राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातंजल-योगसूत्र—२ २०७
भी अधिकाधिक पवित्र होता जाता है। यदि किसी मनुष्य के मन में उतना सत्त्वगुण नहीं है, और यदि वह भी वहाँ जाय, तो वह स्थान उस पर भी अपना असर डालेगा और उसके अन्दर सत्त्वगुण का उद्रेक कर देगा। अब हम समझ सकेंगे कि मन्दिर और तीर्थ आदि इतने पवित्र क्यों माने जाते हैं। पर यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि साधु व्यक्तियों के समागम के ऊपर ही उस स्थान की पवित्रता निर्भर रहती है। किन्तु सारी गड़बड़ी तो यही है कि मनुष्य उसका मूल उद्देश्य भूल जाता है—और भूलकर गाड़ी को बल के आगे जोतना चाहता है। पहले मनुष्य ही उस स्थान को पवित्र बनाते हैं, उसके बाद उस स्थान की पवित्रता स्वयं कारण बन जाती है और मनुष्यों को पवित्र बनाती रहती है। यदि उस स्थान में सदा असाधु व्यक्तियों का ही आवागमन रहे, तो वह स्थान अन्य स्थानों के समान ही अपवित्र बन जायगा। इमारत के गुण से नहीं वरन् मनुष्य के गुण से ही मन्दिर पवित्र माना जाता है, पर इसी को हम सदा भूल जाते हैं। इसीलिए प्रवल सत्त्वगुण-सम्पन्न साधु और महात्मागण चारों ओर यह सत्त्वगुण बिखेरते हुए अपने चारों ओर स्थित मनुष्यों पर महान् प्रभाव डाल सकते हैं। मनुष्य यहाँ तक पवित्र हो सकता है कि उसकी वह पवित्रता मानो बिलकुल प्रत्यक्ष देखी जा सकती है—वह देह को भेदकर बाहर आने लगती है। साधु का शरीर पवित्र हो जाता है, अत वह देह जहाँ विचरण करती है, वहाँ पवित्रता बिखेरती रहती है। यह कवित्व की भाषा नहीं है, रूपक नहीं है, सचमुच वह पवित्रता मानो इन्द्रियगोचर एक बाह्य वस्तु के समान प्रतीत होती है। इसका एक यथार्थ अस्तित्व है—एक यथार्थ सत्ता है