, उसी को अब जान-बूझकर करना होगा। हम ही तो मालिक हैं—कर्ता हैं, अतः हमी को इस विन्यासप्रणाली को नियमित करना होगा। और जब हम इसमें कृतकार्य हो जायेंगे, तब अपनी इच्छानुसार शरीर का पुनर्गठन कर लेंगे, और तब हमारे लिए जन्म, मृत्यु, आधि-व्याधि कुछ भी न रह जायगा।

सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥१३॥

सूत्रार्थ—(मन में इस संस्काररूप) मूल के विद्यमान रहने तक उसका फलभोग (मनुष्य आदि विभिन्न) जाति, (भिन्न-भिन्न) आयु और सुख-दुःख के भोग (के रूप में) होता रहता है।

**व्याख्या—**संस्काररूप जड़ अर्थात् कारण भीतर में विद्यमान रहने के कारण वे ही व्यक्तभाव धारण कर फल के रूप में परिणत होते हैं। कारण का नाश होकर कार्य अर्थात् फल का उदय होता है, फिर कार्य सूक्ष्मभाव धारण कर बाद के कार्य का कारणस्वरूप होता है। वृक्ष बीज को उत्पन्न करता है, बीज फिर बाद के वृक्ष की उत्पत्ति का कारण होता है। हम इस समय जो कुछ कर्म कर रहे हैं, वे समस्त पूर्वसंस्कार के फल-स्वरूप हैं। ये ही कर्म फिर संस्कार के रूप में परिणत होकर भावी कार्य का कारण हो जायेंगे। बस इसी प्रकार कार्य-कारण-प्रवाह चलता रहता है। इसीलिए यह सूत्र कहता है कि कारण विद्यमान रहने से उसका फल या कार्य अवश्यमेव होगा। यह फल पहले जाति के रूप में प्रकाशित होता है—कोई लोग मनुष्य होंगे, तो कोई देवता, कोई पशु, तो कोई असुर। फिर, यह कर्म आयु को भी नियमित करता है। एक मनुष्य पचास वर्ष जीवित रहता है, तो दूसरा सौ वर्ष, और कोई दो वर्ष के बाद